Ganga Mythology: इक्ष्वाकु वंश में राजा सगर हुए। वे अत्यंत पराक्रमी और धर्मात्मा थे। सगर ने सौ पत्नियों से साठ हजार पुत्र प्राप्त किए थे। एक पत्नी सुमति से असमंज की तरह एक पुत्र और दूसरी केशिनी से साठ हजार पुत्र की प्राप्ति हुई थी।
Ganga Mythological Story: हिंदू धर्म में माँ गंगा को सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इन्हें देवनदी, सुरसरि, मंदाकिनी, भागीरथी, जाह्नवी, अलकनंदा आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है, पर सबसे रहस्यमयी और प्रचलित नाम है त्रिपथगा। त्रिपथगा का अर्थ है “तीन पथों पर बहने वाली”। यह नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि गंगा तीनों लोकों में बहती हैं। स्वर्गलोक में मंदाकिनी के नाम से, पाताललोक में भागीरथी या अलकनंदा के रूप में और पृथ्व पर गंगा के नाम से, इसीलिए इन्हें त्रिपथगा कहा जाता है। किंतु गंगा का धरती पर अवतरण कोई साधारण घटना नहीं थी। यह एक ऐसी तपस्या, श्राप, प्रार्थना और दैवी कृपा की लंबी कथा है, जो सगर वंश के साठ हजार राजकुमारों के उद्धार से जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा...
सगर वंश की शुरुआत और अश्वमेध यज्ञ
इक्ष्वाकु वंश में राजा सगर हुए। वे अत्यंत पराक्रमी और धर्मात्मा थे। सगर ने सौ पत्नियों से साठ हजार पुत्र प्राप्त किए थे। एक पत्नी सुमति से असमंज की तरह एक पुत्र और दूसरी केशिनी से साठ हजार पुत्र की प्राप्ति हुई थी। राजा सगर ने अपनी सम्राटी सिद्ध करने के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया। यज्ञ का घोड़ा छोड़ा गया। इन्द्र को भय हुआ कि सगर पूरे विश्व के चक्रवर्ती सम्राट बन जाएंगे, इसलिए उन्होंने छल से यज्ञ के घोड़े को चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। कपिल मुनि उस समय गहन समाधि में थे।
साठ हजार राजकुमारों का अपराध और श्राप
सगर के साठ हज़ार पुत्र घोड़े को खोजते-खोजते कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंचे। घोड़ा वहां बंधा देखकर उन्होंने क्रोधित होकर मुनि को चोर समझ लिया और अपशब्द कहते हुए उन पर आक्रमण करने दौड़े। कपिल मुनि समाधि से जागे। उनके नेत्रों से योगाग्नि निकली और एक क्षण में सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गए। केवल उनकी राख का ढेर रह गया।
भगीरथ की कठोर तपस्या
जब यह समाचार राजा सगर को मिला तो वे अत्यंत दुखी हुए। उनके बाद उनका पौत्र यानी असमंज का पुत्र अंशुमान और फिर दिलीप राजा बने, पर किसी में भी साठ हजार चाचाओं की राख को गंगा जल से तर्पण कर उद्धार करने की शक्ति नहीं थी। अंत में दिलीप के पुत्र भगीरथ ने राज-पाट त्याग दिया और हिमालय पर जाकर घोर तपस्या शुरू की। भगीरथ एक पैर पर खड़े होकर हजारों वर्ष तक ब्रह्मा जी की आराधना करते रहे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वर मांगने को कहा।
भगीरथ ने कहा- हे पितामह, मेरे साठ हजार पूर्वज कपिल मुनि के श्राप से राख हो गए हैं। उनका उद्धार तभी होगा जब स्वर्ग की गंगा धरती पर अवतरित होकर उनकी राख का स्पर्श करें। कृपा कर गंगा को पृथ्वी पर भेजें। ब्रह्मा जी बोले- वत्स, गंगा मेरा मानस-पुत्र है और बड़ा अभिमानी है। उसका वेग इतना प्रचंड है कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर पाएगी। तुम भगवान शिव से प्रार्थना करो कि वे अपनी जटाओं में गंगा को रोक लें, अन्यथा सारा विश्व नष्ट हो जाएगा।
गंगा का स्वर्ग से अवतरण
भगीरथ ने फिर हिमालय के कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव की आराधना शुरू की। वे एक पैर पर खड़े होकर जप करते रहे। हजारों वर्ष बीत गए। अंत में भगवान शंकर प्रसन्न हुए और भगीरथ के सामने प्रकट हुए। भगीरथ ने सारा वृत्तांत सुनाया और गंगा को पृथ्वी पर लाने की प्रार्थना की। शिव जी ने स्वीकार कर लिया। इधर स्वर्ग में जब गंगा को पता चला कि उसे पृथ्वी पर जाना है तो उसका अभिमान जाग उठा। उसने सोचा, “मैं इतने वेग से गिरूँगी कि शिव जी को भी बहा ले जाऊँगी।”
शिव जी यह जान गए। जब गंगा घमंड से भरी हुई स्वर्ग से गरजती-चमकती हुई गिरी तो भगवान शिव ने अपनी एक जटा खोली और गंगा उसमें समा गई। गंगा जटा-जाल में भटकती रही, उसे बाहर निकलने का मार्ग ही नहीं मिला। भगीरथ व्याकुल हो गए। उन्होंने फिर शिव जी की स्तुति की, तब शिव जी ने अपनी जटा हल्की सी हिलाई और गंगा की एक पतली धारा बाहर निकली। वह धारा इतनी पवित्र और शीतल थी कि स्वर्ग के देवता, गंधर्व, किन्नर सब आश्चर्य करने लगे।
गंगा का पृथ्वी पर प्रवाह
शिव जी की जटाओं से निकलकर गंगा बिंदु सरोवर (हिमालय) में गिरी। वहाँ से सात धाराओं में बँट गई। तीन धाराएँ पूर्व की ओर, तीन पश्चिम की ओर और सातवीं धारा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चली, इसलिए गंगा को भागीरथी भी कहते हैं। रास्ते में जह्नु मुनि का आश्रम पड़ा। गंगा का वेग इतना था कि उसने मुनि के यज्ञ-वेदी को बहा दिया। जह्नु मुनि क्रोधित हो गए और एक घूंट में सारी गंगा पी गए। भगीरथ फिर घबरा गए। उन्होंने जह्नु मुनि की स्तुति की। मुनि प्रसन्न हुए और अपने कान से गंगा को बाहर निकाल दिया, इसलिए गंगा को जाह्नवी (जह्नु की पुत्री) भी कहा जाता है।
सागर पुत्रों का उद्धार और गंगा-सागर
अंत में गंगा उस स्थान पर पहुँची, जहाँ सगर के साठ हजार पुत्रों की राख पड़ी थी। जैसे ही गंगा जल ने राख का स्पर्श किया, सभी राजकुमारों को स्वर्ग लोक की प्राप्ति हुई। इस प्रकार भगीरथ की हजारों वर्षों की तपस्या सफल हुई, तभी से गंगा को “भागीरथी” भी कहा जाता है, क्योंकि भगीरथ के अथक प्रयास से ही वह धरती पर आईं।
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)