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Mahabharata: चक्रव्यूह का रहस्य- अभिमन्यु अंदर तो गए, बाहर क्यों नहीं निकल पाए?

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata Story: महाभारत की प्रसिद्ध कथा के अनुसार, अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदन की कला अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में रहते हुए सीखी थी। एक बार अर्जुन सुभद्रा को विभिन्न युद्ध कलाओं और व्यूह रचनाओं का ज्ञान दे रहे थे। 

Mahabharata
Mahabharata Mythological Story: महाभारत के महान योद्धाओं में अभिमन्यु का नाम अद्वितीय साहस, पराक्रम और वीरता के कारण लिया जाता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब बड़े-बड़े महारथी भी चक्रव्यूह जैसी जटिल युद्ध रचना को भेदने का साहस नहीं कर पाए, तब युवा अभिमन्यु ने अकेले उसमें प्रवेश कर अपनी असाधारण वीरता का परिचय दिया। किंतु उनके जीवन से जुड़ा एक प्रश्न आज भी लोगों के मन में उठता है कि आखिर अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश करना कैसे सीखा था और वे उससे बाहर निकलने की विधि क्यों नहीं जानते थे? महाभारत और पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार इसका संबंध अभिमन्यु के जन्म से पहले की घटना से जुड़ा हुआ है। 

कौन थे अभिमन्यु?

अभिमन्यु पांडव पुत्र अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा के पुत्र थे। वे बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी और युद्ध-कला में निपुण थे। कहा जाता है कि उनमें अपने पिता अर्जुन का शौर्य और मामा श्रीकृष्ण की बुद्धिमत्ता दोनों का प्रभाव था। अल्पायु में ही उन्होंने धनुर्विद्या और विभिन्न युद्ध कलाओं में अद्भुत दक्षता प्राप्त कर ली थी। कुरुक्षेत्र युद्ध के समय उनकी आयु बहुत अधिक नहीं थी, किंतु वे किसी महारथी से कम नहीं माने जाते थे।

चक्रव्यूह क्या था?

महाभारत काल में युद्ध केवल शस्त्रों के बल पर नहीं लड़े जाते थे, बल्कि विभिन्न प्रकार की व्यूह रचनाएं भी बनाई जाती थीं। इनमें चक्रव्यूह को सबसे कठिन और जटिल युद्ध रचनाओं में गिना जाता था। चक्रव्यूह एक घूमते हुए चक्र के समान सैन्य व्यवस्था थी, जिसमें सैनिक और महारथी कई परतों में खड़े रहते थे। जैसे-जैसे कोई योद्धा भीतर प्रवेश करता, उसके पीछे की परतें बंद हो जाती थीं और वह भीतर फंसता चला जाता था। इस व्यूह को भेदना अत्यंत कठिन माना जाता था। उससे भी अधिक कठिन था उसमें प्रवेश करने के बाद सुरक्षित बाहर निकलना। बहुत कम योद्धा इसकी संपूर्ण विद्या जानते थे।

अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश करना कैसे सीखा था?

महाभारत की प्रसिद्ध कथा के अनुसार, अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदन की कला अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में रहते हुए सीखी थी। एक बार अर्जुन सुभद्रा को विभिन्न युद्ध कलाओं और व्यूह रचनाओं का ज्ञान दे रहे थे। उसी समय सुभद्रा गर्भवती थीं और उनके गर्भ में अभिमन्यु विराजमान थे।

अर्जुन ने सुभद्रा को चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि विस्तार से समझानी आरंभ की। गर्भ में स्थित अभिमन्यु ध्यानपूर्वक अपने पिता की बातें सुन रहे थे। कथा के अनुसार गर्भस्थ शिशु होने के बावजूद अभिमन्यु दिव्य प्रभाव से इन बातों को ग्रहण कर रहे थे। अर्जुन ने एक-एक करके चक्रव्यूह की सभी परतों को भेदने की प्रक्रिया बताई। अभिमन्यु ने गर्भ में रहते हुए इसे सुन लिया और समझ लिया कि इस जटिल व्यूह में प्रवेश कैसे किया जाता है।

बाहर निकलने की विधि क्यों नहीं जान पाए अभिमन्यु?

जब अर्जुन चक्रव्यूह से बाहर निकलने की प्रक्रिया बताने वाले थे, तभी सुभद्रा को निद्रा आ गई। वे अर्जुन की बातें सुनते-सुनते सो गईं। कथा के अनुसार अर्जुन ने जब देखा कि सुभद्रा सो चुकी हैं, तब उन्होंने आगे का वर्णन रोक दिया। परिणामस्वरूप गर्भ में स्थित अभिमन्यु भी चक्रव्यूह से बाहर निकलने की विधि नहीं सुन सके। इसी कारण अभिमन्यु को केवल चक्रव्यूह में प्रवेश करने की कला ज्ञात हुई, किंतु उससे बाहर निकलने का ज्ञान अधूरा रह गया। 

कुरुक्षेत्र युद्ध में कब बना चक्रव्यूह?

कुरुक्षेत्र युद्ध के तेरहवें दिन कौरव पक्ष के सेनापति द्रोणाचार्य ने पांडव सेना को पराजित करने के उद्देश्य से चक्रव्यूह की रचना की। द्रोणाचार्य भली-भांति जानते थे कि इस व्यूह को भेदने की पूर्ण कला अर्जुन को आती है। कौरवों की योजना थी कि किसी प्रकार अर्जुन को युद्धभूमि के दूसरे छोर पर व्यस्त रखा जाए। इसी उद्देश्य से संशप्तकों ने अर्जुन को दूर के मोर्चे पर युद्ध के लिए ललकारा।

जब अर्जुन युद्धभूमि के मुख्य क्षेत्र से दूर चले गए, तब द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना कर दी। पांडव सेना के सामने बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई, क्योंकि अर्जुन के अतिरिक्त बहुत कम योद्धा इस व्यूह को भेदना जानते थे।

अभिमन्यु ने क्यों लिया चक्रव्यूह में प्रवेश का निर्णय?

जब पांडवों ने चक्रव्यूह देखा, तब चिंता बढ़ गई। उस समय युवा अभिमन्यु ने बताया कि उन्हें चक्रव्यूह में प्रवेश करना आता है। अभिमन्यु ने स्पष्ट कहा कि वे व्यूह को भेद सकते हैं, लेकिन उससे बाहर निकलने की संपूर्ण विधि उन्हें ज्ञात नहीं है। इसके बाद योजना बनी कि अभिमन्यु व्यूह को भेदकर मार्ग बनाएंगे और उनके पीछे-पीछे भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा अन्य योद्धा प्रवेश करेंगे। किन्तु घटनाएं योजना के अनुसार नहीं हो सकीं।

पांडवों को जयद्रथ ने कैसे रोका?

जब अभिमन्यु ने चक्रव्यूह को भेदकर प्रवेश किया, तब पांडव योद्धा उनके पीछे बढ़े। किंतु कौरव पक्ष के योद्धा जयद्रथ ने प्रवेश द्वार पर उन्हें रोक दिया। महाभारत के अनुसार जयद्रथ को भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि वह एक दिन के लिए पांडवों को रोक सकेगा, अर्जुन को छोड़कर। इसी वरदान के प्रभाव से जयद्रथ ने भीम, युधिष्ठिर और अन्य पांडव योद्धाओं को व्यूह में प्रवेश नहीं करने दिया। परिणामस्वरूप अभिमन्यु अकेले ही चक्रव्यूह के भीतर रह गए।

चक्रव्यूह के भीतर अभिमन्यु का अद्भुत पराक्रम

अकेले होने के बावजूद अभिमन्यु ने असाधारण वीरता दिखाई। उन्होंने कौरव सेना के अनेक महारथियों को परास्त किया। उनके पराक्रम से दुर्योधन सहित अनेक योद्धा चिंतित हो उठे। कथा में वर्णित है कि अभिमन्यु ने अनेक रथों, हाथियों और योद्धाओं का संहार किया। उनकी युद्ध क्षमता देखकर कौरव पक्ष के कई महारथी एक साथ उनके विरुद्ध युद्ध करने लगे। द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा और अन्य योद्धाओं ने मिलकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया। युद्ध के नियमों के विपरीत अनेक महारथियों ने एक साथ अभिमन्यु पर आक्रमण किया।

अभिमन्यु का अंतिम युद्ध

युद्ध करते-करते अभिमन्यु का रथ नष्ट हो गया। उनका धनुष टूट गया और शस्त्र समाप्त होने लगे। इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। कथा के अनुसार उन्होंने तलवार और ढाल से युद्ध किया। जब वे भी नष्ट हो गए, तब उन्होंने रथ का पहिया उठाकर शत्रुओं का सामना किया। अंत तक वे वीरतापूर्वक युद्ध करते रहे। अंततः अनेक महारथियों के संयुक्त आक्रमण के कारण अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय उनकी आयु बहुत कम थी, किंतु उनका पराक्रम महाभारत के सबसे गौरवपूर्ण प्रसंगों में गिना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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