Mahabharata: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में पृथ्वी पर अधर्म का भार अत्यधिक बढ़ गया था। अनेक अत्याचारी राजा और दुराचारी योद्धा पृथ्वी पर उत्पात मचा रहे थे। देवताओं ने भगवान विष्णु से पृथ्वी का भार कम करने की प्रार्थना की।
Mahabharata: महाभारत के महान धनुर्धर अर्जुन को केवल पांडवों में सबसे पराक्रमी योद्धा ही नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें भगवान श्रीहरि विष्णु के परम भक्त और दिव्य उद्देश्य के लिए अवतरित महापुरुष के रूप में भी देखा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में अर्जुन के पूर्व जन्म का उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार वे साधारण मनुष्य नहीं थे। महाभारत, भागवत पुराण और अन्य वैष्णव ग्रंथों में वर्णित कथा बताती है कि अर्जुन अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के नित्य पार्षद "नर" थे। यही कारण है कि महाभारत में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का अभिन्न सखा और धर्मस्थापना के महान कार्य का सहभागी बताया गया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि अर्जुन का पूर्व जन्म क्या था और उनसे जुड़ी यह पौराणिक कथा क्या कहती है।
अर्जुन का पूर्व जन्म कौन थे?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अर्जुन अपने पूर्व जन्म में "नर" ऋषि थे। नर और नारायण दोनों भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप माने जाते हैं। इन दोनों ने बदरिकाश्रम में कठोर तपस्या कर संसार में धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश का संकल्प लिया था। शास्त्रों में कहा गया है कि नर और नारायण दो शरीरों में प्रकट एक ही दिव्य शक्ति के प्रतीक थे। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब ये दोनों किसी न किसी रूप में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं। द्वापर युग में यही नर और नारायण क्रमशः अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए।
बदरिकाश्रम में नर-नारायण की तपस्या
पुराणों के अनुसार हिमालय स्थित पवित्र बदरिकाश्रम में नर और नारायण हजारों वर्षों तक तप में लीन रहे। उनकी तपस्या इतनी प्रभावशाली थी कि तीनों लोकों में उसका प्रभाव दिखाई देने लगा। देवताओं ने भी उनकी तपशक्ति का सम्मान किया।
इंद्र को जब यह आशंका हुई कि कहीं उनकी तपस्या के प्रभाव से उनका इंद्रासन संकट में न पड़ जाए, तब उन्होंने अनेक अप्सराओं को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा। किंतु नर और नारायण की एकाग्रता तनिक भी विचलित नहीं हुई। कथा के अनुसार भगवान नारायण ने अपनी जांघ से एक अद्भुत रूपवती स्त्री को प्रकट कर दिया, जो सभी अप्सराओं से अधिक सुंदर थी। उसी दिव्य स्त्री का नाम उर्वशी पड़ा। यह देखकर इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने नर-नारायण से क्षमा मांगी।
नर और नारायण का उद्देश्य
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि नर और नारायण केवल तपस्वी ही नहीं थे, बल्कि उनका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करना था। वे सदैव लोककल्याण और अधर्म के विनाश के लिए समर्पित रहे। इसी कारण जब द्वापर युग में पृथ्वी पर अत्याचारी राजाओं और अधर्म का प्रभाव बढ़ा, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया और उनके साथ नर भी अर्जुन के रूप में जन्म लेकर धर्मयुद्ध के महान कार्य में सहभागी बने।
अर्जुन और श्रीकृष्ण का विशेष संबंध
महाभारत में श्रीकृष्ण और अर्जुन का संबंध केवल मित्रता तक सीमित नहीं था। पौराणिक दृष्टि से यह नर और नारायण का पुनर्मिलन था। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अनेक अवसरों पर अर्जुन को अपना अत्यंत प्रिय सखा कहा है। भगवद्गीता का उपदेश भी अर्जुन को ही दिया गया, क्योंकि वे केवल योद्धा नहीं थे, बल्कि भगवान के दिव्य कार्य के सहयोगी भी थे।
महाभारत में वर्णित अनेक प्रसंगों में श्रीकृष्ण और अर्जुन की एकता स्पष्ट दिखाई देती है। चाहे खांडव वन दहन का प्रसंग हो, जरासंध वध की योजना हो, राजसूय यज्ञ की तैयारियां हों या फिर कुरुक्षेत्र का युद्ध—हर महत्वपूर्ण अवसर पर दोनों साथ दिखाई देते हैं।
क्यों लिया था अर्जुन ने मनुष्य रूप?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में पृथ्वी पर अधर्म का भार अत्यधिक बढ़ गया था। अनेक अत्याचारी राजा और दुराचारी योद्धा पृथ्वी पर उत्पात मचा रहे थे। देवताओं ने भगवान विष्णु से पृथ्वी का भार कम करने की प्रार्थना की, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया और उनके साथ नर ने अर्जुन के रूप में जन्म लिया। अर्जुन का जन्म केवल एक वीर योद्धा बनने के लिए नहीं था, बल्कि धर्म की पुनः स्थापना और अधर्म के अंत के लिए हुआ था।
इसी कारण अर्जुन के जीवन की प्रत्येक बड़ी घटना धर्मयुद्ध की तैयारी से जुड़ी दिखाई देती है। उनके अस्त्र-शस्त्र की प्राप्ति, दिव्य आयुधों का संग्रह, देवताओं से प्राप्त वरदान और महायुद्ध में उनकी भूमिका पहले से निर्धारित दिव्य योजना का हिस्सा मानी जाती है।
अर्जुन को प्राप्त हुए दिव्य अस्त्र
पूर्व जन्म में नर के दिव्य स्वरूप और महान तप के प्रभाव को देखते हुए अर्जुन को भी अपने जीवन में अनेक दिव्य अस्त्र प्राप्त हुए। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर पाशुपतास्त्र प्राप्त किया। इंद्रलोक जाकर अनेक दिव्य अस्त्रों का ज्ञान हासिल किया। वरुण, यम और कुबेर सहित अनेक देवताओं ने उन्हें दिव्य शस्त्र प्रदान किए। महाभारत में यह वर्णन मिलता है कि अर्जुन उन विरले योद्धाओं में थे जो दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करने की पूर्ण क्षमता रखते थे। यह योग्यता भी उनके दिव्य स्वरूप से जुड़ी मानी जाती है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)