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Mahabharata: पूर्वजन्म में कौन था कर्ण? जहां से जुड़ा है सूर्यपुत्र की मृत्यु का रहस्य, जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata: महाभारत के अनुसार कर्ण कुंती और सूर्यदेव के पुत्र थे। विवाह से पहले महर्षि दुर्वासा द्वारा प्राप्त मंत्र के प्रभाव से कुंती ने सूर्यदेव का आह्वान किया था। 

Mahabharata
Mahabharata: महाभारत के सबसे चर्चित और रहस्यमय पात्रों में सूर्यपुत्र कर्ण का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। कर्ण जितना अपने अद्वितीय पराक्रम, दानशीलता और युद्धकौशल के लिए प्रसिद्ध हैं, उतना ही उनका जीवन अनेक रहस्यों से भी घिरा हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक कर्ण का जीवन असाधारण घटनाओं से भरा रहा। पौराणिक कथाओं में एक मान्यता यह भी मिलती है कि कर्ण का पूर्वजन्म एक दिव्य सत्ता के रूप में हुआ था और उसी पूर्वजन्म से जुड़ा एक श्राप उनके जीवन और मृत्यु का कारण बना। आइए जानते हैं कर्ण से जुड़ी ये पौराणिक कथा....

कौन थे कर्ण?

महाभारत के अनुसार कर्ण कुंती और सूर्यदेव के पुत्र थे। विवाह से पहले महर्षि दुर्वासा द्वारा प्राप्त मंत्र के प्रभाव से कुंती ने सूर्यदेव का आह्वान किया था। सूर्यदेव के वरदान से कर्ण का जन्म हुआ। जन्म के समय उनके शरीर पर दिव्य कवच और कुंडल विद्यमान थे, जो उन्हें अजेय बनाते थे। समाज के भय से कुंती ने नवजात कर्ण को एक टोकरी में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया। बाद में उनका पालन-पोषण अधिरथ और राधा ने किया। इसी कारण उन्हें राधेय भी कहा गया।

पूर्वजन्म में कर्ण कौन थे?

पूर्वजन्म में कर्ण दंभोद्भव नाम का असुर कौन था? पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में दंभोद्भव नाम का एक असुर हुआ करता था। वह सूर्यदेव का महान उपासक था। अपनी कठोर तपस्या से उसने सूर्यदेव को प्रसन्न कर लिया। सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर उसे असाधारण शक्ति और दिव्य कवचों का वरदान प्रदान किया।

कथा में वर्णन मिलता है कि दंभोद्भव को ऐसे दिव्य कवच प्राप्त थे, जिनके रहते उसका वध लगभग असंभव था। इतना ही नहीं, इन कवचों को नष्ट करना भी अत्यंत कठिन था। परिणामस्वरूप वह स्वयं को अजेय समझने लगा और धीरे-धीरे उसका अहंकार बढ़ता गया। अपनी शक्ति के बल पर उसने देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों को परेशान करना शुरू कर दिया। उसके अत्याचारों से तीनों लोक व्याकुल हो उठे। 

देवताओं ने मांगी सहायता

जब दंभोद्भव के अत्याचार असहनीय हो गए तो देवता उसकी शक्ति का सामना करने में असमर्थ दिखाई देने लगे। तब सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और उनसे इस संकट का समाधान पूछा। भगवान विष्णु ने देवताओं को नर और नारायण की शरण में जाने का निर्देश दिया। नर और नारायण बदरिकाश्रम में तपस्या कर रहे थे और उन्हें भगवान विष्णु का ही अंशावतार माना जाता है। देवताओं ने उनके समक्ष अपनी व्यथा रखी और दंभोद्भव से रक्षा की प्रार्थना की।

नर-नारायण और दंभोद्भव का महायुद्ध

देवताओं की प्रार्थना सुनकर नर और नारायण ने दंभोद्भव का सामना करने का निश्चय किया। इसके बाद एक ऐसा युद्ध आरंभ हुआ जिसका वर्णन अत्यंत विलक्षण माना जाता है। कथा के अनुसार दंभोद्भव के दिव्य कवचों को नष्ट करना सामान्य बात नहीं थी। प्रत्येक कवच को नष्ट करने के लिए हजार वर्षों की तपस्या का बल आवश्यक था। साथ ही जो योद्धा कवच को भेदता, उसके प्राण भी चले जाते थे।

नर और नारायण ने इस चुनौती का अनोखा समाधान निकाला। जब एक युद्ध करता था तो दूसरा तपस्या करता था। युद्ध करने वाला दंभोद्भव के एक कवच को नष्ट करता और स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता। तब दूसरा अपनी तपस्या के प्रभाव से उसे पुनर्जीवित करता। फिर दोनों की भूमिकाएं बदल जातीं। इस प्रकार हजारों वर्षों तक यह क्रम चलता रहा। धीरे-धीरे दंभोद्भव के अधिकांश कवच नष्ट हो गए, लेकिन उसका अंत अभी भी नहीं हुआ था। 

जब बचा अंतिम कवच

लंबे समय तक चले इस महायुद्ध के बाद दंभोद्भव के लगभग सभी कवच नष्ट हो चुके थे। अंत में उसके पास केवल एक कवच शेष रह गया। अपने विनाश को निकट देखकर दंभोद्भव भयभीत हो गया। वह युद्धभूमि छोड़कर सूर्यदेव की शरण में पहुंच गया। सूर्यदेव अपने भक्त पर कृपालु थे, इसलिए उन्होंने उसे संरक्षण प्रदान किया।

तब नर और नारायण ने सूर्यदेव से कहा कि यदि दंभोद्भव को संरक्षण दिया गया, तो भविष्य में इसके परिणाम अवश्य सामने आएंगे। कथा में कहा गया है कि उसी समय यह नियति निर्धारित हुई कि अगले जन्म में यही असुर सूर्यदेव के तेज से जन्म लेकर पुनः पृथ्वी पर आएगा। 

दंभोद्भव का कर्ण के रूप में जन्म

पौराणिक मान्यता के अनुसार अगले जन्म में दंभोद्भव ने कर्ण के रूप में जन्म लिया। जब कुंती ने सूर्यदेव के मंत्र का आह्वान किया, तब सूर्यदेव के तेज से कर्ण का जन्म हुआ। कर्ण जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल धारण किए हुए थे। यह वही अंतिम दिव्य सुरक्षा मानी जाती है, जो दंभोद्भव के पास पूर्वजन्म में शेष रह गई थी। इसी कारण कर्ण बचपन से ही असाधारण तेज और शक्ति से युक्त थे। उनका कवच और कुंडल उनके शरीर का हिस्सा थे। जब तक वे उनके पास रहते, तब तक उन्हें युद्ध में पराजित करना अत्यंत कठिन माना जाता था। 

नर और नारायण का पुनर्जन्म

जिस प्रकार दंभोद्भव ने कर्ण के रूप में जन्म लिया, उसी प्रकार नर और नारायण भी पृथ्वी पर अवतरित हुए। पौराणिक परंपरा के अनुसार नर ने अर्जुन के रूप में और नारायण ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। इस प्रकार पूर्वजन्म में आरंभ हुआ संघर्ष महाभारत काल में फिर से सामने आया। कहा जाता है कि दंभोद्भव और नर-नारायण के बीच जो युद्ध अधूरा रह गया था, उसकी अंतिम कड़ी कुरुक्षेत्र में पूरी हुई। 

कवच-कुंडल कैसे हुए अलग?

महाभारत युद्ध से पहले देवराज इंद्र को यह चिंता थी कि यदि कर्ण अपने जन्मजात कवच और कुंडल के साथ युद्ध करेंगे, तो अर्जुन के लिए उन्हें पराजित करना अत्यंत कठिन होगा। तब इंद्र ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास पहुंचे। उन्होंने दान में कर्ण से उनका कवच और कुंडल मांग लिया। कर्ण अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने बिना किसी संकोच के अपने शरीर से कवच और कुंडल काटकर दान कर दिए। इस प्रकार वह दिव्य सुरक्षा उनसे अलग हो गई, जो उनके जन्म के साथ आई थी।

यहीं से जुड़ा है कर्ण की मृत्यु का रहस्य

पूर्वजन्म की कथा के अनुसार दंभोद्भव के पास जो अंतिम कवच बचा था, वही कर्ण के रूप में जन्म लेने पर उनके शरीर का दिव्य कवच बना, लेकिन नियति ऐसी थी कि आवश्यकता के समय वह कवच उनके पास नहीं रहेगा। जब इंद्र दान में कवच-कुंडल ले गए, तब कर्ण उस दिव्य रक्षा से वंचित हो गए। आगे चलकर कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन और कर्ण आमने-सामने आए। श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी थे और युद्ध के निर्णायक क्षण में अर्जुन के बाण से कर्ण का वध हुआ। पौराणिक मान्यता कहती है कि यही वह क्षण था, जब पूर्वजन्म में आरंभ हुआ संघर्ष समाप्त हुआ और दंभोद्भव के अंतिम कवच की कथा भी पूर्ण हुई। 

 
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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