Bhagavad Gita: गीता के अनुसार अर्जुन ने भगवान से कहा कि वे उन्हें परमेश्वर मानते हैं और उनकी कही हुई प्रत्येक बात को सत्य स्वीकार करते हैं। फिर भी वे उस दिव्य स्वरूप को अपनी आंखों से देखना चाहते हैं, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड स्थित है।
Bhagavad Gita: कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब अर्जुन के मन में अपने ही संबंधियों, गुरुजनों और मित्रों के विरुद्ध युद्ध करने को लेकर गहरा मोह और संशय उत्पन्न हो गया। इसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें धर्म, कर्म, आत्मा और परमात्मा का ज्ञान दिया, जिसे आज श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से जाना जाता है। गीता के 11वें अध्याय में वह अद्भुत प्रसंग आता है, जब श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाते हैं। यह केवल एक दिव्य दर्शन नहीं था, बल्कि भगवान के विराट स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव था। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्रीकृष्ण ने विश्वरूप इसलिए दिखाया, ताकि अर्जुन को यह ज्ञात हो जाए कि उनके सामने खड़े सारथी वास्तव में समस्त सृष्टि के पालनहार, काल और परमब्रह्म हैं।
गीता के उपदेश के बीच क्यों आया विश्वरूप दर्शन का प्रसंग?
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्ति और धर्म का विस्तार से उपदेश दिया। अर्जुन ने भगवान की बातों को श्रद्धापूर्वक सुना, लेकिन उनके मन में यह जानने की इच्छा उत्पन्न हुई कि जो परम तत्व स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं, उसका वास्तविक स्वरूप कैसा है।
भगवान ने गीता के दसवें अध्याय में अपनी विभूतियों का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि समस्त देवता, ऋषि, पर्वत, नदियां, ग्रह, नक्षत्र, यज्ञ, वेद और समस्त ऐश्वर्य उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं। इन दिव्य विभूतियों को सुनने के बाद अर्जुन के मन में भगवान के वास्तविक स्वरूप के दर्शन की इच्छा हुई, तब उन्होंने विनम्र होकर श्रीकृष्ण से कहा कि यदि वे उन्हें योग्य समझें तो अपना वह परम दिव्य स्वरूप दिखाएं।
अर्जुन ने स्वयं विश्वरूप देखने की प्रार्थना की
गीता के अनुसार अर्जुन ने भगवान से कहा कि वे उन्हें परमेश्वर मानते हैं और उनकी कही हुई प्रत्येक बात को सत्य स्वीकार करते हैं। फिर भी वे उस दिव्य स्वरूप को अपनी आंखों से देखना चाहते हैं, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड स्थित है। अर्जुन की यह प्रार्थना केवल जिज्ञासा नहीं थी। वह यह देखना चाहते थे कि जिन श्रीकृष्ण को वे अपना मित्र और सारथी मानते हैं, उनका वास्तविक दिव्य स्वरूप कैसा है। भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि सामान्य मानव नेत्रों से उस स्वरूप का दर्शन संभव नहीं है।
विश्वरूप का दर्शन के लिए प्रदान किए दिव्य चक्षु
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि वे अपने साधारण नेत्रों से उनके विश्वरूप को नहीं देख सकते, इसलिए भगवान ने उन्हें दिव्य चक्षु प्रदान किए। धार्मिक मान्यता के अनुसार विश्वरूप कोई साधारण दृश्य नहीं था। उसमें सम्पूर्ण सृष्टि, अनंत लोक, देवता, ऋषि, गंधर्व, नाग, यक्ष, ग्रह, नक्षत्र, काल और भविष्य तक का समावेश था। इस विराट स्वरूप को देखने की क्षमता केवल दिव्य दृष्टि से ही प्राप्त हो सकती थी। इसी कारण भगवान ने पहले अर्जुन को दिव्य नेत्र दिए और उसके बाद अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराया।
कैसा था भगवान श्रीकृष्ण का विश्वरूप?
गीता के 11वें अध्याय में विश्वरूप का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अर्जुन ने भगवान के उस स्वरूप में असंख्य मुख, असंख्य नेत्र, अनगिनत भुजाएं और अनंत दिव्य आभूषण देखे। उनके हाथों में अनेक दिव्य आयुध सुशोभित थे। उनके शरीर से ऐसी तेजस्विता प्रकट हो रही थी, जिसकी तुलना हजार सूर्य एक साथ उदित होने पर भी नहीं की जा सकती।
अर्जुन ने उस विराट स्वरूप में समस्त देवताओं को देखा। ब्रह्माजी कमल पर विराजमान दिखाई दिए। भगवान शिव, महर्षि, सिद्धगण, आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्गण तथा अनेक दिव्य शक्तियां उसी स्वरूप में विद्यमान थीं। धार्मिक वर्णनों के अनुसार अर्जुन ने यह भी देखा कि सम्पूर्ण चराचर जगत, सभी लोक और समस्त ब्रह्मांड भगवान के उसी विश्वरूप में समाहित हैं।
विश्वरूप में काल का भी दर्शन हुआ
विश्वरूप के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में एक वह था, जब अर्जुन ने देखा कि युद्धभूमि के अनेक महान योद्धा भगवान के अग्निमय मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण, जयद्रथ तथा अन्य वीर मानो काल के मुख में समा रहे थे। इस दृश्य को देखकर अर्जुन अत्यंत विस्मित और भयभीत हो गए। तब उन्होंने भगवान से पूछा कि इस उग्र स्वरूप में वे कौन हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि वे काल हैं, जो लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुए हैं। उन्होंने कहा कि युद्धभूमि में उपस्थित अनेक योद्धाओं का अंत पहले ही निश्चित हो चुका है। अर्जुन केवल उस दिव्य योजना में एक माध्यम बनने वाले हैं। धार्मिक दृष्टि से यह प्रसंग भगवान के कालस्वरूप का प्रत्यक्ष प्रकट होना माना जाता है।
विश्वरूप देखकर अर्जुन की क्या अवस्था हुई?
भगवान के विराट स्वरूप को देखकर अर्जुन आश्चर्य और भय से भर गए। उनके शरीर में रोमांच उत्पन्न हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान को बार-बार प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगे। अर्जुन ने स्वीकार किया कि अब उन्हें ज्ञात हो गया है कि श्रीकृष्ण केवल उनके सखा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के स्वामी हैं। उन्होंने भगवान को आदिदेव, सनातन पुरुष, परमधाम और समस्त जगत का आधार बताया।
इसी समय अर्जुन को यह भी स्मरण हुआ कि उन्होंने मित्रभाव से अनेक अवसरों पर श्रीकृष्ण को केवल 'हे कृष्ण', 'हे यादव' या 'हे सखा' कहकर संबोधित किया था। विश्वरूप का दर्शन करने के बाद उन्होंने उन सभी व्यवहारों के लिए भगवान से क्षमा भी मांगी।
अर्जुन ने विश्वरूप हटाने की प्रार्थना क्यों की?
भगवान के उग्र और अनंत स्वरूप को देखकर अर्जुन का मन विचलित हो गया। उन्होंने भगवान से कहा कि वे उस विराट रूप को देखकर भयभीत हो रहे हैं और पुनः उसी सौम्य रूप का दर्शन करना चाहते हैं, जिसे वे पहले से जानते थे। अर्जुन की प्रार्थना सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने पहले अपना चतुर्भुज दिव्य स्वरूप प्रकट किया और उसके बाद पुनः अपना सामान्य मानवरूप धारण किया। भगवान का सौम्य स्वरूप देखकर अर्जुन का भय शांत हुआ और उनका मन स्थिर हो गया।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)