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Maa Kaali: मां काली ने कैसे किया रक्तबीज का वध? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Maa Kaali Story: पौराणिक कथाओं के अनुसार रक्तबीज एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। 

Maa Kaali Mythological Story: 
Maa Kaali Mythological Story: सनातन धर्म के शक्तिपरंपरा ग्रंथों में मां काली के अनेक दिव्य स्वरूपों का वर्णन मिलता है। इन्हीं में से एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है, रक्तबीज नामक महादैत्य के वध का, जिसका उल्लेख मुख्य रूप से देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) में मिलता है। यह कथा देवी और असुरों के बीच हुए भीषण युद्ध का वर्णन करती है, जिसमें रक्तबीज ऐसा दैत्य था, जिसे पराजित करना देवताओं और देवी के लिए भी अत्यंत कठिन हो गया था। उसका वरदान ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति था, जिसके कारण युद्ध का पलड़ा बार-बार असुरों की ओर झुकने लगा। तब मां काली ने ऐसा अद्भुत उपाय किया, जिससे रक्तबीज का अंत संभव हो सका। आइए जानते हैं कि आखिर रक्तबीज कौन था और मां काली ने उसका वध किस प्रकार किया।

रक्तबीज कौन था?

पौराणिक कथाओं के अनुसार रक्तबीज एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। तप से संतुष्ट होकर ब्रह्माजी ने उसे वरदान मांगने के लिए कहा। तब रक्तबीज ने ऐसा वर मांगा कि युद्ध के दौरान उसके शरीर से जितनी भी रक्त की बूंदें पृथ्वी पर गिरें, प्रत्येक बूंद से उसके समान बलवान और पराक्रमी एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाए। ब्रह्माजी ने उसे यह वरदान प्रदान कर दिया। यही वरदान आगे चलकर देवताओं के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया। रक्तबीज को विश्वास हो गया कि अब संसार में कोई भी उसका अंत नहीं कर सकेगा। धीरे-धीरे उसका अहंकार बढ़ता गया और उसने तीनों लोकों में अपना आतंक फैलाना शुरू कर दिया।

शुंभ-निशुंभ की सेना का प्रमुख योद्धा

देवी महात्म्य के अनुसार शुंभ और निशुंभ नामक दो महाबली असुरों ने देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। उनके अनेक सेनापतियों में रक्तबीज भी सबसे शक्तिशाली माना जाता था। जब देवी चंडिका ने शुंभ-निशुंभ के विरुद्ध युद्ध प्रारंभ किया, तब उनके अनेक असुर सेनापति एक-एक करके मारे जाने लगे। धूम्रलोचन, चंड और मुंड जैसे असुरों के वध के बाद शुंभ और निशुंभ ने रक्तबीज को युद्धभूमि में भेजा। उन्हें विश्वास था कि उसका वरदान देवी के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध होगा।

देवी और रक्तबीज के बीच प्रारंभ हुआ भीषण युद्ध

रक्तबीज विशाल सेना के साथ युद्धभूमि में पहुंचा। देवी चंडिका, मां कौमारी, ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, ऐंद्री, वाराही और अन्य मातृशक्तियां भी युद्ध में उपस्थित थीं। सभी देवशक्तियों ने मिलकर रक्तबीज पर अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार किए, लेकिन जैसे ही उसके शरीर पर आघात होता और रक्त की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरतीं, उसी क्षण वहां एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता। प्रत्येक नया असुर उसी के समान शक्तिशाली होता था और तुरंत युद्ध में शामिल हो जाता था। जितना अधिक उस पर प्रहार किया जाता, उतनी ही तेजी से उसकी संख्या बढ़ती जाती। देखते ही देखते युद्धभूमि असंख्य रक्तबीजों से भर गई। देवी की सेना जिन असुरों का वध करती, उनकी जगह और अधिक असुर उत्पन्न हो जाते।

देवताओं की बढ़ी चिंता

रक्तबीज के वरदान के कारण युद्ध अत्यंत कठिन हो गया। देवताओं ने देखा कि सामान्य युद्धनीति से इस असुर को पराजित करना संभव नहीं है। यदि उसके शरीर से रक्त गिरता रहा, तो उसकी संख्या अनंत होती जाएगी और युद्ध कभी समाप्त नहीं होगा। देवगण देवी की ओर देखने लगे। उन्हें विश्वास था कि केवल आदिशक्ति ही इस संकट का समाधान कर सकती हैं।

मां काली का प्रकट होना

देवी महात्म्य में वर्णन मिलता है कि युद्ध की स्थिति को देखते हुए देवी चंडिका ने अपने ललाट से एक उग्र और विकराल शक्ति को प्रकट किया। यही स्वरूप मां काली कहलाया। उनका वर्ण श्याम था, नेत्र अग्नि के समान प्रज्वलित थे, जिह्वा बाहर निकली हुई थी और हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र सुशोभित थे। उनके प्रकट होते ही संपूर्ण युद्धभूमि में भय और विस्मय का वातावरण फैल गया। असुर सेना भी उनके विकराल रूप को देखकर विचलित हो उठी।

देवी चंडिका ने मां काली को दिया विशेष आदेश

देवी चंडिका ने मां काली से कहा कि रक्तबीज का वध तभी संभव है जब उसके शरीर से निकलने वाली रक्त की एक भी बूंद पृथ्वी पर न गिरने पाए। उन्होंने आदेश दिया कि जैसे ही रक्तबीज पर प्रहार हो, उसी क्षण उसके शरीर से निकलने वाले समस्त रक्त को पी लिया जाए, ताकि उससे कोई नया असुर जन्म न ले सके। यही इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था।

कैसे किया मां काली ने रक्तबीज का वध?

मां काली तुरंत युद्धभूमि में सक्रिय हो गईं। देवी चंडिका ने अपने अस्त्रों से रक्तबीज पर लगातार प्रहार करना प्रारंभ किया। जैसे ही उसके शरीर से रक्त निकलता, मां काली अपनी विशाल जिह्वा से उसे तुरंत ग्रहण कर लेतीं। रक्त की एक भी बूंद भूमि तक पहुंचने नहीं दी गई। इतना ही नहीं, जो नए रक्तबीज पहले से उत्पन्न हो चुके थे, मां काली उन्हें भी एक-एक करके निगलने लगीं ताकि वे पुनः युद्ध न कर सकें। युद्ध के दौरान देवी चंडिका के प्रत्येक प्रहार के साथ मां काली अत्यंत तीव्र गति से उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को पीती रहीं। इस प्रकार पहली बार रक्तबीज का वरदान निष्प्रभावी हो गया।

वरदान कैसे हुआ निष्फल?

रक्तबीज की संपूर्ण शक्ति उसके रक्त में ही निहित थी। जब तक रक्त पृथ्वी पर गिरता रहा, तब तक उसके समान नए असुर उत्पन्न होते रहे। लेकिन मां काली ने उसकी प्रत्येक रक्तबूंद को पृथ्वी तक पहुंचने से पहले ही ग्रहण कर लिया। अब उसके शरीर से रक्त निकलने पर कोई नया रक्तबीज उत्पन्न नहीं हो पा रहा था। धीरे-धीरे उसके शरीर का समस्त रक्त समाप्त होने लगा और उसका बल भी क्षीण होने लगा। अंततः देवी चंडिका के प्रचंड प्रहारों से रक्तबीज भूमि पर गिर पड़ा। इस बार उसके शरीर से निकला रक्त भी मां काली ने पी लिया। परिणामस्वरूप उसके पुनर्जन्म की कोई संभावना नहीं बची और उसका अंत हो गया।

युद्धभूमि में समाप्त हुआ रक्तबीज का आतंक

रक्तबीज के मारे जाते ही उसके द्वारा उत्पन्न समस्त संकट समाप्त हो गया। जो असुर उसके रक्त से उत्पन्न हुए थे, वे भी मां काली द्वारा नष्ट कर दिए गए। देवताओं ने राहत की सांस ली और देवी की स्तुति करने लगे। इसके बाद देवी ने शुंभ और निशुंभ के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। अंततः दोनों असुरों का भी वध हुआ और देवताओं को पुनः स्वर्ग का अधिकार प्राप्त हुआ।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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