Goloka Mythological Story: सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को केवल विष्णु के अवतार के रूप में ही नहीं, बल्कि स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम परमब्रह्म भी माना गया है। यही कारण है कि उनके दिव्य धाम ‘गोलोक’ को समस्त लोकों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वैदिक ग्रंथों, पुराणों और वैष्णव परंपरा में गोलोक का वर्णन ऐसे दिव्य लोक के रूप में मिलता है, जहां भगवान श्रीकृष्ण अपने नित्य स्वरूप में श्रीराधा और गोप-गोपियों के साथ शाश्वत लीलाएं करते हैं। माना जाता है कि यह धाम जन्म, मृत्यु, समय और प्रलय से परे है तथा इसका कभी विनाश नहीं होता।
भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मसंहिता, पद्म पुराण और गौड़ीय वैष्णव ग्रंथों में गोलोक धाम की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं कि आखिर भगवान श्रीकृष्ण का गोलोक धाम सबसे श्रेष्ठ लोक क्यों माना जाता है और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा प्रचलित है।
गोलोक धाम का अर्थ क्या है?
‘गोलोक’ दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘गो’ और ‘लोक’। यहां ‘गो’ का अर्थ केवल गौ नहीं, बल्कि इंद्रियां, वेद, पृथ्वी तथा दिव्य चेतना भी माना गया है। वैष्णव परंपरा में गोलोक वह परम धाम है जहां भगवान श्रीकृष्ण अपने मूल स्वरूप में निवास करते हैं। ब्रह्मसंहिता में गोलोक का वर्णन अत्यंत दिव्य लोक के रूप में किया गया है। वहां कल्पवृक्षों के वन हैं, कामधेनु गौएं विचरण करती हैं, दिव्य सरोवर हैं और प्रत्येक स्थान भगवान की अनंत लीलाओं से आलोकित रहता है। वहां किसी प्रकार का भय, दुख, रोग, जरा या मृत्यु नहीं है।
सबसे श्रेष्ठ लोक क्यों माना जाता है गोलोक?
पुराणों के अनुसार सृष्टि में अनेक लोक हैं, जिनमें भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक तथा वैकुण्ठ प्रमुख माने गए हैं, लेकिन वैष्णव ग्रंथों में इन सबसे ऊपर गोलोक धाम का स्थान बताया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित है कि गोलोक भगवान श्रीकृष्ण का निज धाम है। यह न तो किसी कल्प में उत्पन्न होता है और न ही महाप्रलय में इसका विनाश होता है। जब संपूर्ण ब्रह्मांड प्रलय में विलीन हो जाता है, तब भी गोलोक धाम अपनी दिव्य अवस्था में विद्यमान रहता है। इसी कारण इसे शाश्वत, अविनाशी और सर्वोच्च धाम कहा गया है।
गोलोक धाम और वैकुण्ठ में क्या अंतर बताया गया है?
वैष्णव परंपरा में वैकुण्ठ और गोलोक दोनों ही भगवान के दिव्य धाम माने जाते हैं, लेकिन दोनों की लीलाओं और स्वरूप में अंतर बताया गया है। वैकुण्ठ में भगवान विष्णु अपने चतुर्भुज स्वरूप में माता लक्ष्मी के साथ विराजमान रहते हैं। वहां भगवान की ऐश्वर्यमयी उपासना होती है और भक्त अत्यंत श्रद्धा एवं मर्यादा के साथ उनकी सेवा करते हैं। इसके विपरीत गोलोक धाम में भगवान श्रीकृष्ण अपने द्विभुज स्वरूप में श्रीराधा, गोपियों, ग्वालबालों और गौओं के साथ नित्य विहार करते हैं। वहां ऐश्वर्य की अपेक्षा माधुर्य और प्रेम की प्रधानता मानी गई है। यही कारण है कि वैष्णव आचार्य गोलोक को भगवान की सर्वोच्च प्रेममयी लीलाओं का धाम बताते हैं।
ब्रह्मा को कैसे हुआ गोलोक धाम का दर्शन?
एक प्रसिद्ध पौराणिक प्रसंग के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्माजी अपने उत्पत्ति रहस्य को लेकर चिंतित थे। उन्होंने कठोर तपस्या की और भगवान की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दिव्य दर्शन दिए। ब्रह्मसंहिता में वर्णन मिलता है कि भगवान ने ब्रह्माजी को अपने परम धाम गोलोक का भी दर्शन कराया। वहां ब्रह्माजी ने देखा कि अनंत प्रकाश से युक्त उस धाम में भगवान श्रीकृष्ण दिव्य सिंहासन पर विराजमान हैं।
उनके साथ श्रीराधा उपस्थित हैं तथा चारों ओर गोप-गोपियां, ग्वालबाल और दिव्य गौएं भगवान की सेवा में लीन हैं। उस अलौकिक दृश्य को देखकर ब्रह्माजी भगवान की महिमा से अभिभूत हो गए और उन्होंने भगवान की स्तुति करते हुए ब्रह्मसंहिता के प्रसिद्ध श्लोकों का उच्चारण किया। इन्हीं श्लोकों में गोलोक धाम का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है।
राधा रानी का गोलोक धाम में क्या स्थान है?
ब्रह्मवैवर्त पुराण और गौड़ीय वैष्णव ग्रंथों में श्रीराधा को भगवान श्रीकृष्ण की पराशक्ति तथा गोलोक की अधिष्ठात्री शक्ति बताया गया है। गोलोक धाम में श्रीराधा और श्रीकृष्ण का नित्य दिव्य विहार होता है। कहा जाता है कि भगवान की सभी मधुर लीलाओं का केंद्र श्रीराधा हैं। रासलीला, निकुंज लीला और वृंदावन की दिव्य लीलाएं गोलोक में नित्य रूप से विद्यमान रहती हैं। यही कारण है कि गोलोक का वर्णन करते समय श्रीराधा का उल्लेख अनिवार्य माना जाता है।
गोलोक धाम की पौराणिक संरचना
पुराणों में गोलोक को दिव्य रत्नों से निर्मित बताया गया है। वहां की भूमि चिंतामणि मणियों से सुशोभित है। प्रत्येक वृक्ष कल्पवृक्ष है, जो इच्छानुसार फल-फूल प्रदान करता है। वहां बहने वाली नदियां दिव्य मानी गई हैं और सरोवर अमृत के समान निर्मल बताए गए हैं। गोलोक में अनगिनत गौएं विचरण करती हैं, जिन्हें कामधेनु स्वरूप माना गया है। वहां के भवन रत्नों से अलंकृत हैं और वातावरण सदैव मधुर संगीत, वेदघोष तथा भगवान के नाम-संकीर्तन से गुंजायमान रहता है।
गोलोक धाम और वृंदावन का संबंध
वैष्णव परंपरा में पृथ्वी पर स्थित वृंदावन को गोलोक का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में अवतार लिया, तब गोलोक की अनेक दिव्य लीलाएं वृंदावन में प्रकट हुईं। नंदगांव, बरसाना, गोवर्धन, यमुना तट और वृंदावन की रासस्थली को उन्हीं नित्य लीलाओं का प्रकट रूप माना जाता है। इसी कारण वृंदावन को भी अत्यंत पवित्र धाम का दर्जा प्राप्त है।
पौराणिक कथा के अनुसार गोलोक की स्थापना कैसे हुई?
ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य स्वरूप सृष्टि से भी पहले विद्यमान था। उनके साथ श्रीराधा भी उनकी अनादि शक्ति के रूप में स्थित थीं। उसी समय भगवान के संकल्प से गोलोक धाम का प्राकट्य हुआ। इसके बाद भगवान की इच्छा से वैकुण्ठ धाम, शिवलोक और अन्य लोकों की रचना हुई। फिर ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई, जिसमें ब्रह्माजी को सृष्टि रचना का कार्य सौंपा गया। इस प्रकार गोलोक को समस्त लोकों से पहले प्रकट हुआ परम धाम माना गया है।
महाप्रलय के समय गोलोक का क्या होता है?
पुराणों के अनुसार जब कल्प का अंत होता है, तब पृथ्वी, स्वर्ग, ब्रह्मलोक सहित संपूर्ण ब्रह्मांड महाप्रलय में विलीन हो जाता है। यहां तक कि ब्रह्माजी का कार्यकाल समाप्त होने पर भी समस्त भौतिक जगत नष्ट हो जाता है। किन्तु गोलोक धाम इस प्रलय से अप्रभावित रहता है। क्योंकि यह भौतिक प्रकृति से परे, भगवान की अंतरंगा शक्ति से प्रकट दिव्य धाम है। इसी कारण इसे अविनाशी और सनातन कहा गया है।
गोलोक धाम में भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप
वैष्णव ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण को गोलोक में श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, मुरलीधर और वनमालाधारी स्वरूप में वर्णित किया गया है। उनके मस्तक पर मोरपंख सुशोभित रहता है तथा उनके मुख पर सदैव मधुर मुस्कान रहती है। भगवान वहां गौचारण, रासलीला, गोप-गोपियों के साथ विहार तथा अनेक दिव्य लीलाएं करते हैं। इन लीलाओं को नित्य और अनादि माना गया है, जिनका कभी अंत नहीं होता।
पुराणों में गोलोक धाम की महिमा