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Mahabharata: भीम ने क्या और क्यों ली थी प्रतिज्ञा? जानें फिर कैसे पूरा किया अपना वचन?

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata Story: महाभारत के अनुसार, हस्तिनापुर में आयोजित द्यूत क्रीड़ा में धर्मराज युधिष्ठिर एक-एक करके अपना समस्त धन, राज्य, भाई और अंत में द्रौपदी तक को दांव पर हार गए। 

Mahabharata Mythological Story: 
Mahabharata Mythological Story: महाभारत केवल राजाओं और राज्यों के युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि यह उन प्रतिज्ञाओं, वचनों और संकल्पों की भी गाथा है, जिन्होंने पूरे इतिहास की दिशा बदल दी। महाभारत में कई योद्धाओं ने विभिन्न अवसरों पर प्रतिज्ञाएं ली थीं, लेकिन पांडवों में सबसे बलशाली भीमसेन की प्रतिज्ञा सबसे अधिक चर्चित मानी जाती है। यह वह प्रतिज्ञा थी जो उन्होंने कौरव सभा में द्रौपदी के अपमान के बाद क्रोध और पीड़ा में ली थी। भीम ने न केवल यह वचन लिया, बल्कि वर्षों बाद कुरुक्षेत्र के युद्ध में उसे पूरा करके भी दिखाया। द्रौपदी के अपमान से जुड़ी यह घटना महाभारत युद्ध के प्रमुख कारणों में गिनी जाती है। आइए जानते हैं यह पौराणिक कथा...

द्यूत सभा में हुआ था द्रौपदी का अपमान

महाभारत के अनुसार, हस्तिनापुर में आयोजित द्यूत क्रीड़ा में धर्मराज युधिष्ठिर एक-एक करके अपना समस्त धन, राज्य, भाई और अंत में द्रौपदी तक को दांव पर हार गए। इसके बाद दुर्योधन ने द्रौपदी को राजसभा में बुलाने का आदेश दिया, जब द्रौपदी ने आने से इनकार किया तो दुर्योधन के भाई दुःशासन ने उन्हें बलपूर्वक सभा में घसीटकर लाया। उस समय सभा में भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, विदुर, धृतराष्ट्र और अनेक राजाओं की उपस्थिति थी, लेकिन कोई भी इस अन्याय को रोक नहीं सका।

दुःशासन ने द्रौपदी का वस्त्रहरण करने का प्रयास किया। द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया और उनकी कृपा से उनकी लाज बच गई। किंतु इस घटना ने पांडवों के हृदय को झकझोर दिया। विशेष रूप से भीमसेन इस अपमान को सहन नहीं कर सके।

क्रोधित भीम ने सभा में ली भयंकर प्रतिज्ञा

द्रौपदी के अपमान को देखकर भीम का क्रोध चरम पर पहुंच गया। वे तत्काल कौरवों का वध करना चाहते थे, लेकिन उस समय वे द्यूत क्रीड़ा की शर्तों और सभा की परिस्थितियों से बंधे हुए थे, तब भीम ने पूरी सभा के सामने प्रतिज्ञा की कि वह दुःशासन का वध करेंगे और उसकी छाती का रक्त पिएंगे। इसके साथ ही उन्होंने दुर्योधन के लिए भी एक भयंकर वचन लिया।

जब दुर्योधन ने द्रौपदी का उपहास करते हुए अपनी जांघ थपथपाकर उसे वहां बैठने का संकेत दिया, तब भीम ने क्रोध में कहा कि वह युद्धभूमि में दुर्योधन की इसी जांघ को अपनी गदा से तोड़ देंगे। सभा में उपस्थित सभी लोग भीम की इस प्रतिज्ञा को सुनकर स्तब्ध रह गए। यह कोई साधारण क्रोध में कहा गया वचन नहीं था, बल्कि एक ऐसा संकल्प था जिसे भीम ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।

वनवास के वर्षों में भी नहीं भूले अपना वचन

द्यूत क्रीड़ा के बाद पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा। इस लंबे काल में अनेक घटनाएं घटीं, लेकिन भीम कभी भी द्रौपदी के अपमान और अपनी प्रतिज्ञा को नहीं भूले। वनवास के दौरान जब भी द्रौपदी उस अपमान को याद करती थीं, भीम उन्हें आश्वस्त करते थे कि समय आने पर वह कौरवों को उनके कर्मों का फल अवश्य देंगे।

महाभारत में वर्णन मिलता है कि भीम बार-बार अपने भाइयों और द्रौपदी के सामने यह दोहराते थे कि वह दुःशासन और दुर्योधन को उनके अपराधों का दंड अवश्य देंगे। यही कारण था कि कुरुक्षेत्र युद्ध उनके लिए केवल राज्य प्राप्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि अपने वचन को पूरा करने का अवसर भी था।

कुरुक्षेत्र युद्ध में आया प्रतिज्ञा पूरी करने का समय

जब शांति के सभी प्रयास विफल हो गए और अंततः कुरुक्षेत्र का महायुद्ध आरंभ हुआ, तब भीम के सामने अपने संकल्प को पूरा करने का अवसर आया। युद्ध के दौरान भीम ने कौरव सेना के अनेक महारथियों का वध किया। उन्होंने धृतराष्ट्र के कई पुत्रों को युद्धभूमि में मार गिराया। किंतु उनकी दृष्टि विशेष रूप से दुःशासन और दुर्योधन पर थी। भीम जानते थे कि उनकी प्रतिज्ञा तभी पूर्ण मानी जाएगी जब वे उन दोनों को स्वयं परास्त करेंगे।

दुःशासन के साथ हुआ भीषण युद्ध

महाभारत के युद्ध के सत्रहवें दिन भीम और दुःशासन का आमना-सामना हुआ। दोनों के बीच अत्यंत भीषण युद्ध हुआ। दुःशासन ने पूरी शक्ति के साथ युद्ध किया, लेकिन भीम के सामने वह अधिक समय तक टिक नहीं सका।

भीम ने उसे युद्धभूमि में परास्त कर दिया और भूमि पर गिरा दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी वर्षों पुरानी प्रतिज्ञा को स्मरण किया। महाभारत के वर्णन के अनुसार भीम ने दुःशासन की छाती फाड़ दी और उसका वध कर दिया। इसी के साथ उन्होंने सभा में लिए गए अपने वचन को पूरा किया। जब यह समाचार कौरव सेना में फैला तो वहां भय और शोक का वातावरण फैल गया। दूसरी ओर पांडव पक्ष को लगा कि द्रौपदी के अपमान का एक बड़ा प्रतिशोध पूरा हो चुका है।

दुर्योधन के लिए भी ली थी प्रतिज्ञा

दुःशासन के अतिरिक्त भीम ने दुर्योधन के लिए भी एक विशेष प्रतिज्ञा ली थी। द्रौपदी के अपमान के समय दुर्योधन ने अपनी जांघ थपथपाकर उनका उपहास किया था। उस समय भीम ने कहा था कि वह युद्धभूमि में दुर्योधन की जांघ तोड़ेंगे। यह वचन भी उनके मन में वर्षों तक जीवित रहा। महाभारत युद्ध के अंतिम चरण में जब लगभग सभी प्रमुख कौरव योद्धा मारे जा चुके थे, तब दुर्योधन और भीम के बीच गदा युद्ध हुआ। दोनों ही गदा युद्ध के महान योद्धा थे।

भीम और दुर्योधन का अंतिम गदा युद्ध

महाभारत के अनुसार, युद्ध के अठारहवें दिन भीम और दुर्योधन के बीच भयंकर गदा युद्ध हुआ। दुर्योधन गदा युद्ध की कला में अत्यंत निपुण था और उसने लंबे समय तक भीम को कड़ी चुनौती दी। युद्ध देखते हुए सभी योद्धा चिंतित थे क्योंकि दोनों की शक्ति लगभग समान प्रतीत हो रही थी। इसी दौरान श्रीकृष्ण ने भीम को उनकी प्रतिज्ञा का स्मरण कराया।

गदा युद्ध के नियमों के अनुसार कमर से नीचे प्रहार करना निषिद्ध था, लेकिन भीम को याद था कि उन्होंने दुर्योधन की जांघ तोड़ने का वचन लिया था। अंततः अवसर मिलते ही भीम ने अपनी गदा से दुर्योधन की जांघ पर प्रहार कर दिया। यह प्रहार इतना शक्तिशाली था कि दुर्योधन की जांघ टूट गई और वह भूमि पर गिर पड़ा। इस प्रकार भीम ने वर्षों पहले द्यूत सभा में लिया गया अपना दूसरा वचन भी पूरा कर दिया।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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