Mahabharata Mythological Story: महाभारत केवल युद्ध और वीरता की कथा नहीं है, बल्कि यह धर्म, नीति और मानवीय भावनाओं का भी महाग्रंथ है। इस महाकाव्य में अनेक ऐसे पात्र हुए, जिनकी पहचान केवल उनके कुल या पक्ष से नहीं, बल्कि उनके चरित्र और आचरण से हुई। कौरवों में एक ऐसा ही नाम था विकर्ण का। वह धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्रों में से एक था, परंतु अपने भाइयों से अलग उसका स्वभाव न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ माना जाता था।
महाभारत के अनेक प्रसंगों में विकर्ण ने सत्य और धर्म का साथ देने का प्रयास किया। विशेष रूप से द्रौपदी चीरहरण के समय जब सभा में उपस्थित अधिकांश योद्धा मौन रहे, तब विकर्ण ने खुलकर अन्याय का विरोध किया था। यही कारण है कि युद्धभूमि में जब भीमसेन ने उसका वध किया, तब वे स्वयं भी अत्यंत दुखी हुए थे। आइए जानते हैं विकर्ण का जीवन और उससे जुड़ी पौराणिक कथा...
विकर्ण का जन्म
विकर्ण महाराज धृतराष्ट्र और महारानी गांधारी के तीसरे पुत्र माने जाते हैं। दुर्योधन और दुःशासन के बाद विकर्ण का स्थान था। यद्यपि वह कौरव पक्ष का राजकुमार था, किंतु उसका स्वभाव अपने भाइयों से भिन्न बताया गया है। वह शास्त्रों का ज्ञाता, नीति का समर्थक और धर्म के प्रति श्रद्धा रखने वाला योद्धा था।
हस्तिनापुर में पांडवों और कौरवों के साथ ही उसका पालन-पोषण हुआ। उसने भी गुरु द्रोणाचार्य से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी। युद्धकला में वह निपुण था और गदायुद्ध तथा धनुर्विद्या में भी दक्ष माना जाता था।
द्रौपदी चीरहरण के समय विकर्ण ने उठाई थी आवाज
महाभारत का सबसे मार्मिक प्रसंग द्यूतसभा का माना जाता है। जब युधिष्ठिर जुए में अपना राज्य, धन-संपत्ति और भाइयों को हार गए, तब अंत में उन्होंने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया। दुर्योधन के आदेश पर द्रौपदी को सभा में लाया गया और उनका अपमान किया गया। उस समय सभा में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और विदुर जैसे महान विद्वान उपस्थित थे, किंतु अधिकांश लोग मौन रहे। ऐसे समय में कौरवों में से केवल विकर्ण ने ही इस अन्याय का विरोध किया।
विकर्ण ने सभा में कहा कि जब युधिष्ठिर स्वयं को पहले ही हार चुके थे, तब उन्हें द्रौपदी को दांव पर लगाने का अधिकार कैसे प्राप्त हुआ? उसने यह भी कहा कि धर्म और न्याय की दृष्टि से द्रौपदी को दासी नहीं माना जा सकता। विकर्ण के इन शब्दों ने सभा में उपस्थित लोगों को सोचने पर विवश कर दिया था। किंतु कर्ण ने विकर्ण के मत का विरोध किया और दुर्योधन के पक्ष का समर्थन किया। अंततः विकर्ण की बात स्वीकार नहीं की गई और सभा में अन्याय होता रहा।
धर्मप्रिय होने के बावजूद कौरव पक्ष में क्यों रहा विकर्ण?
यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि जब विकर्ण धर्म को समझता था, तब उसने पांडवों का साथ क्यों नहीं दिया। महाभारत के अनुसार विकर्ण अपने कुल और परिवार के प्रति निष्ठावान था। वह जानता था कि दुर्योधन के अनेक कार्य अनुचित हैं, किंतु अपने भाइयों और राज्य के प्रति कर्तव्य के कारण उसने कौरव पक्ष नहीं छोड़ा। उसके सामने धर्म और पारिवारिक निष्ठा का कठिन संघर्ष था। उसने अन्याय का विरोध अवश्य किया, परंतु युद्ध के समय अपने कुल का साथ देना अपना कर्तव्य समझा। यही कारण है कि कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में वह कौरव सेना की ओर से युद्ध करता दिखाई देता है।
कुरुक्षेत्र युद्ध में विकर्ण की भूमिका
कुरुक्षेत्र का महायुद्ध आरंभ होने पर विकर्ण ने कौरव सेना के प्रमुख योद्धाओं के साथ युद्ध में भाग लिया। वह एक पराक्रमी महारथी माना जाता था और अनेक युद्धों में उसने अपनी वीरता का परिचय दिया। युद्ध के दौरान उसने पांडव सेना के कई योद्धाओं का सामना किया। यद्यपि उसका नाम दुर्योधन, कर्ण या अश्वत्थामा जितना प्रसिद्ध नहीं हुआ, लेकिन उसकी वीरता का उल्लेख महाभारत में मिलता है। विकर्ण को यह ज्ञात था कि धर्म अंततः पांडवों के पक्ष में है, फिर भी उसने युद्धभूमि में अपना कर्तव्य निभाया। उसने अंत तक कौरव सेना का साथ नहीं छोड़ा।
भीम और विकर्ण के बीच हुआ भीषण युद्ध
महाभारत युद्ध के दौरान एक समय ऐसा आया जब भीमसेन और विकर्ण आमने-सामने आ गए। भीम पहले ही प्रतिज्ञा कर चुके थे कि वे धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों का वध करेंगे, क्योंकि द्यूतसभा में द्रौपदी का अपमान हुआ था। जब युद्धभूमि में विकर्ण सामने आया, तब भीम के मन में द्वंद्व उत्पन्न हुआ। वे भली-भांति जानते थे कि विकर्ण अन्य कौरवों की तरह अन्यायी नहीं था। द्रौपदी चीरहरण के समय उसी ने धर्म का पक्ष लिया था। इसके बावजूद युद्ध के नियमों और अपनी प्रतिज्ञा के कारण भीम को उससे युद्ध करना पड़ा। दोनों योद्धाओं के बीच घमासान संग्राम हुआ। अंततः भीम ने अपने पराक्रम से विकर्ण का वध कर दिया।
विकर्ण की मृत्यु पर क्यों दुखी हुए भीम?