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Vishvamitra Story: कौन थे विश्वामित्र? जिन्होंने श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को दिया था आध्यात्मिक ज्ञान

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी साह
सार

Vishvamitra Ki Katha: विश्वामित्र का जन्म कुशिक वंश में हुआ था, जो इक्ष्वाकु कुल की एक शाखा थी। उनके पिता राजा गाधि थे, जो सत्यवती के पति और जमदग्नि के समकालीन माने जाते हैं।

Vishvamitra
Who Was Vishvamitra:  भारतीय पुराणों और महाकाव्यों में विश्वामित्र का नाम एक ऐसे योद्धा-ऋषि के रूप में उभरता है, जिन्होंने राजसी वैभव को त्यागकर तपस्या की अग्नि में खुद को तपाया और ब्रह्मर्षि की पराकाष्ठा को छुआ। महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय होने के बावजूद अपने तप के बल से महर्षि हुए और फिर ब्रह्मऋषि तथा सातवें मन्वंतर में उन्हें सप्त ऋषियों में स्थान मिला। विश्वामित्र रामायण के महान गुरु, गायत्री मंत्र के अमर द्रष्टा, मेनका-शकुंतला के पिता, त्रिशंकु के स्वर्ग-निर्माता के रूप में पहचाने जाते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि रामायण में श्रीराम को दिव्यअस्त्रों की शिक्षा देने वाले महान गुरु का जीवनकाल कैसा रहा? आइए जानते हैं विश्वामित्र से जुड़ी पौराणिक कथा...

कुशिक वंश का राजकुमार


विश्वामित्र का जन्म कुशिक वंश में हुआ था, जो इक्ष्वाकु कुल की एक शाखा थी। उनके पिता राजा गाधि थे, जो सत्यवती के पति और जमदग्नि के समकालीन माने जाते हैं। विश्वामित्र का मूल नाम विश्वरथ था। बाल्यकाल से ही विश्वामित्र में राजसी गरिमा और युद्धकला की अद्भुत कुशलता थी। युवावस्था में वे गाधि के उत्तराधिकारी बने और कौशिक राज्य के सम्राट। उनकी राजधानी कौशांबी थी, जो प्रयाग के निकट गंगा-यमुना के संगम पर बसी थी। 

राजा विश्वामित्र के पास हजार हाथियों का दल, लाखों घुड़सवार और असीम धन था। वे क्षत्रिय धर्म के पालन में कठोर थे- दान, यज्ञ, प्रजा पालन और शत्रु संहार में कोई कोताही नहीं, लेकिन उनके हृदय में एक अग्नि सुलग रही थी- वह थी ब्रह्मतेज को जीतने की लालसा। वे जानते थे कि क्षत्रिय बल से ब्राह्मण तेज श्रेष्ठ है और यही महत्वाकांक्षा उन्हें वशिष्ठ के आश्रम तक ले गई।

नंदिनी हरण और शाप

एक दिन राजा विश्वामित्र अपने विशाल सैन्य दल के साथ वन भ्रमण कर रहे थे। थकावट के कारण वे वशिष्ठ के आश्रम में ठहरे। वशिष्ठ कामधेनु नंदिनी की कृपा से अतिथि सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी। राजा ने जब नंदिनी की दिव्य शक्ति देखी तो लोभ जाग उठा। उन्होंने वशिष्ठ से नंदिनी मांगी, लेकिन वशिष्ठ ने मना कर दिया। क्रोधित विश्वामित्र ने बलपूर्वक नंदिनी को ले जाना चाहा। 

कामधेनु गाय नंदिनी ने हुंकार भरी और उसके रोम-कूपों से पह्लव, किरात, शक, यवन, कम्बोज जैसी बार्बर सेनाएं प्रकट हो गईं, जिन्होंने विश्वामित्र की सेना को तितर-बितर कर दिया। राजा पराजित हुए और अपमानित हुए। घोर तपस्या का संकल्प लिया। उन्होंने अपने पुत्रों को राज्य सौंपा और हिमालय की कंदराओं में चले गए।
Vishvamitra

तपस्या का प्रारंभ

हिमालय में विश्वामित्र ने घोर तप शुरू किया। हजारों वर्ष तक मौन, एक पांव पर खड़े रहना, अग्नि में तपना- कोई कष्ट नहीं छोड़ा। इन्द्र भयभीत हुए। उन्होंने मेनका को भेजा। मेनका ने घृताची, उर्वशी आदि अप्सराओं के साथ नृत्य किया। विश्वामित्र मोहित हुए। दस वर्ष तक मेनका के साथ रहे। शकुंतला का जन्म हुआ, लेकिन जब होश आया तो विश्वामित्र को अपनी भूल का पता चला। क्रोधित होकर मेनका को त्यागा और और कठोर तप में लग गए। 

इस बार उन्होंने दक्षिण भारत की पवित्र भूमि में तपस्या की। ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्हें "राजर्षि" की उपाधि दी, लेकिन विश्वामित्र को यह अपमानजनक लगा। वे ब्रह्मर्षि बनना चाहते थे।

विश्वामित्र ने रचा था नया स्वर्ग

इसी बीच उनके पास सौड़ही राजा त्रिशंकु आए, जो अपने शरीर सहित स्वर्ग जाना चाहते थे। विश्वामित्र ने यज्ञ रचा। देवता नहीं आए। विश्वामित्र ने अपनी तपोशक्ति से त्रिशंकु को आकाश में उठा दिया। इन्द्र ने उन्हें नीचे धकेल दिया। विश्वामित्र ने कहा- स्थिर रहो और त्रिशंकु आकाश में लटक गए- न स्वर्ग, न पृथ्वी। विश्वामित्र ने दक्षिण दिशा में नया स्वर्ग रचा, नए देवता बनाए। ब्रह्मा को हस्तक्षेप करना पड़ा। त्रिशंकु को नक्षत्र मंडल में स्थान मिला।

अम्बरीष और हरीश्चन्द्र कथा

राजा अम्बरीष के यज्ञ में विश्वामित्र इन्द्र को आहुति देने वाले ऋत्विज थे। इन्द्र ने हवि नहीं लिया। विश्वामित्र ने पशु मांगा। अम्बरीष के पास नहीं था। विश्वामित्र ने ऋचिक पुत्र शुन:शेफ को पशु बनाने को कहा, लेकिन शुन:शेफ ने विश्वामित्र के सौ पुत्रों को शाप दिया कि वे म्लेच्छ हो जाएं। विश्वामित्र ने शुन:शेफ को बचाया और इन्द्र से वरदान लिया।

फिर शुरू हुई हरीश्चन्द्र कथा। विश्वामित्र ने हरीश्चन्द्र से दक्षिणा में सब कुछ मांग लिया। हरीश्चन्द्र ने दिया। विश्वामित्र ने उन्हें श्मशान में भेजा। विश्वामित्र की परीक्षा इतनी कठोर थी कि हरीश्चन्द्र की पत्नी तारामती और पुत्र रोहिताश्व तक बेचे गए। अंत में विश्वामित्र ने सब लौटाया और हरीश्चन्द्र को स्वर्ग भेजा।
Vishvamitra

रामायण में विश्वामित्र की भूमिका

रामायण की मुख्य कथा में विश्वामित्र का प्रवेश बालकांड से होता है। यक्ष और राक्षस उनके यज्ञ में लगातार बाधा डाल रहे थे। ताड़का, सुबाहु और मारीच जैसे राक्षसों से तंग आकर वे अयोध्या पहुंचे और राजा दशरथ से मदद मांगी। दशरथ ने राम और लक्ष्मण को उनके साथ भेजा। वन मार्ग में विश्वामित्र ने राम को बाल और अतिबाल विद्या सिखाई, जिससे भूख-प्यास का असर नहीं होता। ताड़का वध के दौरान राम ने पहली बार अपनी शक्ति दिखाई और विश्वामित्र से दिव्य अस्त्र प्राप्त किए। सिद्धाश्रम में यज्ञ पूरा होने के बाद विश्वामित्र ने राम को ब्रह्मास्त्र, वैष्णवास्त्र जैसे महान हथियार दान किए। ये अस्त्र बाद में रावण वध में निर्णायक सिद्ध हुए।यज्ञ सफलता के बाद विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को मिथिला ले जाकर सीता स्वयंवर का मार्ग प्रशस्त किया। जनक की सभा में उन्होंने राम का परिचय कराया और शिवधनुष तोड़ने का अवसर दिलाया। राम ने धनुष भंग कर सीता से विवाह रचा। परशुराम के क्रोध को शांत करने में भी विश्वामित्र की भूमिका अहम रही। परशुराम ने राम को विष्णु अवतार मानकर अपना धनुष सौंप दिया।

वशिष्ठ से बैर और अंतिम सुलह

विश्वामित्र और वशिष्ठ का बैर अनादिकालीन था। विश्वामित्र के सौ पुत्रों को वशिष्ठ ने शाप दिया था, लेकिन रामायण के अंत में विश्वामित्र ने वशिष्ठ से सुलह की। उत्तरकांड में वशिष्ठ ने विश्वामित्र दोनों ने मिलकर यज्ञ किए। विश्वामित्र ने स्वीकार किया कि वशिष्ठ का तप उनसे श्रेष्ठ है।

गायत्री मंत्र की दृष्टि और ब्रह्मर्षि पद की प्राप्ति

एक दिन विश्वामित्र हिमालय में तप कर रहे थे। सूर्योदय के समय उन्हें दर्शन हुआ- गायत्री देवी प्रकट हुईं। उन्होंने गायत्री मंत्र की रचना की और मंत्र सुनाया- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ यह मंत्र सूर्य की ज्योति से ब्रह्मज्ञान तक ले जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव प्रकट हुए। उन्होंने विश्वामित्र को “ब्रह्मर्षि” घोषित किया। वशिष्ठ स्वयं आए और बोले- विश्वामित्र, अब तुम मेरे समकक्ष हो। विश्वामित्र ने कहा- मेरी तपस्या सफल हुई।

ब्रह्मर्षि बनने के बाद विश्वामित्र पृथ्वी पर भ्रमण करते रहे। राम के गुरु बने, भरत के अभिषेक में उपस्थित रहे। महाभारत में भी उनका उल्लेख है- वे द्रौपदी स्वयंवर में थे। अंत में हिमालय की कैलास श्रेणी में बदरिकाश्रम के निकट उन्होंने जल-समाधि ली। उनकी समाधि आज भी तपस्वियों को दर्शन देती है।

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(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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