Mahabharata Mythological Story: महाभारत में अर्जुन के जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं मिलती हैं, जिनमें उनके विभिन्न विवाहों का भी विशेष उल्लेख है। द्रौपदी और सुभद्रा के अतिरिक्त अर्जुन का विवाह मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से भी हुआ था। यह विवाह केवल एक राजवंशीय संबंध नहीं था, बल्कि इसके पीछे मणिपुर राज्य की परंपरा, राजा की प्रतिज्ञा और अर्जुन के वनवास से जुड़ी घटनाएं भी थीं। महाभारत के आदि पर्व में वर्णित यह कथा अर्जुन के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है। आइए जानते हैं कि अर्जुन और चित्रांगदा का विवाह कैसे हुआ था...
अर्जुन को क्यों करना पड़ा था वनवास?
महाभारत के अनुसार, पांचों पांडवों के बीच यह नियम बनाया गया था कि जब द्रौपदी किसी एक भाई के साथ एकांत में हों, तब कोई अन्य भाई उस कक्ष में प्रवेश नहीं करेगा। यदि कोई इस नियम का उल्लंघन करेगा तो उसे निश्चित समय के लिए वनवास पर जाना होगा।
एक बार एक ब्राह्मण सहायता मांगते हुए अर्जुन के पास पहुंचा। उसके गौधन को चोर लूटकर ले गए थे। अर्जुन को अपने अस्त्र-शस्त्र लेने के लिए उस कक्ष में जाना पड़ा जहां उस समय युधिष्ठिर और द्रौपदी उपस्थित थे। धर्म की रक्षा के लिए अर्जुन ने नियम भंग किया और स्वयं ही वनवास स्वीकार कर लिया। वनवास के दौरान अर्जुन ने अनेक तीर्थों की यात्रा की और विभिन्न राज्यों का भ्रमण किया। इसी यात्रा के दौरान वे पूर्व दिशा में स्थित मणिपुर राज्य पहुंचे।
मणिपुर पहुंचने पर अर्जुन की भेंट चित्रांगदा से हुई
मणिपुर उस समय एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य माना जाता था। वहां के राजा चित्रवाहन अपनी पुत्री चित्रांगदा से अत्यंत स्नेह करते थे। चित्रांगदा रूप, गुण, शौर्य और युद्धकला में निपुण थीं। कहा जाता है कि उन्हें राजकुमारों की भांति शिक्षा और शस्त्रविद्या प्रदान की गई थी। जब अर्जुन मणिपुर पहुंचे, तब उन्होंने चित्रांगदा को देखा और उनके तेज, सौंदर्य तथा व्यक्तित्व से प्रभावित हो गए। महाभारत के वर्णन के अनुसार, अर्जुन ने चित्रांगदा को देखकर उनसे विवाह करने का विचार किया।
राजा चित्रवाहन की थी विशेष प्रतिज्ञा
अर्जुन राजा चित्रवाहन के पास पहुंचे और विधिपूर्वक उनकी पुत्री का हाथ मांग लिया, तब राजा ने अर्जुन के समक्ष अपने कुल की एक विशेष परंपरा का उल्लेख किया। राजा चित्रवाहन ने बताया कि उनके वंश में एक प्राचीन वरदान के कारण प्रत्येक पीढ़ी में केवल एक ही संतान जन्म लेती थी। चित्रांगदा उनकी एकमात्र संतान थीं।
राजा चाहते थे कि उनके वंश का उत्तराधिकारी मणिपुर में ही रहे और राज्य की परंपरा आगे बढ़ाए। इसी कारण राजा ने अर्जुन के सामने एक शर्त रखी कि यदि चित्रांगदा से उत्पन्न पुत्र को मणिपुर का उत्तराधिकारी बनाया जाए और वह राज्य में ही रहे, तभी वे इस विवाह के लिए सहमत होंगे।
अर्जुन ने स्वीकार की राजा की शर्त
अर्जुन ने राजा चित्रवाहन की शर्त को स्वीकार कर लिया। वे जानते थे कि राजवंश की परंपरा और उत्तराधिकार की रक्षा करना उस समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था। इसलिए उन्होंने बिना किसी विवाद के यह शर्त मान ली। इसके बाद वैदिक रीति-रिवाजों और विधि-विधान के साथ अर्जुन और चित्रांगदा का विवाह संपन्न हुआ।
इस प्रकार पांडव अर्जुन और मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा वैवाहिक बंधन में बंध गए। महाभारत में वर्णित है कि विवाह के पश्चात अर्जुन कुछ समय तक मणिपुर में ही रहे। उन्होंने वहां राजपरिवार के साथ समय बिताया और राज्य की परंपराओं का सम्मान किया।
अर्जुन और चित्रांगदा के पुत्र थे बभ्रुवाहन
कुछ समय बाद चित्रांगदा ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम बभ्रुवाहन रखा गया। राजा चित्रवाहन के वंश की परंपरा के अनुसार बभ्रुवाहन को मणिपुर का उत्तराधिकारी माना गया। अर्जुन ने अपने पुत्र को मणिपुर राज्य में ही रहने दिया, क्योंकि वे विवाह के समय दी गई प्रतिज्ञा को निभाना चाहते थे।
पुत्र के जन्म के बाद अर्जुन ने चित्रांगदा और बभ्रुवाहन को मणिपुर में छोड़ दिया और अपनी तीर्थयात्रा तथा वनवास की शेष अवधि पूर्ण करने के लिए आगे बढ़ गए। बभ्रुवाहन आगे चलकर मणिपुर के प्रसिद्ध राजा बने और महाभारत की कई कथाओं में उनका उल्लेख मिलता है।
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