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Bhagvan Shiv: भगवान शिव ने क्यों किया दक्ष का वध? जानिए पौराणिक कहानी

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bhagvan Shiv:  हिंदू पुराणों में भगवान शिव और राजा दक्ष की कहानी अहंकार, भक्ति, सती के त्याग और महाविनाश की एक बेहद मार्मिक और शक्तिशाली गाथा है।

Bhagvan Shiv: 
Bhagvan Shiv:  हिंदू पुराणों में भगवान शिव और राजा दक्ष की कहानी अहंकार, भक्ति, सती के त्याग और महाविनाश की एक बेहद मार्मिक और शक्तिशाली गाथा है। शिव महापुराण के अनुसार, प्रजापति दक्ष का वध किसी व्यक्तिगत शत्रुता के कारण नहीं, बल्कि उनके चरम पर पहुंचे अहंकार को नष्ट करने और सृष्टि में धर्म की पुनः स्थापना के लिए किया गया था। 

कैसा था भगवान शिव और राजा दक्ष का संबंध

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष को सृष्टि के संचालन और नियमों का बहुत अभिमान था। वे राजा थे और ऐश्वर्य, नियमों तथा सामाजिक मर्यादाओं को ही सब कुछ मानते थे। इसके विपरीत, भगवान शिव वैरागी थे भस्म रमाने वाले, श्मशान में रहने वाले और सांसारिक आडंबरों से दूर रहने वाले।जब दक्ष की पुत्री सती ने कठिन तपस्या करके भगवान शिव को अपने पति के रूप में चुना, तो दक्ष इस विवाह से बिल्कुल खुश नहीं थे। वे शिव के रहन-सहन और उनके गणों (भूत-प्रेत) को नापसंद करते थे। विवाह के बाद एक बार ब्रह्मा जी की सभा में जब दक्ष पहुंचे, तो सभी देवताओं ने खड़े होकर उनका सम्मान किया, लेकिन ब्रह्मा जी और भगवान शिव अपने स्थान पर बैठे रहे। शिव को जगतगुरु और सर्वोच्च स्थान प्राप्त था, इसलिए वे नहीं उठे। लेकिन अहंकारी दक्ष ने इसे अपना व्यक्तिगत अपमान मान लिया और उनके मन में शिव के प्रति नफरत और गहरी हो गई।

राजा दक्ष ने किा भव्य यज्ञ का आयोजन 

शिव से बदला लेने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए राजा दक्ष ने एक विशाल 'बृहस्पतिसर्व' यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने ब्रह्मांड के सभी देवी-देवताओं, गंधर्वों, ऋषियों और अप्सराओं को आमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर अपनी पुत्री सती और दामाद भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा।जब माता सती को आकाश मार्ग से जाते हुए देवताओं के विमानों से इस यज्ञ का पता चला, तो उन्होंने शिव जी से वहां जाने का आग्रह किया। भगवान शिव ने सती को समझाते हुए कहा:"बिना बुलाए किसी के घर जाने से सम्मान नष्ट होता है, चाहे वह आपके पिता का घर ही क्यों न हो।"परंतु सती का मानना था कि पिता के घर जाने के लिए किसी औपचारिक निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। वे शिव जी के मना करने के बावजूद अपने कुछ गणों के साथ पिता के राज्य कनखल पहुंच गईं।

माता सती का अपमान 

यज्ञ स्थल पर पहुंचने पर सती को भारी निराशा हुई। उनकी माता और बहनों के अलावा किसी ने उनसे ठीक से बात नहीं की। राजा दक्ष ने सती को देखकर पूरे दरबार के सामने भगवान शिव का अत्यंत अपमानजनक शब्दों में उपहास उड़ाया। दक्ष ने शिव को अमंगलकारी, निर्धन और देवताओं की श्रेणी से बाहर बताया।सती अपने पति और चराचर जगत के स्वामी महादेव के लिए ऐसे कटु वचन सहन नहीं कर पाईं। उन्हें इस बात का भी गहरा पश्चाताप हुआ कि उन्होंने शिव की आज्ञा का उल्लंघन किया। अत्यंत क्रोध और ग्लानि में आकर सती ने कहा कि जिस शरीर ने दक्ष जैसे पापी के अंश से जन्म लिया है, वे उसका त्याग कर देंगी। उन्होंने यज्ञ मंडप में बैठकर अपनी योग अग्नि (आंतरिक ऊर्जा) का आह्वान किया और देखते ही देखते स्वयं को यज्ञ की पवित्र अग्नि में भस्म कर लिया।

शिव का रुद्र रूप और वीरभद्र का प्राकट्य

जैसे ही सती के भस्म होने का समाचार कैलाश पहुंचा, भगवान शिव अत्यंत शोक और भयंकर क्रोध से भर उठे। उन्होंने तांडव करना शुरू कर दिया, जिससे पूरी सृष्टि कांपने लगी।अपने इस परम क्रोध में शिव जी ने अपनी एक जटा उखाड़कर पर्वत पर पटकी। उस जटा से महाबली  वीरभद्र और महाकाली  का प्राकट्य हुआ। शिव ने वीरभद्र को आदेश दिया कि वे तुरंत कनखल जाएं और दक्ष के उस यज्ञ को पूरी तरह नष्ट करके दक्ष का वध कर दें।वीरभद्र अपने साथ शिवगणों की विशाल सेना लेकर दक्ष के यज्ञ स्थल पर पहुंचे। वहां पहुंचते ही भयंकर तबाही मच गई। यज्ञशाला को तहस-नहस कर दिया गया, देवताओं को खदेड़ दिया गया और ऋषियों के आसन उखाड़ फेंके गए। अंत में, वीरभद्र ने राजा दक्ष को दबोच लिया और उनका सिर धड़ से अलग करके यज्ञ की वेदी के कुंड में फेंक दिया। इस प्रकार दक्ष के अहंकार का अंत हुआ।दक्ष के वध के बाद जब ब्रह्मा जी और अन्य देवताओं ने शिव जी की स्तुति की और उनसे शांत होने की प्रार्थना की, तो भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ। चूंकि यज्ञ को अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता था, इसलिए शिव जी ने दयावश दक्ष को पुनः जीवित करने का निर्णय लिया।  लेकिन तब तक दक्ष का सिर यज्ञ कुंड में जल चुका था, इसलिए उनके धड़ पर एक बकरे का सिर लगाया गया। जीवित होते ही दक्ष का अहंकार पूरी तरह चूर हो चुका था। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और महादेव से क्षमा मांगी। इसके बाद यज्ञ सकुशल संपन्न हुआ।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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