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Mahabharata: कुंती को कैसे मिला था वह दिव्य मंत्र, जिसने बदल दी महाभारत की दिशा?

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata: कुंती का वास्तविक नाम पृथा था। वे राजा शूरसेन की पुत्री थीं। बाद में शूरसेन ने अपनी पुत्री को अपने मित्र और संबंधी राजा कुंतिभोज को गोद दे दिया। 

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Mahabharata Mythological Story: महाभारत में कुंती का जीवन कई रहस्यमयी घटनाओं से जुड़ा हुआ है। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण वह दिव्य मंत्र है, जिसके कारण देवताओं का आह्वान संभव हुआ और आगे चलकर महाभारत की पूरी कथा की दिशा बदल गई। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह मंत्र कुंती को महर्षि दुर्वासा से प्राप्त हुआ था। यह कोई साधारण वरदान नहीं था, बल्कि ऐसा दिव्य मंत्र था जिसके उच्चारण से किसी भी देवता को बुलाया जा सकता था और उनसे संतान प्राप्त की जा सकती थी। कुंती को यह मंत्र कैसे मिला, इसके पीछे एक विस्तृत पौराणिक कथा वर्णित है, जो उनके बचपन और महर्षि दुर्वासा की सेवा से जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं यह प्रसंग...

कुंती का प्रारंभिक जीवन

कुंती का वास्तविक नाम पृथा था। वे राजा शूरसेन की पुत्री थीं। बाद में शूरसेन ने अपनी पुत्री को अपने मित्र और संबंधी राजा कुंतिभोज को गोद दे दिया। कुंतिभोज ने उनका पालन-पोषण अत्यंत स्नेहपूर्वक किया और तभी से वे कुंती कहलाने लगीं। कुंती बचपन से ही विनम्र, धैर्यवान और सेवा-भाव से युक्त थीं। राजमहल में आने वाले अतिथियों और ऋषि-मुनियों की सेवा करना उन्हें विशेष रूप से प्रिय था।

महर्षि दुर्वासा का आगमन

एक बार प्रसिद्ध तपस्वी महर्षि दुर्वासा राजा कुंतिभोज के महल में पधारे। दुर्वासा ऋषि अपने क्रोध के लिए विख्यात थे। उनकी सेवा में यदि तनिक भी त्रुटि हो जाती, तो वे तुरंत शाप दे देते थे। इसी कारण राजा कुंतिभोज उनके स्वागत और सेवा को लेकर अत्यंत चिंतित थे। राजा ने यह दायित्व युवा कुंती को सौंपा। कुंती ने पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ महर्षि की सेवा आरंभ की। वे उनके भोजन, विश्राम, स्नान और अन्य आवश्यकताओं का अत्यंत ध्यान रखती थीं।

कुंती की सेवा से प्रसन्न हुए दुर्वासा

कई दिनों तक महर्षि दुर्वासा महल में रहे। इस दौरान कुंती ने कभी भी सेवा में लापरवाही नहीं की। वे धैर्यपूर्वक ऋषि के प्रत्येक आदेश का पालन करती रहीं। दुर्वासा ऋषि ने देखा कि इतनी कम आयु में भी कुंती में अद्भुत संयम और सेवा-भाव है। वे उनकी निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए। महल से प्रस्थान करने से पहले उन्होंने कुंती को एक गुप्त और दिव्य मंत्र प्रदान किया।

दिव्य मंत्र का वरदान

महर्षि दुर्वासा ने कुंती से कहा कि यह मंत्र अत्यंत शक्तिशाली है। यदि वे इस मंत्र का स्मरण करके किसी देवता का आह्वान करेंगी, तो वह देवता उनके समक्ष प्रकट होगा और अपनी कृपा प्रदान करेगा। पौराणिक वर्णनों के अनुसार यह मंत्र देवताओं को तत्काल आकर्षित करने की क्षमता रखता था। दुर्वासा ने इसे अत्यंत गोपनीय बताते हुए सावधानी से प्रयोग करने का निर्देश भी दिया।

कुंती ने जिज्ञासावश किया मंत्र का प्रयोग

कुंती उस समय किशोर अवस्था में थीं। उन्हें महर्षि द्वारा दिए गए मंत्र की शक्ति पर आश्चर्य हुआ। एक दिन प्रातःकाल सूर्यदेव की ओर देखकर उनके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि क्या यह मंत्र वास्तव में इतना प्रभावशाली है। उन्होंने स्नान करके पवित्र अवस्था में मंत्र का उच्चारण किया और सूर्यदेव का आह्वान किया। मंत्र के प्रभाव से तेजस्वी सूर्यदेव उनके सामने प्रकट हो गए।

प्रकट हुए सूर्यदेव

सूर्यदेव के प्रकट होते ही कुंती भयभीत हो गईं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि उन्होंने केवल मंत्र की परीक्षा लेने के लिए उनका आह्वान किया था। पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि सूर्यदेव ने उन्हें आश्वस्त किया कि उनका आह्वान निष्फल नहीं हो सकता, क्योंकि महर्षि दुर्वासा का मंत्र अचूक था। सूर्यदेव ने अपने दिव्य तेज से कुंती को एक पुत्र प्रदान किया।

कर्ण का जन्म

सूर्यदेव से प्राप्त पुत्र जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडलों से युक्त था। वही बालक आगे चलकर महाभारत का महान योद्धा कर्ण कहलाया। उस समय अविवाहित होने के कारण कुंती अत्यंत चिंतित हो गईं। समाज की मर्यादाओं को देखते हुए उन्होंने नवजात शिशु को एक संदूक में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया। बाद में अधिरथ और राधा ने उस बालक का पालन-पोषण किया।

विवाह के बाद मंत्र का पुनः प्रयोग

बाद में कुंती का विवाह हस्तिनापुर के राजा पांडु से हुआ। जब पांडु को ऋषि किंडम के शाप के कारण संतान प्राप्ति में बाधा हुई, तब कुंती ने महर्षि दुर्वासा से प्राप्त उसी दिव्य मंत्र का स्मरण किया। उन्होंने धर्मराज यम का आह्वान किया, जिनसे युधिष्ठिर का जन्म हुआ। इसके बाद वायु देव से भीम और इंद्र से अर्जुन का जन्म हुआ। कुंती ने यह मंत्र पांडु की दुसरी पत्नी माद्री को भी बताया। माद्री ने अश्विनी कुमारों का आह्वान किया, जिनसे नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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