Bhagavata Purana: भगवान श्रीकृष्ण और देवराज इंद्र के बीच हुए युद्ध का प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित है। यह युद्ध किसी राज्य, धन या प्रभुत्व के लिए नहीं, बल्कि स्वर्ग के दिव्य पारिजात वृक्ष को लेकर हुआ था। इस कथा में भगवान श्रीकृष्ण, माता सत्यभामा, देवराज इंद्र, देवी शची, गरुड़ और अनेक देवताओं का उल्लेख मिलता है। पारिजात वृक्ष को स्वर्ग का अत्यंत दुर्लभ और दिव्य वृक्ष माना गया है, जिसकी सुगंध और पुष्पों का महत्व देवताओं के लोक में विशेष बताया गया है। आइए जानते हैं कि आखिर किन परिस्थितियों में भगवान श्रीकृष्ण और देवराज इंद्र आमने-सामने आए और इस युद्ध का क्या कारण बना।
पारिजात वृक्ष का दिव्य महत्व
भागवत पुराण के दशम स्कंध के अध्याय 59 में श्रीकृष्ण द्वारा पारिजात हरण की कथा का वर्णन मिलता है। पारिजात वृक्ष समुद्र मंथन के समय प्रकट हुए चौदह रत्नों में से एक माना जाता है। यह वृक्ष स्वर्गलोक के नंदन वन में स्थापित किया गया, जहां देवता और अप्सराएं इसके पुष्पों से पूजा एवं श्रृंगार करते थे। इस वृक्ष के फूल कभी मुरझाते नहीं थे और उनकी दिव्य सुगंध दूर-दूर तक फैलती थी। यही कारण था कि पारिजात वृक्ष स्वर्ग की अमूल्य निधियों में गिना जाता था और उसकी रक्षा स्वयं देवराज इंद्र करते थे।
श्रीकृष्ण और सत्यभामा का स्वर्ग गमन
श्रीमद्भागवत के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया, तब उन्होंने नरकासुर द्वारा बंदी बनाई गई हजारों राजकुमारियों को मुक्त कराया। साथ ही नरकासुर द्वारा छीने गए अनेक दिव्य रत्न और वस्तुएं भी प्राप्त हुईं। इनमें देवी अदिति के कुंडल भी थे, जिन्हें नरकासुर ने छीन लिया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने देवी अदिति को उनके कुंडल लौटाने का निश्चय किया। इस कार्य के लिए वे अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक पहुंचे। वहां देवराज इंद्र और देवी शची ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया। देवी अदिति को उनके कुंडल वापस सौंपे गए और उन्होंने श्रीकृष्ण तथा सत्यभामा को आशीर्वाद दिया।
सत्यभामा की दृष्टि पारिजात वृक्ष पर पड़ी
स्वर्ग में भ्रमण करते समय सत्यभामा की दृष्टि नंदन वन में स्थित दिव्य पारिजात वृक्ष पर पड़ी। उसकी अलौकिक शोभा, मनोहारी पुष्प और दिव्य सुगंध देखकर वे अत्यंत प्रभावित हुईं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से इच्छा व्यक्त की कि यदि संभव हो तो इस दिव्य वृक्ष को द्वारका ले जाया जाए, ताकि वहां भी इसकी स्थापना हो सके। भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा की इच्छा स्वीकार कर ली। वे नंदन वन पहुंचे और पारिजात वृक्ष को उसकी जड़ सहित उखाड़कर गरुड़ पर रख लिया।
देवराज इंद्र ने किया पारिजात ले जाने का विरोध
जब देवराज इंद्र को ज्ञात हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण पारिजात वृक्ष को स्वर्ग से लेकर जा रहे हैं, तब उन्होंने इसका विरोध किया। इंद्र का कहना था कि पारिजात स्वर्ग की धरोहर है और उसका स्थान केवल नंदन वन ही है। यदि यह वृक्ष पृथ्वी पर चला गया तो स्वर्ग का वैभव कम हो जाएगा। इंद्र ने भगवान श्रीकृष्ण से वृक्ष को वहीं छोड़ देने का आग्रह किया, लेकिन श्रीकृष्ण ने पारिजात को लेकर जाने का अपना निर्णय नहीं बदला। इसके बाद विवाद बढ़ गया और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई।
श्रीकृष्ण और इंद्र के बीच आरंभ हुआ युद्ध
देवराज इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर युद्ध के लिए निकले। उनके साथ अनेक देवता भी उपस्थित हुए। दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण गरुड़ पर विराजमान थे। दोनों पक्षों के बीच दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होने लगा। इंद्र ने अपने परम अस्त्र वज्र का भी प्रयोग किया, जिसे अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। किंतु भगवान श्रीकृष्ण पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य शस्त्रों से इंद्र के सभी आक्रमणों को निष्फल कर दिया। गरुड़ ने भी देवताओं के वाहनों और सेना का सामना किया। युद्ध कुछ समय तक चलता रहा, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य शक्ति के सामने देवराज इंद्र टिक नहीं सके। अंततः उन्हें अपनी पराजय स्वीकार करनी पड़ी।
इंद्र को हुआ भगवान श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप का स्मरण
जब इंद्र ने देखा कि उनके सभी प्रयास निष्फल हो रहे हैं, तब उन्हें स्मरण हुआ कि श्रीकृष्ण कोई सामान्य राजा नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं। वे समझ गए कि जिनकी कृपा से देवताओं को शक्ति और पद प्राप्त होता है, उन्हीं से युद्ध करना उचित नहीं है। इसके बाद इंद्र का अहंकार शांत हुआ। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम किया और उनसे क्षमा प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण ने भी इंद्र के प्रति कोई क्रोध नहीं रखा।
पारिजात वृक्ष को लेकर द्वारका पहुंचे श्रीकृष्ण