
मान्यता है कि प्राचीन समय में दक्षिण भारत के एक महान भक्त गणपति भट्ट भगवान गणेश के परम उपासक थे। वे प्रत्येक वर्ष विभिन्न तीर्थों की यात्रा करते थे और अंततः भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने पुरी पहुँचे। मंदिर में प्रवेश करते समय उनके मन में एक इच्छा थी कि वे अपने आराध्य भगवान गणेश के स्वरूप का दर्शन करें। जब उन्होंने गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन किए, तो उनके मन में थोड़ा संकोच उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा कि यहाँ तो विष्णु स्वरूप भगवान विराजमान हैं, जबकि वे तो गणपति के भक्त हैं। वे मन ही मन उदास हो गए और बिना पूर्ण संतोष के मंदिर से बाहर निकलने लगे।भगवान जगन्नाथ अपने भक्त के मन की भावना को तुरंत समझ गए। वे जानते थे कि सच्चे भक्त के लिए भगवान का स्वरूप नहीं, बल्कि उसका प्रेम और श्रद्धा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए उन्होंने अपने भक्त की इच्छा पूर्ण करने का निश्चय किया।
कथा के अनुसार उसी रात भगवान जगन्नाथ ने दिव्य चमत्कार किया। अगले दिन जब गणपति भट्ट पुनः मंदिर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा सभी हाथी के समान विशाल मुख और सूँड वाले दिव्य स्वरूप में विराजमान हैं। यह दृश्य देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए।उन्हें ऐसा अनुभव हुआ मानो स्वयं भगवान गणेश उनके सामने विराजमान हों। उनकी आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे। उन्होंने भगवान के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी और समझ गए कि भगवान एक ही हैं, केवल उनके स्वरूप अनेक हैं। भक्त जिस रूप में उन्हें प्रेम से स्मरण करता है, भगवान उसी रूप में दर्शन देकर उसकी श्रद्धा को स्वीकार करते हैं।यही घटना आगे चलकर गज वेश के रूप में प्रसिद्ध हो गई। तब से स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ का हाथी स्वरूप में विशेष श्रृंगार किया जाने लगा।
ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य महास्नान होता है। इस अवसर पर 108 पवित्र कलशों के जल से भगवानों का अभिषेक किया जाता है। स्नान के बाद यह माना जाता है कि भगवान को ज्वर हो जाता है और वे कुछ दिनों के लिए विश्राम करते हैं। इस अवधि को अनसर काल कहा जाता है।महास्नान के बाद भगवानों को गज वेश धारण कराया जाता है। इस वेश में भगवान जगन्नाथ और बलभद्र को सुंदर हाथी के मुख, लंबी सूँड, बड़े कान तथा आकर्षक अलंकरणों से सजाया जाता है। देवी सुभद्रा को भी विशेष आभूषणों और दिव्य वस्त्रों से अलंकृत किया जाता है। यह दृश्य भक्तों के लिए अत्यंत मनोहारी और दुर्लभ होता है।
गज वेश केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है। हाथी भारतीय संस्कृति में बुद्धि, शक्ति, धैर्य और मंगल का प्रतीक माना जाता है। भगवान गणेश भी हाथीमुख धारण करते हैं और विघ्नों का नाश करने वाले प्रथम पूज्य देव कहलाते हैं।भगवान जगन्नाथ का गज वेश यह संदेश देता है कि ईश्वर किसी एक रूप तक सीमित नहीं हैं। वे भक्त की भावना के अनुसार किसी भी स्वरूप में प्रकट हो सकते हैं। उनके लिए जाति, संप्रदाय, भाषा या उपासना पद्धति का कोई बंधन नहीं होता। सच्ची भक्ति और निष्कपट प्रेम ही भगवान तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है।यह वेश हमें यह भी सिखाता है कि विभिन्न देवी-देवताओं में कोई भेद नहीं है। सभी रूप उसी एक परम दिव्य शक्ति की अभिव्यक्ति हैं। इसलिए सभी का सम्मान और श्रद्धा के साथ पूजन करना चाहिए।
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