Bhagavad Gita: अर्जुन ने युद्ध करने से इनकार कर दिया और अपने शस्त्र त्यागने का विचार किया। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि उनका युद्ध व्यक्तिगत द्वेष के कारण नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए है।
Bhagavad Gita: महाभारत के भीषण युद्ध से ठीक पहले कुरुक्षेत्र की भूमि पर अर्जुन जब अपने ही स्वजनों, गुरुजनों और संबंधियों को सामने खड़ा देखकर मोह और शोक से भर गए, तब उन्होंने अपने गांडीव धनुष को नीचे रख दिया। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो दिव्य उपदेश दिया, वही आगे चलकर श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गीता में श्रीकृष्ण ने अनेक प्रकार के योगों का वर्णन किया है, लेकिन उनमें कर्मयोग को विशेष स्थान दिया गया है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि मनुष्य के लिए कर्म का त्याग नहीं, बल्कि निष्काम भाव से अपने कर्तव्य का पालन ही श्रेष्ठ मार्ग है। यही कारण है कि भगवद्गीता में कर्मयोग को जीवन जीने की सर्वोत्तम साधना बताया गया है।
भगवद्गीता में कर्मयोग का अर्थ क्या है?
भगवद्गीता के अनुसार कर्मयोग का अर्थ है- अपने निर्धारित कर्तव्य का पालन करना, लेकिन उस कर्म के फल के प्रति आसक्ति न रखना। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने तक सीमित है, उसके फल पर नहीं, इसलिए फल की चिंता किए बिना धर्मानुसार कर्म करना ही कर्मयोग कहलाता है।
इसी भाव को गीता के प्रसिद्ध श्लोक में व्यक्त किया गया है-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥”
अर्थात मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं। इसलिए फल की इच्छा से कर्म मत करो और न ही कर्म छोड़ने का विचार करो।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन को कर्मयोग की शिक्षा क्यों दी गई?
महाभारत के युद्ध के आरंभ में अर्जुन अपने पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, भाइयों, मित्रों और संबंधियों को देखकर अत्यंत विचलित हो गए। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि ऐसे युद्ध से प्राप्त राज्य, सुख और वैभव का क्या लाभ, जिसमें अपने ही प्रियजनों का विनाश हो। अर्जुन ने युद्ध करने से इनकार कर दिया और अपने शस्त्र त्यागने का विचार किया। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि उनका युद्ध व्यक्तिगत द्वेष के कारण नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए है।
क्षत्रिय होने के नाते धर्मयुद्ध करना उनका स्वधर्म है। यदि वे मोहवश अपने कर्तव्य से पीछे हटेंगे तो यह उचित नहीं होगा। यहीं से श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश देना प्रारंभ किया और बताया कि स्वधर्म के अनुसार निष्काम भाव से किया गया कर्म ही श्रेष्ठ है।
श्रीकृष्ण ने आसक्ति का त्याग करने को कहा
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट किया कि संसार में कोई भी मनुष्य एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण प्रत्येक जीव से किसी न किसी प्रकार का कर्म करवाते ही हैं। इसलिए कर्म से भागना संभव नहीं है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि वास्तविक त्याग कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि कर्म के फल की इच्छा और अहंकार का त्याग करना है। जब मनुष्य अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित कर देता है और स्वयं को केवल एक निमित्त मानता है, तब वही कर्मयोग बन जाता है।
कर्मयोग और संन्यास में क्या अंतर बताया गया है?
भगवद्गीता में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि यदि ज्ञान और संन्यास श्रेष्ठ हैं तो फिर उन्हें युद्ध करने के लिए क्यों प्रेरित किया जा रहा है। उत्तर में श्रीकृष्ण ने बताया कि कर्मयोग और संन्यास दोनों ही मोक्ष के मार्ग हैं, लेकिन अधिकांश लोगों के लिए कर्मयोग अधिक उपयुक्त और श्रेष्ठ है। क्योंकि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी मनुष्य परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है।
उन्होंने कहा कि केवल बाहरी रूप से कर्म छोड़ देना संन्यास नहीं है। यदि मन में विषयों की इच्छा बनी रहे तो वह सच्चा त्याग नहीं कहलाता। इसके विपरीत जो व्यक्ति संसार में रहकर भी निष्काम भाव से अपना कर्तव्य निभाता है, वही वास्तविक कर्मयोगी है।
यज्ञभाव से किए गए कर्म को क्यों माना गया श्रेष्ठ?
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बताया कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने यज्ञ की व्यवस्था के साथ मनुष्यों की रचना की थी। उन्होंने कहा कि यज्ञभाव से किए गए कर्म मनुष्य को बंधन में नहीं डालते। यहां यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि प्रत्येक कर्म को ईश्वर के प्रति समर्पण और लोककल्याण की भावना से करना भी है। जब मनुष्य अपने कर्म को केवल स्वार्थ की पूर्ति का साधन नहीं बनाता, बल्कि उसे ईश्वरार्पण मानकर करता है, तब वह कर्म बंधन का कारण नहीं बनता।
श्रीकृष्ण ने कर्मयोग का उदाहरण कैसे प्रस्तुत किया?
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तीनों लोकों में ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसे उन्हें प्राप्त करना शेष हो, फिर भी वे निरंतर कर्म करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि वे कर्म करना छोड़ दें तो संसार के लोग भी उनका अनुसरण करेंगे और समस्त व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाएगी, इसलिए लोकसंग्रह अर्थात संसार की व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी कर्म करना आवश्यक है। इसी कारण श्रीकृष्ण स्वयं भी धर्म की स्थापना के लिए विभिन्न अवतार धारण करते हैं और आवश्यक कर्म करते हैं।
कर्मयोग को जीवन का श्रेष्ठ मार्ग क्यों कहा गया?
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि कर्म से भागने पर न तो धर्म की रक्षा होगी और न ही मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन कर पाएगा। इसलिए कर्मयोग ऐसा मार्ग है जिसमें मनुष्य अपने धर्म का पालन करते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है।
गीता में कहा गया है कि निष्काम कर्म करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है। क्योंकि वह अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को अर्पित करता है और उसके फल में स्वयं को कर्ता नहीं मानता। इसी कारण श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि से पलायन करने के बजाय धर्मयुद्ध करने का आदेश दिया और कर्मयोग को श्रेष्ठ बताया।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)