Mahabharata: महाभारत के युद्ध में अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जो केवल युद्ध की घटनाएं नहीं, बल्कि उन प्रतिज्ञाओं की कहानी भी हैं, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी। दुशासन का वध भी ऐसा ही एक प्रसंग है। महाभारत के युद्ध में पांडवों के साथ-साथ कौरवों के भी योद्धाओं की भी मृत्यु हुई थी। इन्हीं में से एक था दुशासन। महाभारत के युद्ध में दुशासन का वध भीम ने किया था। उनका दोनों के बीच का युद्ध अत्यंत भयावह था। भीम द्वारा दुशासन का वध केवल धर्म युद्ध तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यह भीम की प्रतिज्ञा भी थी, जो भीम ने हस्तिनापुर की सभा में द्रौपदी के अपमान के समय ली गई थी। उस दिन भीम ने क्रोध से कांपते हुए कहा था कि वह दुशासन का वध करेगा और उसके रक्त से अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा। वर्षों बाद कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में यही प्रतिज्ञा दुशासन के अंत का कारण बनी। आइए जानते हैं इस प्रसंग से जुड़ी पौराणिक कथा...
द्यूतसभा में द्रौपदी का अपमान
महाभारत के अनुसार, जब दुर्योधन ने शकुनि की सहायता से युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा में पराजित कर दिया, तब पांडवों की समस्त संपत्ति, राज्य और स्वयं पांडव भी दांव पर हार गए। अंततः द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया गया। दुर्योधन ने क्रोधित होकर अपने भाई दुशासन को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को सभा में खींचकर लाए।
दुशासन ने द्रौपदी के केश पकड़कर उन्हें सभा में घसीटा। उस समय सभा में भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और अन्य अनेक महारथी उपस्थित थे, किंतु कोई भी द्रौपदी की रक्षा के लिए आगे नहीं आया। दुर्योधन के संकेत पर दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया। द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण को पुकारा और उनकी कृपा से चीर बढ़ता चला गया। दुशासन प्रयास करता रहा, किंतु द्रौपदी का वस्त्र समाप्त नहीं हुआ।
भीम का क्रोध और प्रतिज्ञा
द्रौपदी के अपमान का दृश्य देखकर भीम का क्रोध सीमा पार कर गया। उन्होंने सभा में ही दुशासन को ललकारते हुए प्रतिज्ञा की कि वे युद्ध में उसका वध करेंगे। महाभारत के सभा पर्व में वर्णित है कि भीम ने कहा कि यदि वे दुशासन की छाती चीरकर उसका रक्त न पिएं तो उन्हें अपने पूर्वजों की गति प्राप्त न हो।उसी समय भीम ने एक और प्रतिज्ञा ली थी, जो दुर्योंधन से जुड़ी थी। उस समय भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ने की भी प्रतिज्ञा की थी।
वनवास के वर्षों में प्रतिज्ञा की स्मृति
द्यूतसभा के बाद पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा। इन वर्षों में द्रौपदी का अपमान पांडवों के लिए कभी भुलाया नहीं जा सका। भीम बार-बार दुशासन और दुर्योधन को स्मरण करते और अपनी प्रतिज्ञा दोहराते थे। वनवास के दौरान जब भी द्रौपदी अपने अपमान की बात करतीं, भीम उन्हें आश्वस्त करते कि एक दिन कुरुक्षेत्र के रण में वे दुशासन का रक्त बहाकर अपने वचन को पूर्ण करेंगे।
कुरुक्षेत्र युद्ध का प्रारंभ
जब सभी प्रयास विफल हो गए और दुर्योधन ने पांडवों को पांच गांव तक देने से इंकार कर दिया, तब महाभारत का युद्ध आरंभ हुआ। युद्ध के प्रारंभिक दिनों में भीम ने कौरव सेना के अनेक योद्धाओं का वध किया। वे विशेष रूप से दुर्योधन और उसके भाइयों को खोजते रहते थे। दुशासन भी युद्धभूमि में एक प्रमुख योद्धा के रूप में उपस्थित था। उसे अपने बल और कौरव सेना की शक्ति पर अत्यधिक गर्व था। किंतु भीम की प्रतिज्ञा उसे भी ज्ञात थी।
युद्ध के सोलहवें दिन का प्रसंग