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Mangala Gauri Vrat: मंगला गौरी व्रत कब से शुरू होंगे जानिए पूरी जानकारी

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

 Mangala Gauri Vrat :  सावन का पवित्र महीना न केवल भगवान शिव की पूजा के लिए, बल्कि माता पार्वती का आशीर्वाद पाने के लिए भी बहुत अच्छा माना जाता है। सावन के महीने में हर मंगलवार को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ 'मंगला गौरी व्रत' रखा जाता है।

 Mangala Gauri Vrat : 
 Mangala Gauri Vrat :  सावन का पवित्र महीना न केवल भगवान शिव की पूजा के लिए, बल्कि माता पार्वती का आशीर्वाद पाने के लिए भी बहुत अच्छा माना जाता है। सावन के महीने में हर मंगलवार को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ 'मंगला गौरी व्रत' रखा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से विवाहित महिलाएं रखती हैं, जो अपने पति की लंबी उम्र, अटूट वैवाहिक सुख और खुशहाल दांपत्य जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं।

सावन का महीना और मंगला गौरी व्रत का महत्व

सावन का महीना भगवान शिव और माता गौरी को समर्पित एक बहुत ही शुभ समय माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान व्रत, पूजा और आध्यात्मिक कार्यों से कई गुना लाभ मिलता है। विवाहित और नई-नई शादीशुदा महिलाओं के लिए मंगला गौरी व्रत का खास महत्व है, क्योंकि इससे उनके वैवाहिक जीवन में प्यार, तालमेल, समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं, माता गौरी की विधि-विधान से पूजा करती हैं और मंत्रों व प्रार्थनाओं के जरिए उनका आशीर्वाद मांगती हैं।

साल 2026 में मंगला गौरी व्रत की तारीखें

पहला मंगला गौरी व्रत – 4 अगस्त 2026, मंगलवार।

दूसरा मंगला गौरी व्रत – 11 अगस्त 2026, मंगलवार।

तीसरा मंगला गौरी व्रत – 18 अगस्त 2026, मंगलवार।

चौथा मंगला गौरी व्रत – 25 अगस्त 2026, मंगलवार।

मंगला गौरी व्रत धार्मिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है

हिंदू धर्म में मंगला गौरी व्रत को बहुत फलदायी और शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरी श्रद्धा के साथ यह व्रत रखने से अविवाहित महिलाओं की शादी में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं और उन्हें योग्य जीवनसाथी मिलता है। वहीं, विवाहित महिलाओं को वैवाहिक सुख, सौभाग्य और परिवार की खुशहाली का आशीर्वाद मिलता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह व्रत कुंडली में मौजूद मंगल दोष और अन्य अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम करने में भी मदद करता है।

सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा एक अनोखा त्योहार

मंगला गौरी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि भारतीय पारिवारिक संस्कृति का एक अहम हिस्सा भी है। यह व्रत मज़बूत वैवाहिक बंधन, पारिवारिक प्रेम और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक माना जाता है। नई-नई शादीशुदा महिलाएँ बड़े उत्साह के साथ यह व्रत रखती हैं और देवी गौरी से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और पति की अच्छी सेहत के लिए प्रार्थना करती हैं।

मंगला गौरी व्रत की पौराणिक कथा

पुरानी मान्यताओं के अनुसार, धर्मपाल नाम के एक अमीर व्यापारी और उनकी पत्नी के पास भौतिक सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। ईश्वर की कृपा से उन्हें एक बेटा हुआ, लेकिन उस पर कम उम्र में ही मृत्यु का खतरा मंडरा रहा था। कहा जाता है कि सोलह साल की उम्र में साँप के काटने से उसकी मौत हो गई, जबकि उसकी शादी हो चुकी थी। उसकी पत्नी की माँ नियमित रूप से मंगला गौरी का व्रत रखती थीं। देवी गौरी की कृपा और व्रत की शक्ति से परिवार पर आया संकट टल गया और उस युवक को लंबी उम्र मिली; कहा जाता है कि वह सौ साल तक जीवित रहा। तब से, यह व्रत लंबे समय तक चलने वाले वैवाहिक सुख और खुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी का प्रतीक माना जाता है।

उत्तर और दक्षिण भारत में अलग-अलग परंपराएँ

दक्षिण भारत में खासकर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और गोवा में मंगला गौरी व्रत बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहाँ इसे 'श्री मंगला गौरी व्रतम' के नाम से जाना जाता है। उत्तर और दक्षिण भारत में अलग-अलग चंद्र कैलेंडर प्रणालियों का पालन किए जाने के कारण श्रावण महीने और मंगला गौरी व्रत की तारीखों में अंतर होता है। दक्षिण भारत में अमांत कैलेंडर प्रणालीका पालन किया जाता है, जबकि उत्तर भारत में पूर्णिमांत कैलेंडर प्रणाली का पालन किया जाता है।

मंगला गौरी व्रत की पूजा-विधि

श्रावण महीने के दौरान मंगलवार को सुबह स्नान करने के बाद, घर के पूजा स्थल या ईशान कोण में देवी मंगला गौरी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित की जाती है। देवी की स्थापना के लिए लाल कपड़ा बिछाया जाता है और घी के दीपक जलाए जाते हैं। इसके बाद, मंत्रों के जाप, ध्यान और षोडशोपचार  के माध्यम से देवी की पूजा की जाती है।

व्रत की तैयारी करते समय 

ध्यान रखने योग्य बातें
 मंगला गौरी व्रत की तैयारी पूरी श्रद्धा और बताए गए नियमों का सख्ती से पालन करते हुए की जाती है। इस पूजा के लिए सोलह मालाएं, सोलह लड्डू, सोलह तरह के फल, सोलह पान के पत्ते, सोलह सुपारी, सोलह लौंग, सोलह इलायची और अन्य शुभ चीजें इकट्ठा की जाती हैं। देवी की मूर्ति को लाल कपड़े पर रखा जाता है और नवग्रह, भगवान गणेश और षोडश मातृकाओं (सोलह दिव्य माताओं) की पूजा की जाती है। पूजा के बाद, व्रत से जुड़ी कथा सुनना या पढ़ना बहुत ज़रूरी माना जाता है।

व्रत का ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिष शास्त्र में, मंगला गौरी व्रत को वैवाहिक जीवन से जुड़ी समस्याओं को दूर करने का एक असरदार उपाय माना जाता है। यह व्रत उन महिलाओं के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है जिनकी कुंडली में *मंगल दोष*, शादी में देरी, वैवाहिक कलह या वैवाहिक जीवन पर बुरा असर डालने वाले अन्य अशुभ ग्रहों के योग हों। लगातार 16 मंगलवार तक यह व्रत रखने से मंगल ग्रह के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है, ऐसा माना जाता है।

आध्यात्मिक लाभ
मंगला गौरी व्रत केवल भौतिक सुख-सुविधाओं तक ही सीमित नहीं है; इसे मन की शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक विकास पाने का एक ज़रिया भी माना जाता है। देवी पार्वती की पूजा करने से जीवन में शुभता, संतुलन और मानसिक संतोष मिलता है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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