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Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ रथयात्रा से पहले बिना घंटी और शंखनाद के क्यों होती है आरती?

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Jagannath Aarti: भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का ऐसा दिव्य आयोजन है जिसमें हर छोटी-बड़ी परंपरा का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व है। रथयात्रा के दौरान अनेक ऐसी प्राचीन परंपराएँ निभाई जाती हैं 

Jagannath Aarti:
Jagannath Aarti: भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का ऐसा दिव्य आयोजन है जिसमें हर छोटी-बड़ी परंपरा का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व है। रथयात्रा के दौरान अनेक ऐसी प्राचीन परंपराएँ निभाई जाती हैं जो दुनिया के किसी अन्य मंदिर में देखने को नहीं मिलतीं। इन्हीं में से एक अनोखी परंपरा है कि रथयात्रा आरंभ होने से पहले भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की आरती बिना घंटी बजाए और बिना शंखनाद के की जाती है।सामान्यतः हिंदू मंदिरों में आरती के समय घंटी और शंख बजाना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि घंटी की ध्वनि वातावरण को पवित्र करती है और शंखनाद नकारात्मक शक्तियों का नाश करता है। फिर आखिर पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा से पहले इन दोनों का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यता और सदियों पुरानी परंपरा जुड़ी हुई है।

 मौन और श्रद्धा का विशेष महत्व

जगन्नाथ संस्कृति में रथयात्रा को भगवान के अपने भक्तों के बीच आने का उत्सव माना जाता है। इस अवसर पर भगवान मंदिर की मर्यादा छोड़कर स्वयं नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। इसलिए यात्रा शुरू होने से पहले की आरती अत्यंत शांत और गंभीर वातावरण में की जाती है।माना जाता है कि इस समय भगवान यात्रा की तैयारी में होते हैं और उनका मन भक्तों के कल्याण की ओर केंद्रित रहता है। इसलिए किसी भी प्रकार का तेज ध्वनि-वाद्य, जैसे घंटी या शंख, नहीं बजाया जाता। यह मौन भगवान के प्रति विनम्रता और आदर का प्रतीक माना जाता है पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में हर सेवा का एक निश्चित विधान है। मंदिर के सेवायत सदियों से चली आ रही परंपराओं का अक्षरशः पालन करते हैं। रथयात्रा से पहले होने वाली विशेष आरती में भी यही नियम लागू होता है कि घंटी और शंख का उपयोग नहीं किया जाएगा।यह नियम किसी एक व्यक्ति द्वारा बनाया गया नहीं है, बल्कि मंदिर की प्राचीन सेवा-पद्धति का हिस्सा है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाया जा रहा है।

 भगवान के प्रस्थान का प्रतीक

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान जगन्नाथ रथ पर विराजमान होकर मंदिर से बाहर निकलने की तैयारी करते हैं, तब उन्हें किसी राजा की तरह नहीं, बल्कि अपने भक्तों के बीच जाने वाले करुणामय प्रभु के रूप में देखा जाता है।इस समय वातावरण में सादगी और गंभीरता बनाए रखी जाती है। बिना घंटी और शंख की आरती यह संदेश देती है कि भगवान किसी विजय यात्रा पर नहीं, बल्कि अपने भक्तों का हाल जानने और उन्हें दर्शन देने जा रहे हैं।

 आध्यात्मिक एकाग्रता का संदेश

माना जाता है कि जब बाहरी ध्वनियाँ कम होती हैं, तब मन अधिक एकाग्र होता है। इसलिए इस विशेष आरती में भक्तों का ध्यान केवल भगवान के दर्शन, उनके स्वरूप और उनकी कृपा पर केंद्रित रहता है।घंटी और शंख की अनुपस्थिति भक्तों को बाहरी शोर से दूर रखती है और उन्हें भक्ति के गहरे भाव में प्रवेश करने का अवसर देती है।

परंपरा और अनुशासन का अद्भुत उदाहरण

जगन्नाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ की प्रत्येक सेवा समय और नियम के अनुसार होती है। चाहे लाखों श्रद्धालु उपस्थित हों, परंपराओं में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता।रथयात्रा से पहले की यह शांत आरती इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य केवल भव्यता नहीं, बल्कि शास्त्रीय विधि और आध्यात्मिक अनुशासन का पालन भी है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

 

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