Bhagavad Gita: भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवंत का युद्ध सनातन परंपरा की उन प्रसिद्ध पौराणिक घटनाओं में से एक है, जिसका उल्लेख मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में मिलता है। यह युद्ध किसी राज्य, धन-संपत्ति या अहंकार के कारण नहीं हुआ था, बल्कि इसके पीछे स्यमंतक मणि से जुड़ा एक ऐसा घटनाक्रम था, जिसने भगवान श्रीकृष्ण पर चोरी का आरोप तक लगवा दिया। अपनी निष्कलंक प्रतिष्ठा सिद्ध करने के लिए श्रीकृष्ण स्वयं उस मणि की खोज में निकले और इसी खोज ने उन्हें जाम्बवंत की गुफा तक पहुंचा दिया। इसके बाद दोनों के बीच कई दिनों तक भीषण युद्ध हुआ। अंत में जब जाम्बवंत को यह ज्ञात हुआ कि जिनसे वे युद्ध कर रहे हैं, वे कोई साधारण पुरुष नहीं बल्कि त्रेतायुग के श्रीराम ही द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं, तब उन्होंने युद्ध रोक दिया और स्यमंतक मणि भगवान को सौंप दी।
क्या थी स्यमंतक मणि?
पुराणों के अनुसार स्यमंतक मणि अत्यंत दिव्य रत्न थी। यह मणि सूर्यदेव के पास रहती थी और उसके तेज के समान ही चमकती थी। कहा जाता है कि जहां यह मणि धर्मपूर्वक स्थापित रहती थी, वहां अकाल, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं का भय नहीं रहता था। साथ ही यह प्रतिदिन बड़ी मात्रा में स्वर्ण उत्पन्न करने की क्षमता भी रखती थी। यदुवंशी राजा सत्राजित भगवान सूर्य के परम उपासक थे। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें स्यमंतक मणि प्रदान की। जब सत्राजित उस मणि को धारण कर द्वारका पहुंचे, तब उसका तेज इतना प्रबल था कि लोगों ने उन्हें स्वयं सूर्यदेव समझ लिया। बाद में जब लोगों को वास्तविकता का पता चला, तब सभी उस दिव्य मणि के वैभव से चकित रह गए।
श्रीकृष्ण ने क्यों मांगी थी स्यमंतक मणि?
जब श्रीकृष्ण को स्यमंतक मणि के बारे में ज्ञात हुआ, तब उन्होंने सत्राजित से कहा कि इतनी दिव्य और लोककल्याणकारी मणि का उपयोग पूरे राज्य के हित में होना चाहिए। इसलिए उसे द्वारका के राजा उग्रसेन को सौंप देना उचित होगा, लेकिन सत्राजित को यह भय था कि कहीं मणि उससे छीन न ली जाए। इसी कारण उसने श्रीकृष्ण की बात नहीं मानी और मणि अपने पास ही रखी। यही निर्णय आगे चलकर अनेक घटनाओं का कारण बना।
प्रसेन के साथ घटी अनहोनी
कुछ समय बाद सत्राजित का भाई प्रसेन स्यमंतक मणि धारण कर शिकार खेलने वन में गया। जंगल में एक सिंह ने उस पर हमला कर दिया और उसे मार डाला। सिंह मणि लेकर आगे बढ़ गया। उसी वन में जाम्बवंत भी रहते थे। उन्होंने उस सिंह को मार गिराया और उसके पास से स्यमंतक मणि उठा ली। जाम्बवंत को उस मणि के महत्व का ज्ञान नहीं था। उन्होंने उसे अपनी गुफा में ले जाकर अपने छोटे पुत्र को खेलने के लिए दे दिया। उधर जब प्रसेन वापस नहीं लौटा, तब पूरे राज्य में उसकी खोज शुरू हुई। कुछ लोगों ने यह अफवाह फैला दी कि श्रीकृष्ण ने ही स्यमंतक मणि प्राप्त करने के लिए प्रसेन की हत्या कर दी है।
श्रीकृष्ण पर लगा चोरी और हत्या का आरोप
प्रसेन के लापता होने के बाद सत्राजित ने द्वारका में यह चर्चा फैला दी कि श्रीकृष्ण ने स्यमंतक मणि पाने के लिए प्रसेन की हत्या कर दी है। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि यदि इस आरोप का निवारण नहीं किया गया, तो असत्य लोगों के मन में स्थायी हो जाएगा, इसलिए उन्होंने स्वयं सत्य का पता लगाने का निश्चय किया। वे अनेक यदुवंशियों को साथ लेकर उसी वन में पहुंचे, जहां प्रसेन आखिरी बार गया था।
वन में कैसे मिला घटनाक्रम का सुराग?
श्रीकृष्ण ने जंगल में पहुंचकर सबसे पहले प्रसेन का शव देखा। वहां सिंह के पैरों के निशान भी दिखाई दिए। कुछ दूरी पर सिंह का मृत शरीर पड़ा मिला। अब वहां से किसी विशाल भालू जैसे प्राणी के पदचिह्न आगे जा रहे थे। उन पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्रीकृष्ण एक विशाल गुफा के द्वार तक पहुंचे। उन्होंने अपने साथ आए लोगों को बाहर ही रुकने के लिए कहा और स्वयं अकेले गुफा के भीतर प्रवेश कर गए।
गुफा में स्यमंतक मणि के साथ खेल रहा था बालक
गुफा के भीतर प्रवेश करने पर श्रीकृष्ण ने देखा कि एक बालक अत्यंत तेजस्वी स्यमंतक मणि से खेल रहा है। वह बालक जाम्बवंत का पुत्र था। जब वहां उपस्थित धाय ने किसी अपरिचित पुरुष को देखा, तो उसने जोर से पुकार लगाई। उसकी आवाज सुनकर जाम्बवंत तत्काल वहां पहुंच गए। उन्होंने श्रीकृष्ण को अपनी गुफा में देखकर उन्हें सामान्य मनुष्य समझा और बिना कोई परिचय पूछे युद्ध के लिए तैयार हो गए।
श्रीकृष्ण और जाम्बवंत के बीच क्यों हुआ युद्ध?
जाम्बवंत को यह ज्ञात नहीं था कि उनके सामने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण खड़े हैं। दूसरी ओर श्रीकृष्ण स्यमंतक मणि वापस लेने आए थे, ताकि उन पर लगे झूठे आरोप का अंत हो सके। जब श्रीकृष्ण ने मणि लौटाने का आग्रह किया, तब जाम्बवंत ने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने यह मान लिया कि कोई योद्धा उनकी गुफा से वस्तु छीनने आया है। इसी कारण दोनों के बीच भीषण युद्ध आरंभ हो गया। यह युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्रों तक सीमित नहीं था। पुराणों के अनुसार दोनों ने गदा, तलवार, वृक्ष, पर्वतखंड और अंत में बाहुबल से भी युद्ध किया। युद्ध की तीव्रता इतनी अधिक थी कि पूरी गुफा और उसके आसपास का क्षेत्र कांप उठा।
लगातार 28 दिनों तक चला भीषण संग्राम
श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है कि श्रीकृष्ण और जाम्बवंत के बीच यह युद्ध लगातार 28 दिनों तक चलता रहा। दोनों अतुलनीय पराक्रमी थे। जाम्बवंत त्रेतायुग से जीवित थे और उन्होंने भगवान श्रीराम के साथ लंका विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बल और अनुभव का कोई साधारण योद्धा सामना नहीं कर सकता था। किन्तु समय बीतने के साथ जाम्बवंत के शरीर में थकान और पीड़ा बढ़ने लगी। श्रीकृष्ण का तेज और पराक्रम निरंतर बढ़ता ही दिखाई दे रहा था। तब जाम्बवंत के मन में आश्चर्य उत्पन्न हुआ कि ऐसा कौन पुरुष है, जिसे वे इतने लंबे युद्ध के बाद भी पराजित नहीं कर पा रहे हैं।
जाम्बवंत को कैसे हुआ श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान?
युद्ध के अंतिम चरण में जब श्रीकृष्ण के प्रहारों से जाम्बवंत अत्यंत थक गए, तब उन्होंने गहन विचार किया। उन्हें स्मरण आया कि ऐसा अद्भुत बल उन्होंने केवल त्रेतायुग में भगवान श्रीराम में देखा था। उन्होंने ध्यानपूर्वक श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का अवलोकन किया और तत्काल समझ गए कि ये कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। ये वही श्रीराम हैं, जिन्होंने द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया है। यह पहचान होते ही जाम्बवंत ने युद्ध रोक दिया। वे श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और क्षमा याचना करने लगे। उन्होंने कहा कि अज्ञानवश वे अपने ही आराध्य प्रभु से युद्ध करते रहे।
जाम्बवंत ने श्रीकृष्ण को सौंपी स्यमंतक मणि
जाम्बवंत ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक स्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को समर्पित कर दी। साथ ही उन्होंने अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह भी भगवान श्रीकृष्ण से करने का निवेदन किया। भगवान श्रीकृष्ण ने जाम्बवंत का सम्मानपूर्वक प्रस्ताव स्वीकार किया। इसके बाद जाम्बवती श्रीकृष्ण की प्रमुख रानियों में सम्मिलित हुईं।
द्वारका लौटकर कैसे समाप्त हुआ विवाद?