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Bhagavata Purana: यमुना में रहने वाले कालिया नाग का भगवान कृष्ण ने कैसे किया दमन? जानिए पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Bhagavata Purana: कालिया ने भगवान से निवेदन किया कि यदि वह रमणक द्वीप लौटेगा तो गरुड़ उसे पुनः मारने का प्रयास करेंगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने चरणचिह्न कालिया के फनों पर अंकित कर दिए। 

Bhagavata Purana
Bhagavata Purana: भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की अनेक लीलाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण में मिलता है। इन्हीं दिव्य लीलाओं में से एक है कालिया नाग दमन की कथा, जिसे वैष्णव परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह घटना उस समय की है, जब भगवान श्रीकृष्ण गोकुल से वृंदावन आ चुके थे और अपने सखा-संगियों के साथ प्रतिदिन गायें चराने जाया करते थे। उसी समय यमुना नदी का एक भाग कालिया नामक विषैले नाग के कारण इतना भयावह बन चुका था कि वहां पक्षी तक उड़ते-उड़ते गिर जाते थे। जल पूरी तरह विषाक्त हो चुका था और आसपास का वातावरण भी जहरीली वायु से दूषित रहता था।

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों, ब्रजवासियों और समस्त जीवों की रक्षा के लिए यमुना में प्रवेश किया और कालिया नाग का ऐसा दमन किया कि अंततः उसे अपना निवास छोड़कर समुद्र की ओर जाना पड़ा। आइए जानते हैं इस संपूर्ण पौराणिक कथा के बारे में...

यमुना का वह विषैला हिस्सा

वृंदावन के निकट यमुना नदी में एक गहरा कुंड था। यही स्थान कालिया नाग का निवास बन चुका था। उसके विष के प्रभाव से उस कुंड का जल पूरी तरह जहरीला हो गया था। महापुराण में वर्णन मिलता है कि उस स्थान पर यदि कोई पशु-पक्षी भी पहुंच जाता तो विष के प्रभाव से तत्काल प्राण त्याग देता था। यहां तक कि उस कुंड के ऊपर से उड़ने वाले पक्षी भी विषैली वायु के कारण नीचे गिर पड़ते थे। ब्रजवासी इस स्थान से दूर रहने की सलाह देते थे। माता यशोदा, नंद बाबा और ग्वालबाल भी जानते थे कि यमुना का यह भाग अत्यंत खतरनाक है। इसलिए सभी वहां जाने से बचते थे।

कालिया नाग यमुना में कैसे पहुंचा?

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, कालिया नाग मूल रूप से समुद्र स्थित रमणक द्वीप में रहता था। वहां नागों का निवास था और गरुड़ समय-समय पर वहां जाकर नागों को अपना आहार बनाते थे। एक बार कालिया ने अत्यधिक अहंकार में आकर गरुड़ का अपमान कर दिया। उसने गरुड़ के अधिकार को चुनौती दी और उनके लिए रखे गए अर्पण को स्वयं ग्रहण कर लिया।

इससे गरुड़ अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने कालिया पर आक्रमण कर दिया। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ, लेकिन गरुड़ की शक्ति के सामने कालिया टिक नहीं सका। अपनी जान बचाने के लिए वह वहां से भाग निकला। भागते-भागते कालिया यमुना नदी के उस गहरे कुंड में आकर रहने लगा, जहां महर्षि सौभरि के शाप के कारण गरुड़ प्रवेश नहीं कर सकते थे। इसी कारण कालिया ने उस स्थान को अपना स्थायी निवास बना लिया और वर्षों तक वहीं रहने लगा।

यमुना का जल पीते ही ग्वालबाल और गायें हो गईं अचेत

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपने सखा-संगियों और गायों के साथ वन में विचरण कर रहे थे। खेलते-खेलते सभी को तीव्र प्यास लगी। उन्हें ज्ञात नहीं था कि सामने का जल कालिया के विष से दूषित है। ग्वालबालों और गायों ने जैसे ही यमुना का जल पिया, वे तत्काल अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। पूरा वातावरण शोकपूर्ण हो गया। श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य कृपा-दृष्टि से सभी ग्वालबालों और गायों को पुनः जीवित कर दिया। सभी स्वस्थ हो गए, लेकिन श्रीकृष्ण समझ गए कि यमुना को कालिया के विष से मुक्त कराना अब आवश्यक हो चुका है।

कदंब वृक्ष पर चढ़कर श्रीकृष्ण ने यमुना में लगाई छलांग

यमुना तट पर एक विशाल कदंब वृक्ष खड़ा था। श्रीकृष्ण उसी वृक्ष पर चढ़ गए। ग्वालबाल उन्हें रोकते रहे, लेकिन उन्होंने किसी की बात नहीं मानी। कुछ ही क्षण बाद श्रीकृष्ण ने ऊंचे कदंब वृक्ष से यमुना के विषैले कुंड में एक विशाल छलांग लगा दी। उनके जल में प्रवेश करते ही यमुना में तेज लहरें उठने लगीं। जल चारों ओर उफान मारने लगा और पूरे कुंड में हलचल मच गई। यह देखकर कालिया नाग अत्यंत क्रोधित हो उठा। उसने देखा कि एक बालक निर्भय होकर उसके निवास में प्रवेश कर चुका है।

कालिया नाग ने श्रीकृष्ण को अपने फनों में जकड़ लिया

कालिया नाग विशाल शरीर वाला और अनेक फनों से युक्त था। वह तेजी से श्रीकृष्ण के पास पहुंचा और अपने विशाल कुंडलों में उन्हें कसकर लपेट लिया। कुछ समय तक ऐसा प्रतीत हुआ मानो भगवान श्रीकृष्ण नाग के बंधन में आ गए हों। इधर यह समाचार वृंदावन पहुंचा तो नंद बाबा, माता यशोदा, रोहिणी माता, बलराम और समस्त ब्रजवासी घबराकर यमुना तट की ओर दौड़े। सभी अत्यंत व्याकुल थे। माता यशोदा अपने पुत्र को नाग के बंधन में देखकर विलाप करने लगीं। बलराम शांत रहे, क्योंकि वे भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य शक्ति से परिचित थे। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि यह लीला शीघ्र ही समाप्त होगी।

श्रीकृष्ण ने नाग के बंधन को तोड़ दिया

कुछ समय बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपना दिव्य स्वरूप प्रकट किया। उनका शरीर इतना विशाल और तेजस्वी हो गया कि कालिया के कुंडल स्वयं ढीले पड़ने लगे। क्षणभर में श्रीकृष्ण नाग के बंधन से मुक्त हो गए। इसके बाद वे अत्यंत तीव्र गति से कालिया के चारों ओर घूमने लगे। कालिया उन्हें पकड़ने का प्रयास करता रहा, लेकिन भगवान उसकी पकड़ से बाहर रहे। इस संघर्ष से कालिया धीरे-धीरे थकने लगा। उसका विष भी निष्प्रभावी होने लगा और उसकी शक्ति क्षीण पड़ गई।

भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया के फनों पर किया दिव्य नृत्य

जब कालिया पूरी तरह थक गया, तब श्रीकृष्ण एक ही छलांग में उसके सबसे बड़े फन पर चढ़ गए। इसके बाद उन्होंने उसके अनेक फनों पर दिव्य नृत्य आरंभ कर दिया। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण के चरण जहां-जहां पड़ते, वहां-वहां कालिया के फन दबने लगते। वह अत्यंत पीड़ा से तड़पने लगा। उसके मुख से रक्त निकलने लगा और उसका सारा अहंकार समाप्त होने लगा। देवता, गंधर्व, सिद्ध, चारण और अप्सराएं इस अद्भुत लीला को देखने के लिए आकाश में एकत्र हो गए। उन्होंने पुष्पों की वर्षा की। दिव्य वाद्य बजने लगे और श्रीकृष्ण का यह अद्भुत नृत्य समस्त लोकों के लिए दर्शन का विषय बन गया।

कालिया की पत्नियों ने की भगवान से प्रार्थना

जब कालिया की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई, तब उसकी पत्नियां भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष उपस्थित हुईं, जिन्हें नागपत्नियां कहा गया है। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति की और प्रार्थना की कि उनके पति ने अज्ञान और अहंकारवश अपराध किया है। वे भगवान से क्षमा की याचना करने लगीं। उन्होंने कहा कि आपके चरणों का स्पर्श स्वयं महान तपस्वियों और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, जबकि आज कालिया को आपके चरणों का स्पर्श प्राप्त हुआ है। नागपत्नियों की विनम्र प्रार्थना सुनकर भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए।

कालिया ने भगवान के सामने स्वीकार किया अपना अपराध

भगवान के चरणों से पराजित होने के बाद कालिया का सारा अभिमान समाप्त हो चुका था। उसने भी हाथ जोड़कर भगवान से क्षमा मांगी और स्वीकार किया कि उसने अपने विष और शक्ति के अहंकार में अनेक जीवों को कष्ट पहुंचाया। उसने भगवान के समक्ष पूर्ण समर्पण कर दिया और उनकी आज्ञा का पालन करने का वचन दिया।

श्रीकृष्ण ने कालिया को यमुना छोड़ने की आज्ञा दी

भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया से कहा कि वह तुरंत यमुना नदी का त्याग करे और अपने परिवार सहित पुनः समुद्र स्थित रमणक द्वीप लौट जाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यमुना का यह जल ब्रजवासियों, गायों और समस्त जीवों के लिए है। इसे विषैला बनाकर रखना उचित नहीं है। कालिया ने विनम्रतापूर्वक भगवान की आज्ञा स्वीकार कर ली।

गरुड़ से भय समाप्त होने का वरदान

कालिया ने भगवान से निवेदन किया कि यदि वह रमणक द्वीप लौटेगा तो गरुड़ उसे पुनः मारने का प्रयास करेंगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने चरणचिह्न कालिया के फनों पर अंकित कर दिए। उन्होंने कहा कि जब गरुड़ इन दिव्य चरणचिह्नों को देखेंगे, तब वे समझ जाएंगे कि कालिया को स्वयं भगवान का संरक्षण प्राप्त है। इसलिए वे उस पर आक्रमण नहीं करेंगे। भगवान का यह आश्वासन पाकर कालिया निश्चिंत हो गया।

कालिया के जाने के बाद फिर से निर्मल हुई यमुना

भगवान की आज्ञा के अनुसार कालिया अपने परिवार सहित यमुना छोड़कर समुद्र की ओर चला गया। उसके प्रस्थान करते ही यमुना का जल पुनः स्वच्छ और निर्मल हो गया। विष का प्रभाव समाप्त हो गया और नदी का वातावरण पहले की तरह पवित्र हो उठा। ब्रजवासी अत्यंत प्रसन्न हुए। गायें, ग्वालबाल और समस्त वृंदावनवासी भगवान श्रीकृष्ण की इस अद्भुत लीला को देखकर आनंदित हो उठे। नंद बाबा, माता यशोदा और सभी गोप-गोपियां श्रीकृष्ण को सुरक्षित देखकर भावविभोर हो गए।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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