Shrimad Bhagwat Katha: सनातन धर्म में श्रीमद् भागवत महापुराण को भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप का ग्रंथ माना गया है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्तों के चरित्र, अवतारों के रहस्य और धर्म के गूढ़ सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन करने वाला महापुराण है। देशभर में जब भी श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन होता है तो अधिकांश स्थानों पर इसका पाठ लगातार सात दिनों तक किया जाता है, जिसे भागवत सप्ताह या भागवत सप्ताही कहा जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि जब भागवत महापुराण में 18 हजार श्लोक और 12 स्कंध हैं, तो इसका पाठ केवल सात दिनों में ही क्यों किया जाता है? इसके पीछे केवल परंपरा ही नहीं, बल्कि एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जिसका संबंध राजा परीक्षित, ऋषि शुकदेव और तक्षक नाग से है।
राजा परीक्षित को कैसे मिला सात दिनों का जीवन?
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवों के वंश में अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित हस्तिनापुर के राजा बने। वे धर्मप्रिय, न्यायप्रिय और भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त माने जाते थे। एक दिन शिकार के दौरान वे जंगल में अत्यधिक प्यास और थकान से व्याकुल हो गए। उसी समय उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया, जहां महर्षि शमीक गहन समाधि में लीन थे। राजा ने कई बार जल और उत्तर की प्रार्थना की, लेकिन समाधि में होने के कारण महर्षि ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसे अपना अपमान समझकर राजा परीक्षित का विवेक क्षणभर के लिए विचलित हो गया। उन्होंने पास पड़ा एक मृत सर्प उठाकर महर्षि के गले में डाल दिया और वहां से चले गए।
कुछ समय बाद महर्षि के पुत्र श्रृंगी ऋषि को जब इस घटना का पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपने तपोबल से राजा परीक्षित को श्राप दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नामक नाग उन्हें डसकर उनकी मृत्यु का कारण बनेगा। जब महर्षि शमीक को यह बात ज्ञात हुई तो उन्होंने अपने पुत्र के क्रोध पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने तुरंत अपने शिष्य के माध्यम से राजा परीक्षित को श्राप की सूचना भेज दी, ताकि वे आने वाले समय के लिए स्वयं को तैयार कर सकें।
श्राप मिलने के बाद राजा परीक्षित ने क्या किया?
श्राप का समाचार मिलने के बाद राजा परीक्षित ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपना राजपाट अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया और सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया। इसके बाद वे गंगा तट पर पहुंचे, जहां उन्होंने निश्चय किया कि जीवन के अंतिम सात दिनों में वे केवल भगवान का स्मरण करेंगे और मोक्ष का मार्ग जानेंगे।
राजा के इस निर्णय का समाचार दूर-दूर तक फैल गया। गंगा तट पर अनेक महर्षि, ब्रह्मर्षि, राजर्षि और तपस्वी एकत्र होने लगे। वहां महर्षि व्यास, नारद, अत्रि, वशिष्ठ, पराशर, अंगिरा सहित अनेक महान ऋषियों का आगमन हुआ। सभी इस बात पर विचार करने लगे कि मृत्यु के निकट पहुंच चुके मनुष्य के लिए सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य क्या है।
गंगा तट पर हुआ शुकदेव जी का आगमन
इसी समय महर्षि वेदव्यास के पुत्र परम ज्ञानी और ब्रह्मनिष्ठ ऋषि शुकदेव वहां पहुंचे। उनका तेज और वैराग्य देखकर उपस्थित सभी ऋषि-मुनियों ने उनका सम्मान किया। राजा परीक्षित ने भी उन्हें प्रणाम कर विनम्रतापूर्वक प्रश्न किया- "हे प्रभु! जिस मनुष्य की मृत्यु निश्चित हो और जिसके पास केवल सात दिनों का समय शेष हो, उसे क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए? किसका श्रवण करना चाहिए? और कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए?" राजा के इस प्रश्न के उत्तर में शुकदेव जी ने श्रीमद् भागवत महापुराण का दिव्य उपदेश आरंभ किया।
सात दिनों तक क्यों सुनाई गई श्रीमद् भागवत कथा?
पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा परीक्षित के जीवन में केवल सात दिनों का समय शेष था, इसलिए शुकदेव जी ने सात दिनों के भीतर ही उन्हें संपूर्ण श्रीमद् भागवत महापुराण का श्रवण कराया। इन सात दिनों में उन्होंने भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों, सृष्टि की उत्पत्ति, भक्तों के चरित्र, भगवान श्रीकृष्ण की बाल एवं दिव्य लीलाओं, उद्धव उपदेश, धर्म के सिद्धांत तथा मोक्ष के मार्ग का विस्तार से वर्णन किया। राजा परीक्षित ने इन सात दिनों में न तो भोजन की चिंता की, न ही निद्रा की। वे पूर्ण एकाग्रता और श्रद्धा के साथ भागवत कथा का श्रवण करते रहे। कथा के दौरान उनका मन पूरी तरह भगवान में स्थित हो गया। इसी सात दिवसीय श्रवण की परंपरा को आगे चलकर भागवत सप्ताह कहा जाने लगा। आज भी जब सात दिनों तक श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन होता है, तो उसका आधार यही पौराणिक प्रसंग माना जाता है।
सात दिनों की कथा में क्या-क्या सुनाया गया?
शुकदेव जी ने भागवत महापुराण के बारहों स्कंधों का क्रमबद्ध वर्णन किया। कथा का आरंभ भगवान की महिमा, सृष्टि की रचना और धर्म की स्थापना से हुआ। इसके बाद विभिन्न अवतारों का वर्णन किया गया, जिनमें मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम और श्रीकृष्ण अवतार की कथाएं प्रमुख हैं। भागवत कथा में ध्रुव महाराज की तपस्या, प्रह्लाद की अटूट भक्ति, गजेंद्र मोक्ष, समुद्र मंथन, अजामिल का उद्धार, ऋषभदेव, भरत चरित्र, कपिल भगवान का उपदेश तथा अनेक भक्तों की कथाओं का भी विस्तार से वर्णन हुआ। दशम स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म, गोकुल और वृंदावन की बाल लीलाएं, कालिय नाग दमन, गोवर्धन धारण, रास लीला, कंस वध, मथुरा और द्वारका की घटनाएं विस्तार से सुनाई गईं। इसके बाद उद्धव उपदेश और भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान का भी वर्णन किया गया।
सातवें दिन क्या हुआ?
सात दिनों तक अखंड भागवत कथा सुनने के बाद सातवां दिन भी समाप्त होने लगा। उसी दिन श्रृंगी ऋषि का श्राप पूर्ण होने का समय आ गया। तक्षक नाग ने ब्राह्मण का रूप धारण कर राजा परीक्षित तक पहुंचने का उपाय किया। विभिन्न पौराणिक वर्णनों के अनुसार तक्षक ने अंततः अपने वास्तविक नाग रूप में प्रकट होकर राजा परीक्षित को डस लिया। श्राप के अनुसार राजा परीक्षित ने उसी दिन अपना शरीर त्याग दिया। किंतु श्रीमद् भागवत कथा का सात दिनों तक श्रवण करने के कारण उनका चित्त पूर्ण रूप से भगवान में स्थित था। भागवत महापुराण में वर्णित है कि उन्होंने भगवान का स्मरण करते हुए देह का परित्याग किया।
भागवत सप्ताह की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई?
राजा परीक्षित और शुकदेव जी का यह प्रसंग आगे चलकर भागवत सप्ताह की आधारशिला माना गया। क्योंकि स्वयं शुकदेव जी ने सात दिनों में राजा परीक्षित को संपूर्ण भागवत महापुराण का श्रवण कराया था, इसलिए बाद के समय में संतों और आचार्यों ने भी सात दिवसीय भागवत कथा की परंपरा को आगे बढ़ाया। यही कारण है कि आज भी किसी गांव, नगर, मंदिर या धार्मिक आयोजन में जब श्रीमद् भागवत कथा होती है, तो सामान्यतः उसका आयोजन सात दिनों तक किया जाता है। प्रत्येक दिन भागवत के विभिन्न स्कंधों और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का क्रमवार वर्णन किया जाता है और सातवें दिन कथा का समापन होता है।
क्या सात दिनों का उल्लेख स्वयं भागवत महापुराण में मिलता है?