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Mahabharata: अज्ञातवास का रहस्य खुलने से पहले अर्जुन ने कैसे बचाई विराट नगरी? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata Story: अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठिर ने कंक नामक सभासद का रूप धारण किया, भीम बल्लव नाम से राजभोजनालय में कार्य करने लगे, नकुल अश्वपाल बने, सहदेव गौपालक बने और द्रौपदी सैरंध्री के रूप में महारानी सुदेष्णा की सेवा करने लगीं।

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Mahabharata Mythological Story: महाभारत में पांडवों का अज्ञातवास केवल छिपकर रहने की कथा नहीं, बल्कि बुद्धि, धैर्य और युद्धकौशल की परीक्षा भी था। वनवास के बारह वर्ष पूर्ण होने के बाद पांडवों को एक वर्ष तक अज्ञातवास में रहना था। यदि इस अवधि में उनकी पहचान उजागर हो जाती, तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी कारण विराट नगर में वे भिन्न-भिन्न रूप धारण कर रहने लगे। लेकिन अज्ञातवास के अंतिम दिनों में कौरवों ने विराट राज्य पर आक्रमण कर दिया और परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अर्जुन को अपना रूप प्रकट किए बिना ही विराट नगरी की रक्षा करनी पड़ी। यही प्रसंग महाभारत की सबसे रोचक और महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।

विराट नगर में पांडवों का गुप्त निवास

अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठिर ने कंक नामक सभासद का रूप धारण किया, भीम बल्लव नाम से राजभोजनालय में कार्य करने लगे, नकुल अश्वपाल बने, सहदेव गौपालक बने और द्रौपदी सैरंध्री के रूप में महारानी सुदेष्णा की सेवा करने लगीं। अर्जुन ने उर्वशी के शाप के कारण प्राप्त नपुंसक रूप को अपनाते हुए बृहन्नला नाम से राजकुमारी उत्तरा को नृत्य-संगीत सिखाने का कार्य स्वीकार किया।

कौरवों की योजना और विराट पर आक्रमण

दुर्योधन को संदेह था कि पांडव किसी न किसी राज्य में छिपे हुए हैं। जब कीचक का वध हुआ, तब उसे विश्वास होने लगा कि पांडव विराट राज्य में ही हैं, क्योंकि ऐसा पराक्रम केवल भीम ही कर सकते थे। पांडवों को पहचानने के उद्देश्य से कौरवों ने एक योजना बनाई। त्रिगर्त नरेश सुशर्मा ने विराट राज्य पर एक ओर से आक्रमण किया। राजा विराट अपनी सेना लेकर उससे युद्ध करने चले गए। इसी बीच दुर्योधन, भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य के नेतृत्व में कौरवों की विशाल सेना ने दूसरी ओर से विराट की गौधन-सम्पत्ति पर आक्रमण कर दिया। उनका उद्देश्य गौधन हरण करना और साथ ही पांडवों को युद्ध के लिए बाहर आने पर विवश करना था।

राजकुमार उत्तर का उत्साह

जब कौरव सेना ने गौधन हरण किया, उस समय राजा विराट नगर में उपस्थित नहीं थे। राजकुमार उत्तर ने सभा में घोषणा की कि वह अकेले ही कौरवों को परास्त कर गौधन वापस ले आएगा। किंतु जब युद्धभूमि में जाने का समय आया, तब उसके पास कोई सारथी नहीं था, तब द्रौपदी ने सुझाव दिया कि बृहन्नला को सारथी बना लिया जाए। राजकुमार उत्तर को यह प्रस्ताव पहले विचित्र लगा, क्योंकि बृहन्नला को वह नृत्य-संगीत सिखाने वाली नपुंसक समझता था। फिर भी परिस्थितियों के कारण उसने बृहन्नला को अपने साथ चलने की अनुमति दे दी।

कौरव सेना को देखकर उत्तर भयभीत हुआ

जब रथ युद्धभूमि के निकट पहुंचा, तब राजकुमार उत्तर ने कौरवों की विशाल सेना देखी। उसके सामने भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य और दुर्योधन जैसे महायोद्धा थे। इतनी बड़ी सेना देखकर उसका साहस टूट गया। उसने अर्जुन से कहा कि वह युद्ध नहीं कर सकता और रथ वापस मोड़ना चाहता है, तब बृहन्नला रूप में बैठे अर्जुन ने उसे धैर्य बंधाया। उन्होंने कहा कि वह केवल रथ संभाले और शेष युद्ध वे स्वयं करेंगे। उत्तर को यह बात असंभव लगी, क्योंकि उसके सामने तो एक नपुंसक खड़ा था।

शमी वृक्ष से निकले दिव्य अस्त्र

अर्जुन राजकुमार उत्तर को नगर के बाहर स्थित उस शमी वृक्ष के पास ले गए जहाँ पांडवों ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र छिपाए थे। उन्होंने वृक्ष से गांडीव धनुष, अक्षय तूणीर और अन्य दिव्य आयुध उतारे। जब उत्तर ने देखा कि बृहन्नला दिव्य अस्त्र धारण कर रहा है और उसका रूप बदल रहा है, तब अर्जुन ने अपना वास्तविक परिचय दिया। उन्होंने बताया कि वे पांडवों में तृतीय भाई अर्जुन हैं और अज्ञातवास की रक्षा के लिए ही अब तक बृहन्नला बने रहे। यह सुनकर राजकुमार उत्तर विस्मित रह गया। उसने अर्जुन के चरणों में प्रणाम किया और स्वयं सारथी बनने का आग्रह किया। अर्जुन ने उसे रथ संचालन का कार्य सौंपा और स्वयं युद्ध के लिए तैयार हो गए।

अर्जुन का विराट पराक्रम

गांडीव हाथ में लेते ही अर्जुन का तेज प्रकट हो उठा। उन्होंने शंखनाद किया, जिसकी ध्वनि सुनकर कौरव सेना चौंक उठी। भीष्म और द्रोण समझ गए कि यह कोई साधारण योद्धा नहीं, बल्कि स्वयं अर्जुन हैं। अर्जुन ने पहले गौधन को सुरक्षित करवाया और फिर कौरव सेना पर बाणों की वर्षा आरंभ कर दी। उनके तीव्र प्रहारों से सेना में हाहाकार मच गया। कर्ण ने उनका सामना करने का प्रयास किया, किंतु अर्जुन के बाणों के आगे टिक न सका। अश्वत्थामा और कृपाचार्य भी उनके प्रहारों से विचलित हुए। भीष्म और द्रोण अर्जुन के पराक्रम को देखकर प्रसन्न भी थे, क्योंकि वे जानते थे कि उनके प्रिय शिष्य ने अपने दिव्य कौशल को अक्षुण्ण रखा है।

सम्मोहनास्त्र का प्रयोग

जब युद्ध लंबा खिंचने लगा, तब अर्जुन ने सम्मोहनास्त्र का प्रयोग किया। इस दिव्य अस्त्र के प्रभाव से कौरव सेना के अनेक योद्धा मूर्छित हो गए। दुर्योधन सहित कई महारथियों के हाथों से अस्त्र छूट गए और सेना में भगदड़ मच गई। अर्जुन ने इस अवसर का लाभ उठाकर गौधन को मुक्त कराया और विराट राज्य की सम्पत्ति को सुरक्षित वापस ले आए।

विराट नगरी की रक्षा

यह युद्ध उस समय हुआ जब पांडवों के अज्ञातवास की अवधि लगभग पूर्ण हो चुकी थी। कौरवों को संदेह अवश्य हुआ कि यह अर्जुन ही हैं, किंतु जब गणना की गई तो स्पष्ट हुआ कि अज्ञातवास की निर्धारित अवधि समाप्त हो चुकी थी। इस प्रकार कौरव पांडवों को पुनः वनवास भेजने में असफल रहे। अर्जुन ने बृहन्नला के रूप में रहते हुए अंतिम क्षण तक अपनी पहचान गुप्त रखी। केवल जब विराट राज्य पर संकट आया और गौधन की रक्षा असंभव हो गई, तभी उन्होंने अपना वास्तविक रूप धारण किया। उनके पराक्रम से न केवल विराट नगरी सुरक्षित हुई, बल्कि पांडवों का अज्ञातवास भी सफलतापूर्वक पूर्ण हुआ।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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