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Bhagavad Gita: भगवद्गीता को क्यों कहते हैं सभी शास्त्रों का सार? जानें सनातन धर्म के महान ग्रंथ का रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Bhagavad Gita: शास्त्रों में अलग-अलग स्थानों पर कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान की महिमा का वर्णन मिलता है, लेकिन भगवद्गीता में इन सभी योगों का समन्वित स्वरूप प्रस्तुत किया गया है।

Bhagavad Gita
Bhagavad Gita: महाभारत के भीषण युद्ध से ठीक पहले कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया दिव्य उपदेश ही भगवद्गीता के रूप में प्रसिद्ध है। सनातन धर्म में भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि समस्त वैदिक ज्ञान का सार माना जाता है। यही कारण है कि इसे "गीतोपनिषद" और "सभी शास्त्रों का सार" कहा जाता है। पुराणों, उपनिषदों, वेदों और अनेक आचार्यों ने भगवद्गीता की महिमा का वर्णन करते हुए इसे ऐसा दिव्य ग्रंथ बताया है, जिसमें धर्म, कर्म, ज्ञान, योग और ईश्वर तत्त्व का संपूर्ण विवेचन अत्यंत संक्षिप्त और सरल रूप में समाहित है। आखिर ऐसा क्या है, जिसके कारण भगवद्गीता को समस्त शास्त्रों का सार कहा जाता है? आइए जानते हैं...

कुरुक्षेत्र की रणभूमि में हुआ दिव्य उपदेश

महाभारत के अनुसार जब कौरव और पांडव सेनाएं कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए आमने-सामने खड़ी थीं, तब अर्जुन ने अपने ही गुरु, पितामह, संबंधियों और मित्रों को युद्धभूमि में देखकर शस्त्र त्याग दिए। वे मोह, शोक और संशय से भर गए। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथी के रूप में उन्हें जो उपदेश दिया, वही आगे चलकर भगवद्गीता कहलाया। यह उपदेश महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है। इसमें कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। प्रत्येक अध्याय जीवन और आध्यात्मिक ज्ञान के अलग-अलग पक्ष का विस्तार से वर्णन करता है।

वेदों और उपनिषदों का सार क्यों कहलाती है भगवद्गीता?

सनातन परंपरा में चार वेदों को सर्वोच्च ज्ञान का स्रोत माना गया है। इन्हीं वेदों का गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप उपनिषदों में मिलता है। उपनिषदों में ब्रह्म, आत्मा, सृष्टि, मोक्ष और ईश्वर के विषय में अत्यंत गहन चर्चा की गई है। भगवद्गीता की विशेषता यह मानी जाती है कि जिन गूढ़ विषयों को उपनिषदों में विस्तार से बताया गया है, उन्हीं सिद्धांतों को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सामने अत्यंत सरल और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया, इसलिए परंपरा में कहा जाता है कि उपनिषद यदि गाय हैं तो श्रीकृष्ण उनके दूध दुहने वाले गोपाल हैं और अर्जुन उस दिव्य ज्ञान का प्रथम पात्र है। वही ज्ञान भगवद्गीता के रूप में संपूर्ण मानव समाज के लिए उपलब्ध हुआ।

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं प्रकट किया दिव्य ज्ञान

अन्य अनेक शास्त्र ऋषियों, मुनियों और महापुरुषों द्वारा रचित या संकलित माने जाते हैं, जबकि भगवद्गीता का विशेष महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इसका प्रत्येक उपदेश स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से प्रकट हुआ। महाभारत के अनुसार, जब अर्जुन किसी भी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मा, परमात्मा, धर्म, कर्म, योग, प्रकृति और पुरुष के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराया। इसी कारण भगवद्गीता को ईश्वर का प्रत्यक्ष उपदेश माना जाता है।

 

Bhagavad Gita

18 अध्यायों में समाहित है संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान

भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय का अपना विशेष महत्व है। इन अध्यायों में अर्जुन विषाद योग से लेकर मोक्ष संन्यास योग तक विभिन्न विषयों का क्रमबद्ध वर्णन मिलता है। ग्रंथ में सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञान योग, ध्यान योग, भक्ति योग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग, पुरुषोत्तम योग, दैवासुर संपद विभाग योग और मोक्ष संन्यास योग जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत निरूपण किया गया है। इसी कारण विद्वान मानते हैं कि किसी एक शास्त्र में इतने व्यापक विषयों का समावेश अत्यंत दुर्लभ है।

सभी प्रमुख योगों का समन्वय

शास्त्रों में अलग-अलग स्थानों पर कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान की महिमा का वर्णन मिलता है, लेकिन भगवद्गीता में इन सभी योगों का समन्वित स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल एक मार्ग का उपदेश नहीं देते, बल्कि परिस्थिति के अनुसार कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान- सभी का स्थान स्पष्ट करते हैं। यही कारण है कि इसे ऐसा ग्रंथ माना जाता है, जिसमें विभिन्न शास्त्रीय मतों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक भाग

भगवद्गीता महाभारत का एक अंश है, लेकिन समय के साथ इसका महत्व इतना अधिक बढ़ गया कि इसे स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। महाभारत में अनेक युद्ध, घटनाएं और कथाएं हैं, परंतु भगवद्गीता वह भाग है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म और अध्यात्म का सबसे विस्तृत उपदेश दिया, इसलिए इसे महाभारत का हृदय भी कहा जाता है।

पुराणों में भी वर्णित है गीता की महिमा

पद्म पुराण, वराह पुराण और अन्य ग्रंथों में भगवद्गीता की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है। गीता माहात्म्य में बताया गया है कि यह ग्रंथ भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य स्वरूप माना गया है। कई स्थानों पर इसका उल्लेख वेदों के सार और मोक्षदायिनी विद्या के रूप में मिलता है। इसी कारण सनातन परंपरा में भगवद्गीता का पाठ, अध्ययन और श्रवण अत्यंत पुण्यकारी माना गया है तथा इसे दिव्य ज्ञान का सबसे संक्षिप्त और पूर्ण स्वरूप कहा गया है।



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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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