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Bhagavad Gita: भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को परम ब्रह्म क्यों कहा? जानिए गीता में वर्णित दिव्य स्वरूप का रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Bhagavad Gita: वेदांत और उपनिषदों में "परम ब्रह्म" उस सर्वोच्च, अनादि, अनंत और सर्वव्यापी सत्ता को कहा गया है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति होती है, जिसमें उसका पालन होता है और अंत में सब उसी में विलीन हो जाता है।

Bhagavad Gita
Bhagavad Gita: सनातन धर्म के सभी प्रमुख ग्रंथों में श्रीमद्भगवद्गीता का विशेष स्थान है। महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में अर्जुन के मोह को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने जो दिव्य उपदेश दिए, वही आगे चलकर भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध हुए। गीता में अनेक स्थानों पर श्रीकृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि वे केवल यदुवंश में जन्म लेने वाले एक राजकुमार या अर्जुन के सारथी नहीं हैं, बल्कि समस्त सृष्टि के मूल कारण, परम सत्य और परम ब्रह्म हैं। गीता में वर्णित यह दिव्य स्वरूप सनातन परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण के सर्वोच्च ईश्वरत्व का प्रमाण माना जाता है।

गीता में परम ब्रह्म का क्या अर्थ बताया गया है?

वेदांत और उपनिषदों में "परम ब्रह्म" उस सर्वोच्च, अनादि, अनंत और सर्वव्यापी सत्ता को कहा गया है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति होती है, जिसमें उसका पालन होता है और अंत में सब उसी में विलीन हो जाता है। यही परम ब्रह्म निराकार भी है और अपनी इच्छा से साकार रूप भी धारण करता है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को उसी परम सत्य के रूप में प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि समस्त देवता, ऋषि, लोक, जीव और प्रकृति उनके ही अधीन हैं तथा वही समस्त जगत के मूल कारण हैं।

अर्जुन ने स्वयं श्रीकृष्ण को परम ब्रह्म कहा

भगवद्गीता के दसवें अध्याय 'विभूति योग' में जब भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं, तब अर्जुन उनके वास्तविक स्वरूप को स्वीकार करते हुए कहते हैं—

"परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।"

अर्थात, "आप ही परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं।"

अर्जुन आगे कहते हैं कि देवर्षि नारद, महर्षि असित, देवल, व्यास तथा अन्य महान ऋषियों ने भी भगवान श्रीकृष्ण को इसी स्वरूप में स्वीकार किया है। यह केवल अर्जुन की व्यक्तिगत भावना नहीं थी, बल्कि प्राचीन ऋषियों की भी यही मान्यता थी कि श्रीकृष्ण ही परम पुरुष हैं।

स्वयं श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य स्वरूप का कैसे वर्णन किया?

गीता के सातवें अध्याय 'ज्ञान-विज्ञान योग' में भगवान कहते हैं कि उनसे श्रेष्ठ इस संसार में कोई अन्य तत्व नहीं है। वे कहते हैं कि जैसे धागे में मोतियों की माला पिरोई रहती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत उनमें स्थित है। इसका अर्थ यह बताया गया है कि समस्त सृष्टि का आधार वही हैं और प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व उन्हीं पर टिका हुआ है। इसी अध्याय में भगवान यह भी कहते हैं कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार उनकी अपरा प्रकृति हैं, जबकि जीवात्मा उनकी परा शक्ति है। इस प्रकार समस्त चर और अचर जगत उनके ही स्वरूप से प्रकट हुआ है।

 

Bhagavad Gita

भगवान ने स्वयं को सृष्टि का आदि और अंत बताया

भगवद्गीता के दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं—

"अहम् सर्वस्य प्रभवः मत्तः सर्वं प्रवर्तते।"

अर्थात, "मैं ही सम्पूर्ण सृष्टि का मूल कारण हूँ। मुझसे ही सब कुछ उत्पन्न होता है।"

धार्मिक मान्यता के अनुसार यही वह घोषणा है जिसमें श्रीकृष्ण स्वयं को समस्त ब्रह्मांड का आदिकारण बताते हैं। देवता, ऋषि, मनुष्य, लोक और समस्त सृष्टि उनकी इच्छा से संचालित होती है।

देवता भी भगवान के पूर्ण स्वरूप को नहीं जान पाते

गीता में भगवान कहते हैं कि देवगण और महर्षि भी उनके वास्तविक उद्गम को नहीं जानते, क्योंकि वे स्वयं उन सबके भी आदिकारण हैं। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, भगवान विष्णु पालन करते हैं और भगवान शिव संहार करते हैं, लेकिन गीता में श्रीकृष्ण अपने उस परम स्वरूप का वर्णन करते हैं जो इन समस्त दैवी शक्तियों का भी मूल कारण है। इसी कारण उन्हें परम ब्रह्म कहा गया है।

विश्वरूप दर्शन में प्रकट हुआ परम ब्रह्म का स्वरूप

भगवद्गीता का ग्यारहवाँ अध्याय 'विश्वरूप दर्शन योग' भगवान श्रीकृष्ण के परम ब्रह्म स्वरूप का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। जब अर्जुन ने भगवान से उनके वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराने की प्रार्थना की, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें दिव्य चक्षु प्रदान किए। इसके बाद अर्जुन ने भगवान के उस विराट स्वरूप का दर्शन किया जिसमें अनगिनत मुख, नेत्र, भुजाएँ, दिव्य अस्त्र, तेजस्वी मुकुट, समस्त देवता, ऋषि, लोक, पर्वत, नदियाँ और सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक साथ विद्यमान दिखाई दिए।

अर्जुन ने देखा कि काल के समान प्रज्वलित उस विराट स्वरूप में सभी योद्धा प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने भगवान के भीतर ही सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार और उसका अंत देखा। इस अद्भुत दर्शन के बाद अर्जुन ने पुनः भगवान को प्रणाम करते हुए उन्हें अनंत, सनातन और परमेश्वर स्वीकार किया।

श्रीकृष्ण ने स्वयं को काल भी बताया

विश्वरूप दर्शन के समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा—

"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्।"

अर्थात, "मैं ही लोकों का संहार करने वाला काल हूँ।"

धार्मिक व्याख्याओं में इसका अर्थ यह बताया गया है कि समय भी भगवान की शक्ति का ही एक स्वरूप है। सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और प्रलय सभी उनके अधीन हैं। इसलिए उन्हें केवल एक अवतार नहीं, बल्कि परम ब्रह्म कहा गया।

गीता में अवतार और परम ब्रह्म का संबंध

भगवान श्रीकृष्ण गीता के चौथे अध्याय में कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब वे स्वयं अवतार धारण करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार अवतार लेने पर भी उनका परम ब्रह्म स्वरूप कभी समाप्त नहीं होता। वे मानव रूप में अवश्य प्रकट होते हैं, लेकिन उनकी दिव्य सत्ता सदा सर्वव्यापी रहती है। यही कारण है कि गीता में वे अर्जुन को बताते हैं कि उनके अनेक जन्म हो चुके हैं और वे उन सभी को जानते हैं, जबकि सामान्य जीव अपने पूर्व जन्मों को स्मरण नहीं रख पाता।

सभी यज्ञ, तप और पूजा के भोक्ता भी स्वयं श्रीकृष्ण

भगवद्गीता में भगवान कहते हैं कि सभी यज्ञों और तपों के वास्तविक भोक्ता वही हैं। देवताओं की उपासना करने वाले भी अंततः उन्हीं की शक्ति की आराधना करते हैं, यद्यपि वे इसे पूर्ण रूप से नहीं जान पाते। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इसका आशय यह है कि समस्त वैदिक कर्म, यज्ञ, तपस्या और पूजा का अंतिम आधार वही परम ब्रह्म हैं, जिनसे सभी देवशक्तियाँ प्रकट होती हैं।



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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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