Vishnu Purana: सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में वर्णित राजा महाबलि की कथा दान, पराक्रम, तप और भगवान विष्णु की लीला का अद्भुत संगम मानी जाती है। राजा बलि का नाम उन महान दानवीरों में लिया जाता है, जिन्होंने अपने वचन की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण राज्य ही नहीं, बल्कि स्वयं को भी भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। यही कारण है कि भगवान विष्णु ने उन्हें दंड देने के बजाय सुतल लोक जैसा दिव्य लोक प्रदान किया और स्वयं उनके द्वारपाल बनकर उनकी रक्षा का वचन दिया।
विष्णु पुराण, भागवत पुराण और वामन पुराण में वर्णित इस कथा के अनुसार, राजा बलि का सुतल लोक प्राप्त करना केवल एक वरदान नहीं था, बल्कि भगवान विष्णु द्वारा उनके सत्य, दानशीलता और अटूट वचनपालन का सम्मान भी था। आइए जानते हैं कि आखिर राजा बलि को सुतल लोक क्यों मिला
राजा बलि कौन थे?
राजा बलि दैत्यराज विरोचन के पुत्र और भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे। प्रह्लाद की भक्ति और धार्मिक संस्कारों का प्रभाव राजा बलि पर भी पड़ा था। यद्यपि वे असुर कुल में जन्मे थे, लेकिन सत्य, दान और धर्म का पालन करने वाले महान शासक माने जाते थे। समय के साथ राजा बलि ने अपनी वीरता और युद्ध कौशल के बल पर विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया। उन्होंने अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की और तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। देवराज इंद्र सहित अनेक देवताओं को स्वर्ग छोड़ना पड़ा। इससे देवगण अत्यंत चिंतित हो गए और भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे।
देवताओं की प्रार्थना और भगवान विष्णु का निर्णय
जब देवताओं ने भगवान विष्णु से अपनी व्यथा कही, तब भगवान ने उन्हें आश्वस्त किया कि उचित समय आने पर वे धर्म की स्थापना करेंगे। उसी समय राजा बलि अपने गुरु शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में अनेक यज्ञ कर रहे थे। उनका तेज और प्रभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। भगवान विष्णु जानते थे कि बलि अधर्मी नहीं हैं, बल्कि दानी और वचन के पक्के राजा हैं। इसलिए उनका वध करना उचित नहीं था, तब भगवान ने एक ऐसी लीला रचने का निर्णय लिया, जिससे देवताओं को उनका स्थान भी मिल जाए और राजा बलि की महिमा भी अक्षुण्ण रहे।
अदिति का व्रत और वामन अवतार
देवमाता अदिति अपने पुत्रों की स्थिति से अत्यंत दुखी थीं। उन्होंने अपने पति महर्षि कश्यप के निर्देश पर भगवान विष्णु की आराधना की और पयोव्रत का पालन किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में अवतार लेने का वचन दिया। समय आने पर भगवान ने अदिति के गर्भ से वामन अवतार धारण किया। भगवान वामन का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी था। वे बटुक ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। उनके हाथ में दंड, कमंडल, छत्र और यज्ञोपवीत सुशोभित थे। देवताओं और ऋषियों ने उनका विधिवत स्वागत किया।
राजा बलि का अश्वमेध यज्ञ
उधर राजा बलि अपने साम्राज्य की समृद्धि और यश के लिए विशाल अश्वमेध यज्ञ का आयोजन कर रहे थे। यज्ञ में ऋषि, मुनि, ब्राह्मण और अनेक विद्वान उपस्थित थे। राजा बलि ने घोषणा कर रखी थी कि जो भी याचक उनकी सभा में आएगा, उसे इच्छानुसार दान दिया जाएगा। इसी समय भगवान वामन ब्राह्मण बालक के रूप में यज्ञशाला पहुंचे। राजा बलि ने उनका अत्यंत आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उनके चरण धोए, आसन दिया और विनम्रतापूर्वक पूछा कि वे क्या चाहते हैं।
भगवान वामन ने मांगे केवल तीन पग भूमि
राजा बलि ने भगवान वामन से कहा कि वे जो चाहें मांग लें। सोना, रत्न, हाथी, घोड़े, गांव, नगर या पूरा राज्य- जो भी चाहिए, वे देने को तैयार हैं, तब भगवान वामन ने कहा कि उन्हें केवल तीन पग भूमि चाहिए। राजा बलि को यह मांग अत्यंत छोटी लगी। उन्होंने मुस्कराकर कहा कि इतनी सी भूमि मांगकर आप अपने लिए अन्याय कर रहे हैं। वे चाहें तो कहीं अधिक मांग सकते हैं, लेकिन भगवान वामन अपने निर्णय पर अडिग रहे। उन्होंने केवल तीन पग भूमि ही मांगी।
शुक्राचार्य ने क्यों रोका?
जब राजा बलि संकल्प लेने लगे, तब उनके गुरु शुक्राचार्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से पहचान लिया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं। उन्होंने राजा बलि को समझाया कि यदि वे यह दान दे देंगे तो उनका समस्त राज्य चला जाएगा। उन्होंने दान देने से मना किया, लेकिन राजा बलि ने उत्तर दिया कि एक बार जब वे किसी याचक को दान देने का वचन दे चुके हैं, तब उससे पीछे हटना उनके लिए संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि स्वयं भगवान विष्णु याचक बनकर आए हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है। इसके बाद उन्होंने जल लेकर तीन पग भूमि दान करने का संकल्प पूरा कर दिया।
वामन का विराट स्वरूप
जैसे ही राजा बलि ने दान का संकल्प पूरा किया, भगवान वामन का स्वरूप विराट होने लगा। उनका शरीर इतना विशाल हो गया कि उन्होंने एक ही पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया। दूसरे पग में समस्त स्वर्ग और आकाश को अपने चरणों में समेट लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा। भगवान विष्णु ने राजा बलि से पूछा कि तीसरा पग कहां रखें, क्योंकि उन्होंने तीन पग भूमि देने का वचन दिया था।
राजा बलि ने अर्पित किया अपना सिर
राजा बलि ने बिना किसी भय या संकोच के अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि अब उनके पास देने के लिए कुछ भी शेष नहीं है। इसलिए भगवान तीसरा चरण उनके सिर पर रख दें। यह सुनकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। राजा बलि ने अपना सिर झुका दिया और भगवान ने तीसरा चरण उनके मस्तक पर रखा। उसी क्षण राजा बलि का समर्पण पूर्ण हो गया।
राजा बलि को क्यों मिला सुतल लोक?
भगवान विष्णु ने देखा कि राजा बलि ने अपना सब कुछ खो देने के बाद भी अपने वचन का त्याग नहीं किया। उन्होंने गुरु की आज्ञा के विपरीत जाकर भी सत्य और दान का पालन किया। उनकी इसी निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें सुतल लोक प्रदान किया। विष्णु पुराण में वर्णन मिलता है कि सुतल लोक अत्यंत दिव्य, वैभवशाली और सुख-संपन्न लोक है। वहां किसी प्रकार का अभाव, भय या दुख नहीं है। भगवान ने स्वयं कहा कि यह लोक देवताओं के स्वर्ग से भी अनेक प्रकार से श्रेष्ठ होगा। राजा बलि को वहां स्वतंत्र रूप से राज्य करने का अधिकार दिया गया।
भगवान विष्णु बने द्वारपाल