Bhagavata Purana: सनातन धर्म के अनेक दिव्य स्तोत्रों और मंत्रों में नारायण कवच का विशेष स्थान माना गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कंध में वर्णित यह कवच भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त करने वाला दिव्य रक्षा कवच माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब देवताओं का बल क्षीण हो गया और असुरों के हाथों उन्हें बार-बार पराजय का सामना करना पड़ा, तब इसी नारायण कवच के प्रभाव से देवराज इंद्र ने पुनः अपनी शक्ति प्राप्त की और असुरों पर विजय हासिल की, लेकिन यह कवच केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक अत्यंत रोचक और विस्तृत पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं कि नारायण कवच की उत्पत्ति कैसे हुई और यह देवताओं तक कैसे पहुंचा।
देवताओं के गुरु बृहस्पति का अपमान
श्रीमद्भागवत के अनुसार एक समय देवराज इंद्र अपनी समृद्धि और ऐश्वर्य के कारण अत्यंत गर्वित हो गए थे। एक दिन देवसभा में सभी देवता विराजमान थे। उसी समय देवगुरु बृहस्पति वहां पहुंचे। गुरु को देखते ही सभी देवताओं को सम्मानपूर्वक उठकर उनका स्वागत करना चाहिए था, लेकिन इंद्र अपने अभिमान में इतने डूबे हुए थे कि वे अपने सिंहासन से नहीं उठे। उन्होंने गुरु का उचित सम्मान नहीं किया। देवगुरु बृहस्पति सब कुछ समझ गए। उन्होंने बिना कुछ कहे उसी समय वहां से प्रस्थान कर दिया। गुरु के चले जाने के बाद इंद्र को अपनी भूल का आभास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उन्होंने गुरु को खोजने का प्रयास किया, परंतु बृहस्पति योगबल से अदृश्य हो चुके थे।
असुरों ने देवताओं पर किया आक्रमण
जब असुरों को यह ज्ञात हुआ कि देवताओं के गुरु उनसे रुष्ट होकर चले गए हैं, तब उन्होंने इसे उचित अवसर समझा। दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में असुरों ने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया। गुरु की कृपा से वंचित हो चुके देवताओं की शक्ति क्षीण पड़ गई। युद्ध में असुरों का पलड़ा भारी होने लगा। अनेक देवता घायल हुए और अंततः उन्हें युद्धभूमि छोड़नी पड़ी। स्वर्गलोक पर भी संकट के बादल मंडराने लगे।
ब्रह्माजी के पास पहुंचे देवता
असुरों से पराजित होकर सभी देवता ब्रह्माजी के पास पहुंचे और अपनी पूरी स्थिति सुनाई। उन्होंने कहा कि गुरु बृहस्पति के बिना वे स्वयं को असहाय महसूस कर रहे हैं तथा असुरों का सामना नहीं कर पा रहे हैं। ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा कि उन्होंने अपने गुरु का अपमान करके बहुत बड़ी भूल की है। अब इस संकट से निकलने के लिए उन्हें त्वष्टा ऋषि के पुत्र विश्वरूप को अपना पुरोहित बनाना चाहिए। ब्रह्माजी ने बताया कि यद्यपि विश्वरूप की माता असुर कुल से थीं, फिर भी वे महान तपस्वी, विद्वान और भगवान विष्णु के परम भक्त हैं।
विश्वरूप बने देवताओं के पुरोहित
ब्रह्माजी की आज्ञा पाकर देवता विश्वरूप के आश्रम पहुंचे। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से उनसे देवताओं का पुरोहित बनने का आग्रह किया। प्रारंभ में विश्वरूप ने संकोच व्यक्त किया, क्योंकि वे जानते थे कि देवताओं और असुरों के बीच शत्रुता है और उनका मातृकुल असुरों से जुड़ा हुआ है। किन्तु देवताओं के बार-बार अनुरोध करने पर उन्होंने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया और यज्ञादि कर्म संपन्न कराने लगे। उन्होंने देवताओं को अनेक वैदिक विधियां बताईं तथा उनके कल्याण के लिए विशेष अनुष्ठान आरंभ किए।
विश्वरूप ने इंद्र को बताया नारायण कवच
जब देवताओं ने अपनी लगातार होती पराजय का कारण बताया, तब विश्वरूप ने कहा कि केवल शस्त्रबल से विजय संभव नहीं है। भगवान श्रीहरि की कृपा प्राप्त करना आवश्यक है। इसके बाद उन्होंने देवराज इंद्र को भगवान विष्णु का दिव्य नारायण कवच प्रदान किया। उन्होंने इसकी संपूर्ण विधि, मंत्रों का क्रम, अंगन्यास, करन्यास तथा भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करते हुए शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा की प्रार्थना करने की प्रक्रिया बताई। विश्वरूप ने कहा कि जो साधक पूर्ण श्रद्धा और शास्त्रोक्त विधि से इस कवच का धारण करता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान नारायण करते हैं।
नारायण कवच का दिव्य स्वरूप
पौराणिक वर्णन के अनुसार नारायण कवच में भगवान विष्णु के अनेक स्वरूपों का आवाहन किया जाता है। इसमें साधक भगवान के विभिन्न अवतारों और दिव्य रूपों से अपने शरीर के अलग-अलग अंगों की रक्षा की प्रार्थना करता है। इस कवच में श्रीहरि के मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा अन्य दिव्य स्वरूपों का भी स्मरण किया जाता है। साथ ही भगवान के सुदर्शन चक्र, कौमोदकी गदा, शारंग धनुष, पांचजन्य शंख और नंदक तलवार सहित उनके दिव्य आयुधों की भी रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। यह संपूर्ण कवच भगवान विष्णु की सर्वव्यापक शक्ति का आवाहन माना गया है।
इंद्र ने किया नारायण कवच का धारण
विश्वरूप से यह दिव्य कवच प्राप्त करने के बाद देवराज इंद्र ने पूरी श्रद्धा के साथ इसका जप किया और विधिपूर्वक इसे धारण किया। भगवान विष्णु की कृपा से उनका आत्मबल, तेज और पराक्रम पुनः जागृत हो गया। इसके बाद जब पुनः देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ, तब इंद्र पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली दिखाई दिए। देवताओं का उत्साह भी लौट आया। भगवान श्रीहरि की कृपा और नारायण कवच के प्रभाव से देवताओं ने युद्ध में विजय प्राप्त की तथा स्वर्गलोक पर अपना अधिकार पुनः स्थापित कर लिया।
विश्वरूप का गुप्त आचरण
विश्वरूप देवताओं के पुरोहित थे, लेकिन उनकी माता असुर कुल से थीं। इसी कारण वे यज्ञ में देवताओं के लिए आहुति देने के साथ-साथ गुप्त रूप से अपने मातृकुल के असुरों के लिए भी भाग अर्पित करने लगे। कुछ समय बाद देवराज इंद्र को इस बात का पता चल गया। उन्होंने इसे देवताओं के साथ विश्वासघात माना। क्रोध में आकर इंद्र ने अपने वज्र से विश्वरूप के तीनों सिर काट दिए। पौराणिक ग्रंथों में वर्णन है कि विश्वरूप के तीन मुख थे। एक मुख से वे सोमरस ग्रहण करते थे, दूसरे से सुरा और तीसरे से अन्न का सेवन करते थे। उनके तीनों सिर कटने के बाद उनसे अलग-अलग पक्षियों की उत्पत्ति हुई।
त्वष्टा का क्रोध और वृत्रासुर की उत्पत्ति