Mahabharata Mythological Story: सनातन धर्म के ग्रंथों में अनेक ऐसी कथाएं वर्णित हैं, जिनमें देवताओं को भी अपने कर्मों के परिणाम भोगने पड़े। महाभारत में वर्णित यमराज की कथा भी ऐसी ही अद्भुत और रहस्यमयी कथा है। यमराज को धर्म का अधिष्ठाता देव माना जाता है। वे मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखकर न्याय प्रदान करते हैं। किंतु एक समय ऐसा भी आया जब स्वयं धर्मराज यम को मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा। यह घटना महाभारत के अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र विदुर के जन्म से जुड़ी हुई है। आखिर किस कारण न्याय के देवता को मानव रूप धारण करना पड़ा और किस ऋषि के श्राप ने उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेने के लिए बाध्य किया? आइए जानते हैं इस पौराणिक कथा का वर्णन...
ऋषि मांडव्य का तप और अन्यायपूर्ण दंड
प्राचीन काल में महर्षि मांडव्य महान तपस्वी और सिद्ध ऋषि थे। वे अपने आश्रम में रहकर कठोर तपस्या करते थे। उनका अधिकांश समय मौन व्रत, ध्यान और भगवान के चिंतन में व्यतीत होता था। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी और अनेक लोग उनके दर्शन के लिए आते थे। एक दिन कुछ चोर राजकोष से धन चुराकर भाग रहे थे। सैनिक उनका पीछा कर रहे थे। बचने के लिए वे चोर महर्षि मांडव्य के आश्रम में पहुंचे और चोरी का सामान वहीं छिपाकर स्वयं भी आश्रम में ठहर गए। उसी समय राजा के सैनिक वहां पहुंच गए।
सैनिकों ने आश्रम की तलाशी ली तो चोरी का धन बरामद हो गया। उस समय महर्षि मांडव्य तप में लीन थे और मौन धारण किए हुए थे। सैनिकों ने उनसे प्रश्न किए, लेकिन मौन व्रत के कारण उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। सैनिकों ने इसे अपराधियों की सहायता समझा और चोरों के साथ महर्षि मांडव्य को भी बंदी बनाकर राजा के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। राजा ने बिना उचित जांच-पड़ताल के कठोर दंड सुना दिया। आदेश हुआ कि चोरों सहित महर्षि मांडव्य को भी शूली पर चढ़ा दिया जाए। राजा के आदेश का पालन हुआ और महर्षि मांडव्य को शूली पर बैठा दिया गया।
शूली पर भी जीवित रहे महर्षि मांडव्य
महर्षि मांडव्य महान तपस्वी थे। उनके तपोबल के प्रभाव से वे शूली पर बैठे रहने के बाद भी जीवित रहे। अनेक ऋषि-मुनियों ने यह अद्भुत दृश्य देखा और राजा को इसकी सूचना दी। तब राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। राजा स्वयं महर्षि के पास पहुंचे और उनसे क्षमा याचना की। उन्होंने महर्षि को शूली से उतरवाया, लेकिन शूली का एक भाग उनके शरीर में रह गया।
इसी कारण आगे चलकर वे अणिमांडव्य या मांडव्य ऋषि के नाम से भी प्रसिद्ध हुए, लेकिन राजा ने क्षमा मांग ली थी, किंतु महर्षि मांडव्य के मन में यह प्रश्न बना रहा कि उन्होंने ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसके कारण उन्हें इतना कठोर दंड भोगना पड़ा।
यमलोक पहुंचकर यमराज से पूछा कारण
अपने तपोबल से महर्षि मांडव्य यमलोक पहुंचे और धर्मराज यम से प्रश्न किया कि आखिर किस कर्म के कारण उन्हें यह पीड़ा सहनी पड़ी। यमराज ने उत्तर दिया कि बाल्यकाल में उन्होंने एक छोटे जीव को तिनके से चुभाकर कष्ट पहुंचाया था। उसी कर्म के फलस्वरूप उन्हें यह दंड प्राप्त हुआ।
यमराज का उत्तर सुनकर महर्षि मांडव्य आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा कि बाल्यावस्था में अज्ञानवश किए गए कर्मों के लिए इतना कठोर दंड देना न्याय के अनुरूप नहीं है। शास्त्रों में भी यह माना गया है कि एक निश्चित आयु तक बालक के कर्मों को पाप नहीं माना जाता।
महर्षि मांडव्य ने यमराज को दिया श्राप
धर्म और न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन देखकर महर्षि मांडव्य अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने यमराज से कहा कि उन्होंने धर्म की मर्यादा का पालन नहीं किया है और अल्प दोष के लिए अत्यधिक दंड प्रदान किया है। क्रोधित होकर महर्षि मांडव्य ने यमराज को श्राप दिया कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना होगा और पृथ्वी पर मानव जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनका जन्म उच्च कुल में नहीं, बल्कि दासी के गर्भ से होगा।
महर्षि के श्राप का प्रभाव तत्काल हुआ। देवताओं के लिए भी महर्षियों के श्राप को टालना अत्यंत कठिन माना गया है। इस प्रकार धर्मराज यम को पृथ्वी पर जन्म लेने का भाग्य स्वीकार करना पड़ा।
महाभारत में विदुर के रूप में हुआ यमराज का जन्म
समय बीतने पर महाभारत काल में यमराज ने विदुर के रूप में जन्म लिया। यह जन्म हस्तिनापुर के राजवंश में हुआ। जब राजा विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद वंश चलाने का संकट उत्पन्न हुआ, तब सत्यवती ने महर्षि वेदव्यास को नियोग द्वारा संतान उत्पन्न करने के लिए बुलाया।
वेदव्यास से धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ। उसी समय राजमहल की एक दासी के गर्भ से विदुर का जन्म हुआ। पौराणिक मान्यता के अनुसार यही विदुर वास्तव में धर्मराज यम के अंशावतार थे, जो महर्षि मांडव्य के श्राप के कारण मनुष्य रूप में अवतरित हुए थे।
विदुर बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय थे। उन्हें धर्मशास्त्रों का गहन ज्ञान था और वे सदैव सत्य का समर्थन करते थे। यद्यपि वे राजसिंहासन के अधिकारी नहीं थे, फिर भी हस्तिनापुर की राजनीति और शासन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
हस्तिनापुर में विदुर की भूमिका