Mahabharata Mythological Story: कृपाचार्य महाभारत के उन महान ऋषियों और योद्धाओं में गिने जाते हैं, जिन्हें सनातन परंपरा में चिरंजीवी माना गया है। उनका जीवन जन्म से लेकर महाभारत युद्ध और उसके बाद तक अनेक रहस्यों से भरा हुआ है। वे कौरव और पांडव दोनों के गुरु थे, फिर भी धर्म और ज्ञान के प्रति उनकी निष्ठा सदैव बनी रही। पुराणों और महाभारत में वर्णित कथाओं के अनुसार कृपाचार्य आज भी जीवित माने जाते हैं और कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर विचरण करेंगे। आइए जानते हैं कि कृपाचार्य को चिरंजीवी क्यों कहा जाता है और इसके पीछे क्या पौराणिक रहस्य छिपा है।
कौन थे कृपाचार्य?
कृपाचार्य महर्षि शरद्वान के पुत्र थे। उनकी माता का उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में भिन्न रूपों में मिलता है, किंतु उनके जन्म की कथा अत्यंत अद्भुत मानी जाती है। महर्षि शरद्वान महान तपस्वी और अस्त्र-शस्त्र विद्या के ज्ञाता थे। वे कठोर तपस्या में लीन रहते थे और उनके तेज से देवलोक तक प्रभावित था।
कथा के अनुसार देवराज इंद्र को भय हुआ कि कहीं महर्षि शरद्वान अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग का वैभव न प्राप्त कर लें। तब इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए एक अप्सरा को भेजा। अप्सरा को देखकर महर्षि का मन कुछ क्षणों के लिए विचलित हुआ और उनके तेज से उत्पन्न वीर्य सरकंडों पर गिर पड़ा। उसी दिव्य तेज से एक बालक और एक बालिका का जन्म हुआ।
कुछ समय बाद हस्तिनापुर के राजा शांतनु शिकार के लिए वन में पहुंचे। वहां उन्होंने उन दोनों दिव्य बालकों को देखा। राजा ने करुणावश उन्हें अपने साथ महल ले जाकर पालन-पोषण किया। चूंकि राजा ने उन बच्चों पर कृपा की थी, इसलिए बालक का नाम कृप और बालिका का नाम कृपी रखा गया। यही कृप आगे चलकर कृपाचार्य कहलाए।
कृपी और द्रोणाचार्य का संबंध
कृपाचार्य की बहन कृपी का विवाह महर्षि द्रोण से हुआ था। द्रोणाचार्य और कृपाचार्य दोनों ही अस्त्र-शस्त्र के महान आचार्य थे। कृपी और द्रोणाचार्य के पुत्र थे अश्वत्थामा, जिन्हें भी चिरंजीवी माना जाता है। इस प्रकार कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे। महाभारत में यह उल्लेख मिलता है कि कृपाचार्य और द्रोणाचार्य दोनों ने मिलकर राजकुमारों को शस्त्रविद्या की शिक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
कैसे बने हस्तिनापुर के राजगुरु?
राजा शांतनु के संरक्षण में पले-बढ़े कृपाचार्य ने कम आयु में ही वेद, शास्त्र और धनुर्वेद का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया। जब उनके पिता महर्षि शरद्वान को यह ज्ञात हुआ कि उनके पुत्र हस्तिनापुर में हैं, तब वे वहां पहुंचे और कृप को समस्त दिव्य अस्त्रों की शिक्षा प्रदान की।
उनकी विद्वता और युद्धकला से प्रभावित होकर हस्तिनापुर ने उन्हें राजगुरु का सम्मान दिया। वे कौरवों और पांडवों दोनों के प्रारंभिक गुरु बने। बाद में द्रोणाचार्य को भी राजकुमारों का गुरु नियुक्त किया गया, किंतु कृपाचार्य का स्थान सदैव आदरणीय बना रहा।
महाभारत युद्ध में कृपाचार्य की भूमिका
महाभारत युद्ध के समय कृपाचार्य कौरव पक्ष में थे, क्योंकि वे हस्तिनापुर के राजगुरु थे और राज्य के प्रति अपनी निष्ठा निभा रहे थे। हालांकि वे धर्म और नीति के ज्ञाता थे तथा अनेक अवसरों पर उन्होंने उचित परामर्श भी दिया।
युद्ध के दौरान कृपाचार्य ने अनेक वीरों से युद्ध किया और अपनी अद्भुत युद्धकला का परिचय दिया। उन्हें महाभारत के सबसे कुशल धनुर्धरों में गिना जाता था। वे उन गिने-चुने महायोद्धाओं में से थे जो पूरे अठारह दिनों के युद्ध के बाद भी जीवित बचे रहे। महाभारत के अनुसार युद्ध समाप्त होने पर कौरव पक्ष से केवल तीन प्रमुख योद्धा जीवित थे- अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा।
अश्वत्थामा के साथ अंतिम रात्रि की घटना
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद दुर्योधन गंभीर रूप से घायल होकर मृत्युशय्या पर पड़ा था। उसी समय अश्वत्थामा ने प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। उसने रात्रि में पांडव शिविर पर आक्रमण करने की योजना बनाई।
कथा के अनुसार कृपाचार्य और कृतवर्मा उसके साथ थे। अश्वत्थामा ने सोते हुए द्रौपदी के पुत्रों और अनेक योद्धाओं का वध कर दिया। इसके बाद अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, जिसके कारण उसे भगवान श्रीकृष्ण का शाप प्राप्त हुआ। वहीं कृपाचार्य इस विनाश से अलग होकर आगे भी जीवित रहे।
कृपाचार्य को चिरंजीवी क्यों माना जाता है?
सनातन परंपरा में आठ प्रमुख चिरंजीवियों का उल्लेख मिलता है- अश्वत्थामा, महाबली, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, परशुराम, कृपाचार्य और मार्कण्डेय ऋषि। इनमें कृपाचार्य का स्थान अत्यंत विशेष माना गया है। पौराणिक मान्यता है कि उन्हें दिव्य आयु और अमरत्व का वरदान प्राप्त था। महाभारत और पुराणों के अनुसार वे कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर विद्यमान रहेंगे।
कलियुग के अंत में कृपाचार्य की भूमिका