Kannappa Story: भक्ति की पराकाष्ठा और निश्छल प्रेम की जब भी बात आती है, तो दक्षिण भारत के महान शिव भक्त कन्नप्पा का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। कन्नप्पा भगवान शिव के 63 नयनारों (महान शैव संतों) में से एक थे। उनकी कहानी यह सिखाती है कि ईश्वर कर्मकांड या नियमों के भूखे नहीं हैं, वे केवल सच्चे और निश्छल प्रेम के भूखे हैं।आइए विस्तार से जानते हैं कि कन्नप्पा कौन थे और उन्होंने क्यों भगवान शिव को अपनी आंखें दान कर दी थीं।
कन्नप्पा कौन थे?
कन्नप्पा का प्रारंभिक नाम तिन्ना था। उनका जन्म आंध्र प्रदेश के श्रीकालहस्ती के पास उडुमूर नामक स्थान पर एक शिकारी परिवार में हुआ था। वह पहाड़ों और जंगलों में रहने वाले किरात समुदाय के मुखिया नागा के पुत्र थे। तिन्ना बचपन से ही तीरंदाजी और शिकार में बेहद निपुण थे।चूंकि वह एक शिकारी परिवार से थे, इसलिए उनका रहन-सहन, खान-पान और जीवन जीने का तरीका वेदों या शास्त्रों के अनुसार नहीं था। लेकिन उनके भीतर एक अबोध और निश्छल हृदय था, जो किसी भी प्रकार के छल-कपट से दूर था।
तिन्ना की अनोखी भक्ति
एक बार तिन्ना अपने साथियों के साथ शिकार पर निकले। जंगल में भटकते हुए वे सुवर्णमुखी नदी के पास पहुंचे, जहाँ एक ऊंचे पहाड़ पर उन्हें एक प्राचीन शिवलिंग मिला। यह शिवलिंग श्रीकालहस्तीश्वर का था।जैसे ही तिन्ना ने उस शिवलिंग को देखा, उनके भीतर का सोता हुआ भक्ति भाव जाग उठा। उन्हें शिवलिंग के प्रति एक ऐसा गहरा, आत्मीय और वात्सल्य जैसा प्रेम महसूस हुआ, जैसे कोई अपने बिछड़े हुए पिता से मिल गया हो। उन्होंने देखा कि शिवलिंग खुले आसमान के नीचे है, उस पर धूल जमी है।तिन्ना को लगा कि उनके प्रभु जंगल में अकेले और भूखे हैं। उनके पास पूजा की कोई शास्त्रीय विधि नहीं थी, इसलिए उन्होंने अपनी सहज बुद्धि से प्रभु की सेवा करने की ठानी। आपको बता दें कि उसके पास शिवलिंग को स्नान कराने के लिए उनके पास कोई पात्र नहीं था, इसलिए वह पास की नदी से अपने मुंह में पानी भरकर लाते और शिवलिंग पर कुल्ला करके उन्हें स्नान कराते।भगवान को चढ़ाने के लिए वह जंगली फूल तोड़ते और उन्हें अपने बालों में खोंस कर लाते, ताकि हाथ खाली रहें और फिर सिर झुकाकर वे फूल शिवलिंग पर अर्पित कर देते।एक शिकारी होने के नाते, उनका सबसे उत्तम भोजन मांस था। वह मांस लाते, उसे चखकर देखते कि वह स्वादिष्ट और पका हुआ है या नहीं, और फिर वही जूठा लेकिन सबसे उत्तम मांस भगवान शिव को भोग के रूप में चढ़ा देते।
ब्राह्मण शिवगोचरिया और तिन्ना की परीक्षा
उसी मंदिर में नियमित रूप से एक वृद्ध ब्राह्मण पुजारी आते थे, जिनका नाम शिवगोचरिया था। वे शास्त्रों के ज्ञाता थे और नियमों के अनुसार पूजा करते थे। जब वे रोज़ सुबह आते, तो मंदिर में मांस के टुकड़े, हड्डियों के अवशेष और कुल्ले का पानी देखकर अत्यंत दुखी और क्रोधित हो जाते। वे रोते हुए मंदिर की सफाई करते, पंचगव्य से शुद्धिकरण करते और फिर से वैदिक मंत्रों के साथ पूजा करते।यह सिलसिला कई दिनों तक चला। दिन में शिवगोचरिया विधि-विधान से पूजा करते और शाम को तिन्ना अपने भोले प्रेम से। भगवान शिव ने अपने दोनों भक्तों की भक्ति को स्वीकार किया, लेकिन वे दुनिया और शिवगोचरिया को दिखाना चाहते थे कि तिन्ना की सहज भक्ति का स्तर क्या है।एक रात भगवान शिव ने शिवगोचरिया के सपने में आकर कहा "तुम जिसे अपवित्र समझ रहे हो, उसकी अज्ञानता में भी अगाध प्रेम है। वह जो जल मुझ पर थूकता है, वह मेरे लिए गंगाजल के समान है। जो मांस वह मुझे खिलाता है, वह अमृत है। यदि तुम उसकी भक्ति देखना चाहते हो, तो कल मंदिर के पीछे छिपकर देखना।"
भगवान शिव को आंखें की दान
अगले दिन शिवगोचरिया मंदिर के पीछे एक झाड़ी में छिप गए। कुछ ही देर में तिन्ना हमेशा की तरह अपने मुंह में पानी और हाथ में मांस लेकर आए। लेकिन उस दिन भगवान शिव ने एक लीला रची।जैसे ही तिन्ना शिवलिंग के पास पहुंचे, उन्होंने देखा कि शिवलिंग की दाहिनी आंख से खून बह रहा है। यह देखकर तिन्ना के होश उड़ गए। उनका 'प्रभु' दर्द में था। उन्होंने तुरंत तीर-कमान फेंक दिया और रोने लगे। उन्होंने जड़ी-बूटियाँ लाकर आँख पर लगाईं, लेकिन खून नहीं रुका।तभी तिन्ना को सूझा कि "आंख के बदले आंख" ही इसका एकमात्र इलाज है। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने तरकश से एक पैना तीर निकाला और अपनी दाहिनी आंख को जड़ से खोदकर निकाल लिया। अत्यंत पीड़ा होने के बावजूद, उन्होंने मुस्कुराते हुए उस आंख को शिवलिंग की दाहिनी आंख पर लगा दिया। चमत्कारिक रूप से शिवलिंग से खून बहना बंद हो गया। तिन्ना खुशी से नाचने लगे।लेकिन परीक्षा अभी बाकी थी। कुछ ही क्षणों बाद, शिवलिंग की बाईं आंख से भी खून और पानी बहने लगा।तिन्ना ने सोचा कि अब वह अपनी दूसरी आंख भी निकाल लेंगे, लेकिन उनके सामने एक व्यावहारिक समस्या खड़ी हो गई। अगर वह अपनी दूसरी आंख भी निकाल लेंगे, तो वे पूरी तरह अंधे हो जाएंगे। अंधे होने के बाद उन्हें दिखेगा कैसे कि शिवलिंग की बाईं आंख कहाँ है और वह अपनी निकाली हुई आंख को सही जगह पर कैसे लगाएंगे?इस समस्या का तिन्ना ने एक अद्भुत समाधान निकाला। उन्होंने अपने बाएं पैर के अंगूठे को शिवलिंग की बहती हुई बाईं आंख पर रख दिया ताकि स्पर्श से स्थान का पता रहे। फिर उन्होंने जैसे ही अपनी दूसरी आंख निकालने के लिए तीर उठाया, वैसे ही स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए।
'कन्नप्पा' नाम और मोक्ष की प्राप्ति
भगवान शिव ने प्रकट होकर तिन्ना का हाथ पकड़ लिया और उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। शिव जी ने उनकी दोनों आंखें तुरंत ठीक कर दीं और उन्हें दिव्य दृष्टि दी। भगवान शिव ने अत्यंत भावुक होकर उन्हें तीन बार "कन्नप्पा! कन्नप्पा! कन्नप्पा!" कहकर पुकारा। तमिल भाषा में 'कण' का अर्थ 'आँख' होता है, इसलिए उनका नाम 'कन्नप्पा' पड़ा।झाड़ी के पीछे छिपे पुजारी शिवगोचरिया यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उन्हें समझ आ गया कि बाहरी शुद्धता और किताबी ज्ञान से कहीं बढ़कर मन की शुद्धता और आत्मसमर्पण होता है।भगवान शिव ने कन्नप्पा को अपनी गोद में उठा लिया और उन्हें सायुज्य मुक्ति प्रदान की। आज भी श्रीकालहस्तीश्वर मंदिर में भगवान शिव के दर्शन के साथ-साथ भक्त नयनार कन्नप्पा की भी पूजा की जाती है।