Mahabharata Mythological Story: महाभारत के युद्ध में अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जिन्होंने युद्ध की दिशा और परिणाम को गहराई से प्रभावित किया। इन्हीं में से एक था भीमपुत्र घटोत्कच का वध। घटोत्कच केवल पांडवों का एक वीर योद्धा ही नहीं था, बल्कि वह राक्षस कुल और पांडव वंश के अद्भुत संगम का प्रतीक भी था। उसके पास मायावी शक्तियां थीं, जिनके कारण वह युद्धभूमि में अजेय माना जाता था। महाभारत के अठारह दिन के युद्ध में जब कौरव सेना पांडवों पर भारी पड़ने लगी, तब घटोत्कच ने ऐसा पराक्रम दिखाया कि पूरी कौरव सेना भयभीत हो उठी। अंततः उसका वध हुआ, लेकिन यह वध केवल एक योद्धा की मृत्यु नहीं था, बल्कि महाभारत के युद्ध की दिशा बदल देने वाली घटना थी। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण स्वयं इस घटना को युद्ध की विजय के लिए अत्यंत आवश्यक मानते थे।
कौन था घटोत्कच?
घटोत्कच महाबली भीम और राक्षसी हिडिंबा का पुत्र था। जब पांडव लाक्षागृह से बचकर वन में भटक रहे थे, तब उनका सामना हिडिंब नामक राक्षस और उसकी बहन हिडिंबा से हुआ। भीम ने हिडिंब का वध कर दिया। इसके बाद हिडिंबा ने भीम से विवाह किया और कुछ समय पश्चात घटोत्कच का जन्म हुआ।
जन्म के समय उसका सिर घड़े के समान गोल और बिना बालों का था, इसलिए उसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह बचपन से ही अत्यंत बलशाली था। अपनी माता से उसे राक्षसी मायावी शक्तियां प्राप्त हुई थीं, जबकि पिता भीम से अपार शारीरिक बल मिला था। यही कारण था कि वह युद्ध में साधारण योद्धाओं से कहीं अधिक शक्तिशाली माना जाता था।
महाभारत युद्ध में घटोत्कच का प्रवेश
महाभारत का युद्ध आरंभ होने पर घटोत्कच अपने पिता भीम और पांडवों की सहायता के लिए कुरुक्षेत्र पहुंचा। प्रारंभिक दिनों में उसने कई कौरव योद्धाओं का संहार किया। उसकी युद्ध शैली सामान्य योद्धाओं से भिन्न थी। वह अपनी माया से कभी विशालकाय रूप धारण कर लेता, कभी आकाश में उड़ने लगता और कभी हजारों योद्धाओं के समान दिखाई देता।
दिन में तो कौरव सेना किसी प्रकार उसका सामना कर लेती थी, लेकिन रात्रि के समय उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती थी। राक्षस होने के कारण रात में उसकी मायावी शक्तियां चरम पर पहुंच जाती थीं। यही कारण था कि जब युद्ध रात तक चलने लगा, तब कौरव पक्ष के लिए घटोत्कच सबसे बड़ा संकट बन गया।
जयद्रथ वध के बाद की स्थिति
महाभारत के चौदहवें दिन अर्जुन ने जयद्रथ का वध कर दिया। इस घटना से कौरव पक्ष अत्यंत क्रोधित हो गया। उसी रात युद्ध जारी रखने का निर्णय लिया गया। रात्रि युद्ध में घटोत्कच को अग्रिम मोर्चे पर भेजा गया। घटोत्कच ने युद्धभूमि में प्रवेश करते ही अपनी मायावी शक्तियों का प्रदर्शन आरंभ कर दिया। उसने आकाश से पत्थरों, पर्वतों और अस्त्रों की वर्षा जैसी माया रची। कौरव सेना के हाथी, घोड़े और रथ नष्ट होने लगे। अनेक महारथी उसकी माया को समझ ही नहीं पाए। उसके प्रहारों से कौरव सेना में भगदड़ मच गई। सैनिक भय के कारण युद्ध छोड़कर भागने लगे। जो योद्धा उसका सामना करने आते, वे उसकी माया में उलझ जाते। धीरे-धीरे कौरव सेना की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई।
अलायुध और अन्य राक्षसों का वध
घटोत्कच के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए दुर्योधन ने कई योद्धाओं को उसके विरुद्ध भेजा। इनमें राक्षस अलायुध भी था, जो अत्यंत बलशाली माना जाता था। अलायुध का उद्देश्य घटोत्कच को रोकना था, लेकिन युद्ध में घटोत्कच ने उसका भी वध कर दिया। इसके बाद उसने कौरव सेना पर और अधिक भीषण आक्रमण किया। उसके प्रहारों से हजारों सैनिक मारे गए। कौरव सेना का संगठन टूटने लगा और दुर्योधन स्वयं भयभीत हो उठा।
कर्ण के पास था इंद्र का दिव्य अस्त्र
महाभारत की कथा के अनुसार कर्ण के पास एक दिव्य अस्त्र था जिसे वासवी शक्ति कहा जाता था। यह अस्त्र उसे देवराज इंद्र से प्राप्त हुआ था। जब कर्ण जन्मजात कवच और कुंडल धारण किए हुए था, तब इंद्र ने ब्राह्मण का वेश धारण करके उससे दान में कवच और कुंडल मांग लिए। कर्ण ने दानवीर होने के कारण उन्हें दे दिया। बदले में इंद्र ने उसे वासवी शक्ति नामक दिव्य अस्त्र प्रदान किया।
इस अस्त्र की विशेषता थी कि इसका प्रयोग केवल एक बार किया जा सकता था, लेकिन जिस पर यह चलाया जाता, उसकी मृत्यु निश्चित होती थी। कर्ण ने यह अस्त्र विशेष रूप से अर्जुन के वध के लिए सुरक्षित रखा था। उसे विश्वास था कि उचित समय आने पर वह इसी अस्त्र से अर्जुन का अंत करेगा।
घटोत्कच ने कर्ण को संकट में डाल दिया
रात्रि युद्ध में घटोत्कच का पराक्रम लगातार बढ़ता जा रहा था। उसने अपनी माया से ऐसा भयंकर रूप धारण किया कि कौरव सेना में हाहाकार मच गया। अनेक रथ टूट गए, हाथी मारे गए और हजारों सैनिक युद्धभूमि में गिर पड़े। दुर्योधन ने कर्ण से सहायता मांगी। उसने कहा कि यदि घटोत्कच को नहीं रोका गया तो पूरी कौरव सेना नष्ट हो जाएगी। कर्ण ने अनेक अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन घटोत्कच की माया के सामने वे प्रभावी सिद्ध नहीं हुए। घटोत्कच लगातार आक्रमण करता रहा और कौरव सेना को विनाश की ओर धकेलता रहा। ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई कि कर्ण के सामने कोई अन्य विकल्प नहीं बचा।
क्यों करना पड़ा वासवी शक्ति का प्रयोग?
जब कर्ण ने देखा कि घटोत्कच को साधारण अस्त्रों से नहीं रोका जा सकता और कौरव सेना का विनाश निश्चित है, तब उसने अपना सबसे अमोघ अस्त्र वासवी शक्ति प्रयोग करने का निर्णय लिया। कर्ण जानता था कि यदि उसने यह अस्त्र घटोत्कच पर चला दिया, तो फिर वह अर्जुन के विरुद्ध इसका उपयोग नहीं कर पाएगा, लेकिन उस समय कौरव सेना को बचाने के लिए यही एकमात्र उपाय दिखाई दे रहा था। दुर्योधन और अन्य कौरव योद्धाओं के आग्रह पर कर्ण ने अंततः वासवी शक्ति का प्रयोग किया। दिव्य अस्त्र सीधे घटोत्कच की ओर बढ़ा और उसे भेद गया।
घटोत्कच का अंतिम पराक्रम
पौराणिक कथा के अनुसार जब घटोत्कच को ज्ञात हुआ कि उसका अंत निकट है, तब भी उसने अंतिम क्षणों में अपनी बुद्धिमत्ता और वीरता का परिचय दिया। मृत्यु से पहले उसने अपना शरीर अत्यंत विशाल बना लिया। उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया। जब वह धरती पर गिरा, तब उसके नीचे दबकर कौरव सेना के असंख्य सैनिक, घोड़े, हाथी और रथ नष्ट हो गए। इस प्रकार मृत्यु के क्षण में भी उसने कौरव पक्ष को भारी क्षति पहुंचाई। उसका अंतिम पराक्रम भी पांडवों के लिए लाभदायक सिद्ध हुआ।
श्रीकृष्ण क्यों हुए प्रसन्न?