विज्ञापन
Home  mythology  vishnu purana narada muni ko kyon mila vanar mukhi hone ka shrap pauranik katha se janiye iska rahasya

Vishnu Purana: नारद मुनि को क्यों मिला वानर मुखी होने का श्राप? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Vishnu Purana: पौराणिक कथा के अनुसार एक समय देवर्षि नारद हिमालय की एक पवित्र गुफा में बैठकर भगवान विष्णु का कठोर तप करने लगे। उनका मन पूर्णतः भगवान के ध्यान में लीन था।

Vishnu Purana
Vishnu Purana: सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में नारद मुनि का विशेष स्थान माना गया है। उन्हें देवर्षि की उपाधि प्राप्त है और वे तीनों लोकों में विचरण करते हुए भगवान विष्णु के परम भक्त तथा उनके नाम का प्रचार करने वाले ऋषि माने जाते हैं, लेकिन पौराणिक कथाओं में एक ऐसा प्रसंग भी आता है, जब स्वयं भगवान विष्णु की लीला के कारण नारद मुनि को वानर मुखी होने का श्राप मिला और उन्होंने क्रोध में भगवान विष्णु को भी श्राप दे दिया। यह कथा विष्णु पुराण, शिव पुराण तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में वर्णित प्रसंगों से जुड़ी मानी जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर नारद मुनि के साथ ऐसा क्या हुआ था और यह पूरी कथा क्या है।

नारद मुनि का तप और इंद्र की चिंता

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय देवर्षि नारद हिमालय की एक पवित्र गुफा में बैठकर भगवान विष्णु का कठोर तप करने लगे। उनका मन पूर्णतः भगवान के ध्यान में लीन था। वर्षों तक उन्होंने एकाग्रचित्त होकर साधना की। जब देवराज इंद्र को इसका समाचार मिला तो उन्हें चिंता हुई कि कहीं नारद मुनि उनके स्वर्गलोक या इंद्रपद की कामना से तप तो नहीं कर रहे हैं। इंद्र को कई बार पहले भी ऋषियों के तप से अपना सिंहासन डोलता हुआ प्रतीत हुआ था। इसी भय के कारण उन्होंने कामदेव को नारद मुनि की तपस्या भंग करने का आदेश दिया।

कामदेव का प्रयास हुआ विफल

इंद्र की आज्ञा पाकर कामदेव अपने साथ वसंत ऋतु, अप्सराओं और सुगंधित पवन को लेकर उस स्थान पर पहुंचे जहां नारद मुनि तप कर रहे थे। चारों ओर पुष्पों की वर्षा होने लगी, मधुर संगीत गूंजने लगा और अप्सराएं नृत्य करने लगीं, लेकिन नारद मुनि का मन भगवान विष्णु के ध्यान में इतना स्थिर था कि इन सबका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कामदेव के सभी प्रयास असफल हो गए और अंततः उन्हें पराजित होकर लौटना पड़ा।

 

narad Muni

तप की सफलता के बाद उत्पन्न हुआ अहंकार

तपस्या पूर्ण होने के बाद नारद मुनि को इस बात का गर्व हो गया कि उन्होंने कामदेव जैसे देवता को भी पराजित कर दिया। धीरे-धीरे उनके मन में यह भाव आने लगा कि संसार में अब कोई भी उन्हें मोह या माया में नहीं फंसा सकता। सबसे पहले वे कैलाश पहुंचे और भगवान शिव को अपनी विजय का वृत्तांत सुनाया। भगवान शिव ने उनकी बात ध्यान से सुनी और मुस्कुराते हुए कहा कि इस घटना का वर्णन भगवान विष्णु के सामने न करें, क्योंकि अहंकार साधक के लिए उचित नहीं होता, लेकिन नारद मुनि उस समय अपने गौरव में इतने मग्न थे कि उन्होंने भगवान शिव की इस बात को गंभीरता से नहीं लिया।

भगवान विष्णु के सामने किया अपनी विजय का वर्णन

इसके बाद नारद मुनि वैकुंठ पहुंचे और भगवान विष्णु के सामने भी अपनी तपस्या तथा कामदेव पर विजय का विस्तार से वर्णन किया। भगवान विष्णु सब समझ रहे थे कि नारद के मन में सूक्ष्म अहंकार प्रवेश कर चुका है। भगवान विष्णु अपने भक्त का अहंकार दूर करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपनी योगमाया से एक अद्भुत लीला रचने का निश्चय किया।

भगवान विष्णु ने रची मायानगरी

कुछ समय बाद नारद मुनि यात्रा करते हुए एक ऐसे नगर में पहुंचे, जो वास्तव में भगवान विष्णु की योगमाया से निर्मित था। वह नगर अत्यंत भव्य और सुंदर था। वहां के राजा का नाम शीलनिधि बताया गया है। राजा की एक अत्यंत रूपवती और गुणवान पुत्री थी, जिसका नाम विश्वमोहिनी था। उसके स्वयंवर की तैयारियां चल रही थीं। अनेक राजा और राजकुमार वहां पहुंच चुके थे। जब नारद मुनि ने राजकुमारी को देखा तो पहली बार उनका मन उसके सौंदर्य की ओर आकर्षित हो गया। वे सोचने लगे कि यदि यह राजकुमारी उनसे विवाह कर ले तो अत्यंत शुभ होगा।

भगवान विष्णु से मांगा अपना रूप

राजकुमारी का स्वयंवर निकट था। नारद मुनि ने सोचा कि यदि वे अत्यंत सुंदर रूप धारण कर लें तो राजकुमारी निश्चित रूप से उनका वरण करेगी। वे तुरंत भगवान विष्णु के पास पहुंचे और प्रार्थना की कि उन्हें अपना दिव्य और मनोहर स्वरूप प्रदान करें, ताकि स्वयंवर में वे सबसे अधिक आकर्षक दिखाई दें। भगवान विष्णु ने मुस्कुराकर कहा कि वे वही करेंगे, जो उनके हित में होगा। नारद मुनि ने इसे अपनी इच्छा की स्वीकृति समझ लिया।

 

narad Muni

वानर मुखी हो गए नारद मुनि

भगवान विष्णु ने अपनी लीला के अनुसार नारद मुनि के पूरे शरीर को अत्यंत तेजस्वी और आकर्षक बना दिया, लेकिन उनका मुख वानर जैसा कर दिया। यह परिवर्तन केवल अन्य लोगों को दिखाई देता था। नारद मुनि स्वयं अपने मुख को नहीं देख सके और उन्हें विश्वास था कि वे भगवान विष्णु के समान सुंदर दिखाई दे रहे हैं। उधर भगवान विष्णु स्वयं एक राजकुमार का रूप धारण करके स्वयंवर सभा में पहुंच गए।

स्वयंवर सभा में हुआ उपहास

स्वयंवर सभा में अनेक राजा और वीर उपस्थित थे। नारद मुनि भी बड़े आत्मविश्वास के साथ वहां बैठे, लेकिन सभा में उपस्थित लोग उनके वानर मुख को देखकर मुस्कुराने लगे। कुछ लोग उनका उपहास भी करने लगे। नारद मुनि को इसका कारण समझ में नहीं आया। जब राजकुमारी विश्वमोहिनी वरमाला लेकर सभा में आई तो उसने सभी राजाओं को देखा और अंत में भगवान विष्णु के राजकुमार रूप को अपना पति चुन लिया। उसने उन्हीं के गले में वरमाला डाल दी। नारद मुनि आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा कैसे हो गया।

शिवगणों ने बताया सच्चाई

कथा के अनुसार स्वयंवर समाप्त होने के बाद भगवान शिव के दो गण वहां पहुंचे। उन्होंने नारद मुनि से कहा कि पहले जल में अपना मुख तो देखिए। जब नारद मुनि ने जल में अपना प्रतिबिंब देखा तो वे चकित रह गए। उनका मुख वानर के समान दिखाई दे रहा था। तभी उन्हें समझ में आया कि सभा में लोग उनका उपहास क्यों कर रहे थे। उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि भगवान विष्णु ही राजकुमार का रूप धारण करके राजकुमारी का वरण कर चुके हैं।

क्रोधित होकर नारद मुनि ने दिया श्राप

यह सब जानकर नारद मुनि अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्हें लगा कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया है। क्रोधावेश में उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप देते हुए कहा कि जिस प्रकार उन्होंने उन्हें स्त्री-वियोग का दुख दिया है, उसी प्रकार उन्हें भी मनुष्य रूप में जन्म लेकर पत्नी-वियोग का कष्ट सहना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जिस वानर रूप का उपहास बनाकर उन्हें अपमानित किया गया, उसी वानर जाति की सहायता लेकर भगवान विष्णु को अपना कार्य पूरा करना पड़ेगा। भगवान विष्णु ने शांत भाव से नारद मुनि का श्राप स्वीकार कर लिया।

भगवान विष्णु ने बताया अपनी लीला का रहस्य

श्राप देने के कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया हटा ली। पूरा मायानगर, राजा, राजकुमारी और स्वयंवर का दृश्य लुप्त हो गया, तब भगवान विष्णु ने नारद मुनि को बताया कि यह सब उनके अहंकार को दूर करने के लिए रची गई लीला थी। कामदेव पर विजय के बाद उनके मन में सूक्ष्म अभिमान उत्पन्न हो गया था और उसी का निवारण करने के लिए यह घटना घटित हुई। भगवान विष्णु के वचन सुनकर नारद मुनि का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और भगवान से क्षमा याचना की।

श्रीराम अवतार में पूर्ण हुआ श्राप

पौराणिक मान्यता के अनुसार नारद मुनि द्वारा दिया गया यही श्राप आगे चलकर भगवान विष्णु के श्रीराम अवतार में फलित हुआ। जब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में जन्म लिया, तब माता सीता का रावण द्वारा हरण हुआ और भगवान श्रीराम को पत्नी-वियोग का दुख सहना पड़ा। बाद में सीता की खोज तथा रावण-वध के लिए उन्हें वानर सेना की सहायता लेनी पड़ी। सुग्रीव, हनुमान, नल, नील, अंगद तथा अन्य वानर वीरों ने इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार नारद मुनि का श्राप भी भगवान की लीला का एक अंग बन गया और श्रीरामावतार में उसकी पूर्णता हुई।


यह भी पढ़ें:- 

Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 

Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 

Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel