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Mahabharata: परीक्षित का जन्म कैसे हुआ? जानिए श्रीकृष्ण की लीला की दिव्य कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata: कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश कर अद्भुत पराक्रम दिखाया। अनेक महारथियों से घिरे होने के बावजूद उन्होंने युद्धभूमि में वीरता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।

Mahabharata
Mahabharata Mythological Story: महाभारत के युद्ध के बाद जब कुरु वंश लगभग समाप्त हो चुका था, तब एक ऐसा प्रसंग घटित हुआ जिसने पूरे वंश की ज्योति को पुनः प्रज्वलित कर दिया। यह प्रसंग था महाराज परीक्षित के जन्म का। पौराणिक मान्यता के अनुसार परीक्षित का जन्म केवल एक राजकुमार का जन्म नहीं था, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य कृपा और संरक्षण का प्रत्यक्ष प्रमाण था। जब अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु का जीवन संकट में पड़ गया, तब स्वयं श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से उस बालक की रक्षा की। यही बालक आगे चलकर महाराज परीक्षित के नाम से विख्यात हुआ।

अभिमन्यु की वीरगति और उत्तरा का गर्भ

कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश कर अद्भुत पराक्रम दिखाया। अनेक महारथियों से घिरे होने के बावजूद उन्होंने युद्धभूमि में वीरता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। अंततः कौरव योद्धाओं ने मिलकर उनका वध कर दिया। उस समय अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा गर्भवती थीं। अभिमन्यु के निधन के बाद वही गर्भ कुरु वंश की अंतिम आशा बन गया। महाभारत युद्ध समाप्त होने पर पांडवों ने राज्य प्राप्त किया, किंतु कौरव पक्ष की पराजय से द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा के हृदय में प्रतिशोध की अग्नि धधक रही थी। उसने पांडव वंश को पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया।

अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र

एक रात अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर पर आक्रमण कर द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया। बाद में जब अर्जुन ने उसे पकड़ लिया, तब भी उसके मन का क्रोध शांत नहीं हुआ। उसने अंतिम उपाय के रूप में ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। पौराणिक कथाओं के अनुसार अश्वत्थामा ने वह अस्त्र सीधे उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु की ओर छोड़ दिया, ताकि पांडव वंश का अंतिम दीपक भी बुझ जाए। ब्रह्मास्त्र की अग्नि अत्यंत प्रचंड थी और उसके प्रभाव से समस्त दिशाएँ कांप उठीं। उत्तरा ने जब उस दिव्य अस्त्र का प्रभाव अनुभव किया, तब वे भयभीत होकर भगवान श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचीं।

उत्तरा की करुण पुकार

हे योगेश्वर, हे जगत के पालनहार! मेरे गर्भ में पल रहे इस बालक की रक्षा कीजिए। यह पांडव वंश की अंतिम आशा है। उत्तरा की करुण पुकार सुनकर श्रीकृष्ण तुरंत सक्रिय हुए। वे जानते थे कि यदि यह बालक नष्ट हो गया तो कुरु वंश की परंपरा समाप्त हो जाएगी।

श्रीकृष्ण की दिव्य लीला

भागवत पुराण और महाभारत के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से स्वयं उत्तरा के गर्भ में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने दिव्य तेजस्वी रूप धारण कर गर्भस्थ शिशु की रक्षा की। ब्रह्मास्त्र की अग्नि चारों ओर फैल गई, किंतु श्रीकृष्ण के सुदर्शन समान दिव्य प्रकाश के सामने उसका प्रभाव निष्फल हो गया। कथा में वर्णन मिलता है कि गर्भ में स्थित बालक ने एक अद्भुत पुरुष को देखा, जिनके हाथ में गदा थी और जिनका शरीर सूर्य के समान प्रकाशमान था। वही श्रीकृष्ण थे, जिन्होंने उस बालक को अपने तेज से आच्छादित कर लिया। इस प्रकार अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र शिशु का कुछ भी अनिष्ट न कर सका।

परीक्षित का जन्म

समय आने पर उत्तरा ने एक पुत्र को जन्म दिया। यह समाचार सुनकर पांडवों और समस्त हस्तिनापुर में हर्ष की लहर दौड़ गई। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने उस बालक को अत्यंत स्नेह से अपनाया। सभी जानते थे कि यह बालक श्रीकृष्ण की विशेष कृपा से जीवित बचा है। जन्म के समय बालक के शरीर पर दिव्य तेज दिखाई देता था। ऋषि-मुनियों ने उसके जन्म को अत्यंत शुभ बताया और कहा कि यह बालक आगे चलकर धर्मपूर्वक राज्य करेगा।

‘परीक्षित’ नाम क्यों पड़ा?

बालक का नामकरण करते समय एक विशेष बात देखी गई। गर्भ में रहते हुए उसने जिस दिव्य पुरुष के दर्शन किए थे, जन्म के बाद वह प्रत्येक व्यक्ति के मुख में उसी रूप को खोजने का प्रयास करता था। वह मानो सबकी परीक्षा कर रहा हो कि गर्भ में जिसने उसकी रक्षा की थी, वह कौन था। इसी कारण उसका नाम “परीक्षित” रखा गया। संस्कृत में “परीक्षित” का अर्थ है- जो परीक्षा करे या खोज करे।

श्रीकृष्ण का आशीर्वाद

नामकरण के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण ने बालक को आशीर्वाद दिया कि वह धर्म की रक्षा करेगा और कुरु वंश की कीर्ति को आगे बढ़ाएगा। आगे चलकर परीक्षित ने हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठकर न्याय और धर्म के अनुसार राज्य किया। भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि महाराज परीक्षित ने अपने जीवन के अंतिम सात दिनों में श्री शुकदेव जी से श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रवण किया था, जिसके कारण वे वैष्णव परंपरा में अत्यंत आदरणीय माने जाते हैं।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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