Mahabharata Mythological Story: महाभारत का युद्ध भारतीय इतिहास और पुराणों का सबसे भीषण युद्ध माना जाता है। अठारह दिनों तक चले इस महायुद्ध में करोड़ों योद्धाओं का संहार हुआ और कुरुवंश लगभग समाप्त हो गया। युद्ध में पांडवों को विजय तो प्राप्त हुई, लेकिन यह विजय उनके लिए सुख का कारण नहीं बन सकी। अपने ही संबंधियों, गुरुओं और मित्रों के वध ने विशेष रूप से धर्मराज युधिष्ठिर के हृदय को गहरे पश्चाताप से भर दिया था।
राजसिंहासन प्राप्त करने के बाद भी युधिष्ठिर स्वयं को इस विनाश का उत्तरदायी मानते रहे। ऐसे समय में महर्षि व्यास, भगवान श्रीकृष्ण और अन्य ऋषियों ने उन्हें अश्वमेध यज्ञ करने का परामर्श दिया। यह केवल राजसूय वैभव का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि युद्ध से उत्पन्न पापों की शांति, राज्य की पुनः स्थापना और धर्म की प्रतिष्ठा के लिए किया गया एक महान वैदिक अनुष्ठान था। महाभारत के अश्वमेधिक पर्व में इस यज्ञ का विस्तार से वर्णन मिलता है।
युद्ध के बाद युधिष्ठिर क्यों थे दुखी?
कुरुक्षेत्र के युद्ध में पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, कर्ण, अभिमन्यु, दुर्योधन और अनेक महारथियों का अंत हो चुका था। युद्ध समाप्त होने के बाद जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठे, तब उनके मन में विजय का उत्साह नहीं था। वे बार-बार यही सोचते थे कि राज्य प्राप्ति के लिए इतने लोगों का रक्त बहा है।
महाभारत में वर्णन मिलता है कि युधिष्ठिर स्वयं को अपने कुल के विनाश का कारण मानते थे। वे राजपाट त्यागकर वन जाने की इच्छा भी प्रकट करने लगे थे। उस समय भगवान श्रीकृष्ण, महर्षि व्यास और अन्य मुनियों ने उन्हें समझाया कि यह युद्ध धर्म की स्थापना के लिए हुआ था और क्षत्रिय धर्म के अनुसार उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया है।
महर्षि व्यास ने क्यों दिया अश्वमेध यज्ञ का परामर्श?
युधिष्ठिर के मन में युद्धजनित पापों और ग्लानि को दूर करने के लिए महर्षि व्यास ने उन्हें अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह दी। पुराणों और महाभारत के अनुसार अश्वमेध यज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ वैदिक अनुष्ठान माना जाता था, जिसे बड़े-बड़े सम्राट संपन्न करते थे।
महर्षि व्यास ने कहा कि यह यज्ञ न केवल युद्ध से उत्पन्न दोषों की शांति करेगा, बल्कि समस्त पृथ्वी पर धर्म और राजव्यवस्था को पुनः स्थापित करने में भी सहायक होगा। भगवान श्रीकृष्ण ने भी इस यज्ञ के आयोजन का समर्थन किया।
अश्वमेध यज्ञ क्या होता था?
अश्वमेध यज्ञ प्राचीन भारत का एक विशेष राजसूय अनुष्ठान था। इसमें एक विशेष घोड़े को स्वतंत्र रूप से विभिन्न राज्यों में विचरण करने के लिए छोड़ दिया जाता था। जिस राज्य का राजा उस घोड़े को रोक देता था, उसे यज्ञकर्ता राजा की सेना से युद्ध करना पड़ता था।
यदि कोई राजा घोड़े को बिना विरोध के जाने देता था, तो इसका अर्थ होता था कि वह यज्ञ करने वाले सम्राट की अधीनता स्वीकार कर रहा है। एक वर्ष तक घोड़े के विचरण के बाद उसे वापस लाकर वैदिक विधि से यज्ञ संपन्न किया जाता था। महाभारत में वर्णित है कि यह यज्ञ केवल वही राजा कर सकता था जो शक्तिशाली, धर्मनिष्ठ और समस्त दिशाओं में अपनी सत्ता स्थापित करने में समर्थ हो।
युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ का मुख्य उद्देश्य क्या था?
धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ के कई उद्देश्य बताए गए हैं। सबसे प्रमुख उद्देश्य युद्ध के कारण उत्पन्न पापों की शांति करना था। युधिष्ठिर को लगता था कि अपने बंधु-बांधवों के वध का दोष उनके ऊपर है।
इसके अतिरिक्त युद्ध के बाद अनेक राज्यों की व्यवस्था भी अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से हस्तिनापुर की सार्वभौम सत्ता को पुनः स्थापित किया गया और विभिन्न राजाओं को धर्मसम्मत शासन व्यवस्था के अंतर्गत संगठित किया गया। महाभारत के अनुसार यह यज्ञ केवल साम्राज्य विस्तार का साधन नहीं था, बल्कि धर्म और राजधर्म की पुनः प्रतिष्ठा का भी माध्यम था।
अश्वमेध यज्ञ के लिए धन की व्यवस्था कैसे हुई?
महाभारत में वर्णित है कि युद्ध के बाद हस्तिनापुर का राजकोष लगभग रिक्त हो चुका था। इतने विशाल यज्ञ के लिए अपार धन-संपत्ति की आवश्यकता थी, तब महर्षि व्यास ने युधिष्ठिर को प्राचीन राजा मरुत्त के खजाने के विषय में बताया। कथा के अनुसार राजा मरुत्त ने पूर्वकाल में एक महान यज्ञ किया था और उसके बाद बड़ी मात्रा में स्वर्ण तथा धन हिमालय क्षेत्र में सुरक्षित रह गया था। पांडवों ने उस धन को प्राप्त किया और उसी के द्वारा अश्वमेध यज्ञ की तैयारियां प्रारंभ की गईं।
अर्जुन को क्यों सौंपी गई अश्व की रक्षा?
अश्वमेध यज्ञ के लिए छोड़े गए घोड़े की रक्षा का दायित्व अर्जुन को दिया गया। अर्जुन महान धनुर्धर थे और युद्ध के बाद भी समस्त राजाओं में उनका अद्वितीय सम्मान था। जब यज्ञ का घोड़ा विभिन्न राज्यों में विचरण करता हुआ गया, तब अनेक राजाओं ने उसका स्वागत किया, जबकि कुछ स्थानों पर युद्ध भी हुआ। अर्जुन ने उन राजाओं को पराजित किया और उन्हें युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। अश्वमेधिक पर्व में अर्जुन की अनेक यात्राओं और युद्धों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
बभ्रुवाहन और अर्जुन का युद्ध
अश्वमेध यज्ञ से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में अर्जुन और उनके पुत्र बभ्रुवाहन का युद्ध विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब यज्ञ का घोड़ा मणिपुर पहुंचा, तब वहां के राजा बभ्रुवाहन ने उसका मार्ग रोक लिया। बभ्रुवाहन अर्जुन और चित्रांगदा के पुत्र थे। युद्ध के दौरान बभ्रुवाहन ने अपने पिता अर्जुन को पराजित कर दिया। कुछ कथाओं में वर्णन है कि अर्जुन उस युद्ध में मूर्छित या मृतप्राय हो गए थे, तब नागकन्या उलूपी ने नागमणि के प्रभाव से अर्जुन को पुनर्जीवित किया।
एक वर्ष बाद कैसे हुआ यज्ञ का समापन?
घोड़े के एक वर्ष तक विचरण करने और पुनः हस्तिनापुर लौटने के बाद वैदिक रीति से अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अनेक ऋषि-मुनि, ब्राह्मण और विभिन्न राज्यों के राजा उपस्थित हुए। भगवान श्रीकृष्ण भी इस महान अनुष्ठान में उपस्थित थे। यज्ञ के दौरान विशाल दान दिए गए और वैदिक मंत्रों के साथ समस्त विधियां पूर्ण की गईं। महर्षि व्यास के निर्देशन में यह यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
महाभारत में अश्वमेध यज्ञ का धार्मिक महत्व