Bhagavata Purana: भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल से जुड़ी अनेक लीलाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में मिलता है। इन लीलाओं में पूतना वध, तृणावर्त वध, शकटासुर वध, वत्सासुर वध और बकासुर वध विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। बकासुर का वध भी भगवान श्रीकृष्ण की उन दिव्य लीलाओं में से एक माना जाता है, जिसमें उन्होंने अपने बाल स्वरूप में ही एक अत्यंत बलशाली राक्षस का अंत किया। बकासुर को मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने श्रीकृष्ण का वध करने के लिए वृंदावन भेजा था। उसने विशाल बगुले का रूप धारण कर गोप बालकों और भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया, लेकिन अंततः भगवान श्रीकृष्ण ने उसका संहार कर ब्रजवासियों को भयमुक्त कर दिया। श्रीमद्भागवत महापुराण में इस पूरी घटना का विस्तार से वर्णन मिलता है।
कौन था बकासुर?
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार बकासुर एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। वह कंस का विश्वस्त सहयोगी था और पूतना तथा अघासुर का भाई बताया गया है। कंस को जब यह ज्ञात हुआ कि देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसका वध करेगा और वह बालक नंदग्राम में पल रहा है, तब उसने एक-एक करके अनेक असुरों को भगवान श्रीकृष्ण के वध के लिए भेजना आरंभ किया। इसी क्रम में बकासुर को भी वृंदावन भेजा गया। वह मायावी शक्तियों से संपन्न था और इच्छानुसार किसी भी रूप को धारण कर सकता था। श्रीकृष्ण को छलपूर्वक मारने के उद्देश्य से उसने एक विशाल बगुले का रूप धारण किया, जिससे कोई भी उसे सामान्य पक्षी समझकर उसके निकट चला जाए।
कंस ने बकासुर को क्यों भेजा था?
कंस पहले ही कई असुरों को श्रीकृष्ण के विरुद्ध भेज चुका था। पूतना, तृणावर्त और वत्सासुर जैसे असुरों के मारे जाने की सूचना जब उसे मिली, तब उसका भय और अधिक बढ़ गया। उसे विश्वास हो गया कि नंद के घर पल रहा बालक साधारण नहीं है। इसके बाद उसने अपने सबसे बलवान और मायावी असुरों को श्रीकृष्ण के विरुद्ध भेजना प्रारंभ किया। बकासुर भी उन्हीं में से एक था। कंस को विश्वास था कि विशाल बगुले का रूप धारण कर वह बिना किसी संदेह के श्रीकृष्ण के निकट पहुँच जाएगा और अवसर मिलते ही उनका अंत कर देगा।
जब श्रीकृष्ण और ग्वालबाल पहुंचे वन
एक दिन भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और उनके साथ अनेक ग्वालबाल बछड़ों को चराते हुए यमुना के समीप वन में पहुंचे। सभी बालक खेलते-कूदते आगे बढ़ रहे थे। कुछ समय बाद वे एक सरोवर के निकट विश्राम करने लगे और बछड़े भी वहीं चरने लगे। उसी स्थान पर बकासुर पहले से घात लगाए बैठा था। उसने इतना विशाल बगुले का रूप धारण किया था कि उसका शरीर किसी पर्वत के समान दिखाई देता था। उसकी लंबी गर्दन, नुकीली चोंच और विशाल पंखों को देखकर सामान्य व्यक्ति भयभीत हो सकता था। ग्वालबाल उस विचित्र पक्षी को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। कुछ ही क्षणों में वह बगुला अपने वास्तविक उद्देश्य के साथ श्रीकृष्ण की ओर झपटा।
बकासुर ने किया भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण
श्रीमद्भागवत के अनुसार बकासुर ने बिना विलंब किए अपनी विशाल चोंच से भगवान श्रीकृष्ण को निगल लिया। यह दृश्य देखकर सभी ग्वालबाल और बलराम अत्यंत व्याकुल हो गए। उन्हें ऐसा लगा कि अब श्रीकृष्ण किसी बड़े संकट में पड़ गए हैं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण सामान्य बालक नहीं थे। वे स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे। जैसे ही बकासुर ने उन्हें निगला, भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य तेज और प्रभाव से उसके गले में असहनीय अग्नि के समान जलन होने लगी। वह उस तेज को सहन नहीं कर सका। अत्यधिक पीड़ा से व्याकुल होकर बकासुर ने तुरंत भगवान श्रीकृष्ण को बाहर उगल दिया। उसके मन में अब भी उन्हें मारने की इच्छा समाप्त नहीं हुई थी।
दूसरी बार किया प्राणघातक प्रयास
भगवान श्रीकृष्ण को बाहर निकालने के बाद बकासुर ने क्रोध में भरकर अपनी विशाल और कठोर चोंच से उन पर प्रहार करने का प्रयास किया। उसका विचार था कि इस बार वह अपनी चोंच के बीच दबाकर श्रीकृष्ण का अंत कर देगा। उसने पूरी शक्ति के साथ अपनी चोंच भगवान श्रीकृष्ण की ओर बढ़ाई। किंतु श्रीकृष्ण शांत भाव से उसके सामने खड़े रहे। जैसे ही बकासुर ने उन्हें दबाने का प्रयास किया, भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी दोनों चोंचों को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया।
भगवान श्रीकृष्ण ने कैसे किया बकासुर का वध?
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से बकासुर की दोनों चोंचों को धीरे-धीरे विपरीत दिशाओं में खींचना आरंभ किया। बकासुर ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन वह भगवान की शक्ति के सामने टिक नहीं सका। कुछ ही क्षणों में भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी विशाल चोंच को उसी प्रकार दो भागों में चीर दिया, जैसे कोई व्यक्ति सहजता से तिनके या घास के डंठल को बीच से फाड़ देता है। चोंच के फटते ही बकासुर के प्राण निकल गए। उसका विशाल शरीर धरती पर गिर पड़ा और उसका आतंक सदा के लिए समाप्त हो गया।
ग्वालबालों ने देखा अद्भुत दृश्य
बकासुर के वध के बाद ग्वालबालों ने राहत की सांस ली। कुछ क्षण पहले तक वे भय से स्तब्ध थे, लेकिन अब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को सकुशल अपने सामने खड़ा देखा। सभी बालक प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण के पास दौड़ पड़े। वे उन्हें गले लगाने लगे और उनकी विजय पर आनंद व्यक्त करने लगे। बलराम भी अपने छोटे भाई की इस अद्भुत लीला को देखकर प्रसन्न हुए। वन का वातावरण, जो कुछ देर पहले भय और आतंक से भरा हुआ था, अब फिर से शांत हो गया।
देवताओं ने की पुष्पवर्षा
श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णन मिलता है कि जैसे ही बकासुर का अंत हुआ, देवलोक में भी हर्ष का वातावरण छा गया। देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण की इस लीला की प्रशंसा की। आकाश से पुष्पों की वर्षा की गई। गंधर्वों ने स्तुति गाई, अप्सराओं ने आनंद व्यक्त किया और देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण का अभिनंदन किया। यह दृश्य ब्रह्मांड में भगवान की दिव्य शक्ति के प्रकट होने का प्रतीक माना गया है।
ब्रज लौटने पर सुनाई गई पूरी घटना
वन से लौटने के बाद ग्वालबालों ने नंद बाबा, माता यशोदा और ब्रजवासियों को पूरी घटना सुनाई। सभी यह जानकर आश्चर्यचकित रह गए कि इतना भयानक राक्षस भी भगवान श्रीकृष्ण का कुछ नहीं बिगाड़ सका। ब्रजवासियों ने इसे भगवान की अद्भुत लीला माना। यशोदा मैया ने बालक श्रीकृष्ण को अपने हृदय से लगा लिया। नंद बाबा सहित समस्त गोप समुदाय ने ईश्वर का स्मरण करते हुए प्रसन्नता व्यक्त की कि श्रीकृष्ण सकुशल लौट आए।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)