विज्ञापन
Home  mythology  mahabharat  mahabharata yudhishthir ne kyon khela dyut duryodhana aur shakuni ke shadyantra me kaise fase dharmraj

Mahabharata: युधिष्ठिर ने क्यों खेला विनाशकारी द्यूत? दुर्योधन और शकुनि के षड्यंत्र में कैसे फंसे धर्मराज

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata Mythological Story: हस्तिनापुर लौटने के बाद दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि से कहा कि जब तक पांडवों का यह वैभव बना रहेगा, तब तक कौरवों की प्रतिष्ठा कम होती जाएगी। शकुनि ने दुर्योधन की ईर्ष्या को समझते हुए द्यूत क्रीड़ा का उपाय सुझाया।

Mahabharata Mythological Story:
Mahabharata Mythological Story: महाभारत में द्यूत क्रीड़ा का प्रसंग केवल एक खेल नहीं था, बल्कि वह घटना थी जिसने हस्तिनापुर के राजवंश को गहरे संकट में डाल दिया। इंद्रप्रस्थ की समृद्धि, पांडवों की बढ़ती प्रतिष्ठा और युधिष्ठिर की लोकप्रियता देखकर दुर्योधन के मन में ईर्ष्या और असंतोष उत्पन्न हुआ। उसी ईर्ष्या को आधार बनाकर गांधार नरेश शकुनि ने ऐसा षड्यंत्र रचा, जिसमें धर्मराज युधिष्ठिर भी फंस गए। पौराणिक कथाओं के अनुसार युधिष्ठिर ने द्यूत खेलने का निर्णय अपनी व्यक्तिगत लालसा से नहीं, बल्कि राजधर्म, परंपरा और क्षत्रिय मर्यादा के कारण स्वीकार किया था।

इंद्रप्रस्थ की समृद्धि और दुर्योधन की ईर्ष्या

राजसूय यज्ञ के बाद पांडवों का वैभव चरम पर पहुंच गया था। इंद्रप्रस्थ नगरी अत्यंत समृद्ध हो चुकी थी और अनेक राजा युधिष्ठिर को चक्रवर्ती सम्राट के रूप में सम्मान देने लगे थे। जब दुर्योधन इंद्रप्रस्थ आया और उसने मायासभा का अद्भुत वैभव देखा, तो उसके मन में गहरी जलन उत्पन्न हुई। सभा में भ्रमित होकर वह जल और भूमि का अंतर नहीं समझ पाया, जिससे उसे अपमान का अनुभव हुआ।

हस्तिनापुर लौटने के बाद दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि से कहा कि जब तक पांडवों का यह वैभव बना रहेगा, तब तक कौरवों की प्रतिष्ठा कम होती जाएगी। शकुनि ने दुर्योधन की ईर्ष्या को समझते हुए द्यूत क्रीड़ा का उपाय सुझाया।

शकुनि की योजना

शकुनि द्यूत खेलने में अत्यंत कुशल माना जाता था। पौराणिक वर्णनों में उल्लेख मिलता है कि वह ऐसे पासों का प्रयोग करता था जो उसके इच्छानुसार परिणाम देते थे। उसने दुर्योधन से कहा कि यदि युधिष्ठिर को द्यूत के लिए आमंत्रित किया जाए, तो वे क्षत्रिय धर्म के कारण मना नहीं कर पाएंगे। दुर्योधन ने यह योजना धृतराष्ट्र के सामने रखी। प्रारंभ में धृतराष्ट्र संकोच में थे, किंतु पुत्र मोह के कारण अंततः उन्होंने द्यूत सभा आयोजित करने की अनुमति दे दी।

युधिष्ठिर ने आमंत्रण क्यों स्वीकार किया?

महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर द्यूत क्रीड़ा को शुभ नहीं मानते थे। उन्हें यह भी ज्ञात था कि शकुनि पासों का बड़ा खिलाड़ी है। फिर भी उन्होंने आमंत्रण अस्वीकार नहीं किया। इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। क्षत्रिय परंपरा का पालन करने के लिए, क्योंकि  उस समय किसी राजा द्वारा दी गई द्यूत की चुनौती को ठुकराना उचित नहीं माना जाता था। 
राजधर्म का पालन करने के लिए, क्योंकि धृतराष्ट्र हस्तिनापुर के ज्येष्ठ राजा थे। उनके आदेश को युधिष्ठिर ने सम्मान दिया। परिवारिक संबंध भी इसका एक कारण बनी, क्योंकि   कौरव और पांडव एक ही कुल के सदस्य थे। युधिष्ठिर को आशा थी कि सभा में कोई अन्याय नहीं होगा।

द्यूत सभा का आरंभ

युधिष्ठिर हस्तिनापुर पहुंचे। सभा में भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर और धृतराष्ट्र सहित अनेक प्रमुख व्यक्ति उपस्थित थे। दुर्योधन की ओर से शकुनि ने पासे फेंकने का दायित्व संभाला। शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा कि यदि वे खेल स्वीकार करते हैं तो दांव लगाना होगा। युधिष्ठिर ने आरंभ में धन और रत्नों को दांव पर लगाया। प्रत्येक बार शकुनि पासे फेंकता और युधिष्ठिर हारते चले जाते।

षड्यंत्र का जाल कैसे गहराता गया

जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ा, शकुनि युधिष्ठिर को बड़े दांव लगाने के लिए उकसाता रहा। पहले स्वर्ण, रत्न और संपत्ति हारी गई। उसके बाद रथ, हाथी, घोड़े और सेना दांव पर लगी। फिर इंद्रप्रस्थ का राज्य भी हार गया। सभा में विदुर ने बार-बार धृतराष्ट्र को चेताया कि यह अन्यायपूर्ण खेल है और इसे रोक देना चाहिए। किंतु दुर्योधन और शकुनि के प्रभाव में धृतराष्ट्र मौन बने रहे। युधिष्ठिर को विश्वास था कि अब भाग्य पलटेगा, परंतु शकुनि के पासे हर बार उसी के पक्ष में पड़ते रहे।

भाइयों को दांव पर लगाना

जब राज्य भी हार गया, तब शकुनि ने युधिष्ठिर को और उकसाया। उसने कहा कि अभी भी उनके पास बहुमूल्य संपत्ति शेष है। युधिष्ठिर ने क्रमशः नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम को दांव पर लगाया और उन्हें भी हार गए। इसके बाद उन्होंने स्वयं को दांव पर लगाया। पासे फिर शकुनि के पक्ष में गए और धर्मराज स्वयं भी पराजित हो गए।

द्रौपदी को दांव पर लगाने का प्रसंग

शकुनि ने यहीं नहीं रुकने दिया। उसने युधिष्ठिर से पूछा कि क्या अभी भी उनके पास कुछ शेष है। तब युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगा दिया। पासे फिर शकुनि के पक्ष में पड़े और द्रौपदी को भी कौरवों की दासी घोषित कर दिया गया। यहीं से सभा का वातावरण अत्यंत गंभीर हो गया। द्रौपदी को सभा में बुलाया गया और उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करने का प्रयास हुआ। भीष्म, द्रोण और अन्य महापुरुष उपस्थित होने पर भी परिस्थिति अत्यंत जटिल हो गई।

धृतराष्ट्र द्वारा वरदान

द्रौपदी ने सभा में धर्म और न्याय से संबंधित प्रश्न उठाए। उनके तर्कों और सभा में बढ़ते तनाव को देखकर धृतराष्ट्र चिंतित हो उठे। अंततः उन्होंने द्रौपदी से वर मांगने को कहा। द्रौपदी ने पहले युधिष्ठिर की मुक्ति मांगी, फिर अन्य पांडवों की। धृतराष्ट्र ने पांडवों को स्वतंत्र कर दिया और उनका राज्य भी लौटा दिया।

दूसरी द्यूत क्रीड़ा

दुर्योधन इस परिणाम से संतुष्ट नहीं था। उसने पुनः द्यूत खेलने का आग्रह किया। धृतराष्ट्र ने फिर अनुमति दे दी। इस बार शर्त रखी गई कि जो पक्ष हारेगा, उसे बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास करना होगा। युधिष्ठिर ने दूसरी बार भी द्यूत स्वीकार किया। शकुनि ने फिर अपने पक्ष में पासे चलाए और पांडव पराजित हो गए। इसके परिणामस्वरूप उन्हें वनवास के लिए प्रस्थान करना पड़ा।


यह भी पढ़ें:- 

Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 

Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 

Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel