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Vishnu Purana: मधु और कैटभ का वध कैसे हुआ? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Vishnu Purana: पौराणिक कथा के अनुसार कल्प के अंत में जब प्रलय आई, तब संपूर्ण ब्रह्मांड जल में डूब गया था। उस समय केवल क्षीरसागर विद्यमान था, जिसमें भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में विश्राम कर रहे थे। 

Vishnu Purana:
Vishnu Purana: सृष्टि के आरंभ से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाओं में मधु और कैटभ नामक दो असुरों की कथा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह प्रसंग मुख्य रूप से देवी भागवत, मार्कण्डेय पुराण तथा अन्य वैष्णव ग्रंथों में वर्णित मिलता है। इस कथा के अनुसार जब संपूर्ण ब्रह्मांड जलमग्न था और भगवान विष्णु योगनिद्रा में विश्राम कर रहे थे, तभी उनके कानों के मैल से दो महाबली असुरों का जन्म हुआ। इनका नाम मधु और कैटभ पड़ा। दोनों असुर अत्यंत पराक्रमी, तेजस्वी और अहंकारी थे। आगे चलकर उन्होंने स्वयं ब्रह्माजी के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया, तब भगवान विष्णु और आदिशक्ति की कृपा से उनका अंत हुआ। आइए जानते हैं कि मधु-कैटभ का वध कैसे हुआ और इसके पीछे की पूरी पौराणिक कथा क्या है।

सृष्टि के आरंभ में कैसे हुआ मधु और कैटभ का जन्म?

पौराणिक कथा के अनुसार कल्प के अंत में जब प्रलय आई, तब संपूर्ण ब्रह्मांड जल में डूब गया था। उस समय केवल क्षीरसागर विद्यमान था, जिसमें भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में विश्राम कर रहे थे। भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जिस पर चार मुख वाले ब्रह्माजी विराजमान हुए।

ब्रह्माजी को सृष्टि की रचना का दायित्व मिला, किंतु उसी समय भगवान विष्णु के कानों के मैल से दो विशालकाय असुर उत्पन्न हुए। इन दोनों का शरीर पर्वत के समान विशाल और बल अपार था। उनका नाम मधु और कैटभ रखा गया। जन्म लेते ही दोनों असुरों ने चारों ओर दृष्टि डाली। उन्होंने ब्रह्माजी को कमल पर बैठे देखा और उनके विषय में जानने का प्रयास करने लगे।

आदिशक्ति की कृपा से प्राप्त किया महान वरदान

कथा के अनुसार मधु और कैटभ ने कठोर तपस्या आरंभ कर दी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति महामाया उनके सामने प्रकट हुईं। देवी ने उनसे वरदान मांगने के लिए कहा। दोनों असुरों ने देवी से इच्छा मृत्यु का वरदान मांगा। अर्थात उनका वध तभी हो सके, जब वे स्वयं अपनी मृत्यु की अनुमति दें। देवी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर यह वरदान प्रदान कर दिया। इस वरदान के कारण दोनों असुर अत्यंत अभिमानी हो गए। उन्हें विश्वास हो गया कि अब उन्हें कोई देवता, दानव या अन्य शक्ति पराजित नहीं कर सकती।

ब्रह्माजी पर मंडराया संकट

वरदान प्राप्त करने के बाद मधु और कैटभ का अहंकार और बढ़ गया। वे चारों ओर घूमते हुए उस कमल तक पहुंचे, जिस पर ब्रह्माजी विराजमान थे। उन्होंने ब्रह्माजी को चुनौती दी और युद्ध के लिए ललकारने लगे। ब्रह्माजी जानते थे कि दोनों असुर अत्यंत बलशाली हैं। उन्होंने भगवान विष्णु की ओर देखा, किंतु उस समय भगवान योगनिद्रा में लीन थे। ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु को जगाने का प्रयास किया, परंतु वे जागे नहीं, तब ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु की योगनिद्रा स्वरूपा महामाया की स्तुति आरंभ की। उन्होंने देवी से प्रार्थना की कि वे भगवान विष्णु को निद्रा से जागृत करें, जिससे वे इन असुरों से संसार की रक्षा कर सकें।

देवी महामाया ने भगवान विष्णु को जगाया

ब्रह्माजी की स्तुति से प्रसन्न होकर योगनिद्रा स्वरूपा महामाया भगवान विष्णु के शरीर से बाहर प्रकट हुईं। जैसे ही देवी उनके शरीर से अलग हुईं, भगवान विष्णु की निद्रा भंग हो गई। भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी से संकट का कारण पूछा, तब ब्रह्माजी ने मधु और कैटभ के उत्पन्न होने, उनके वरदान तथा अपने ऊपर आए संकट की पूरी कथा सुनाई। भगवान विष्णु ने तुरंत दोनों असुरों का सामना करने का निश्चय किया।

भगवान विष्णु और मधु-कैटभ के बीच हुआ भीषण युद्ध

भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों असुर अत्यंत प्रसन्न हुए, क्योंकि वे स्वयं युद्ध चाहते थे। इसके बाद भगवान विष्णु और दोनों असुरों के बीच भयंकर संग्राम आरंभ हुआ। यह युद्ध सामान्य नहीं था। पौराणिक वर्णनों के अनुसार यह युद्ध हजारों वर्षों तक चलता रहा। कभी भगवान विष्णु प्रबल दिखाई देते तो कभी मधु और कैटभ अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते। दोनों असुरों को देवी के वरदान का संरक्षण प्राप्त था। इसी कारण भगवान विष्णु भी उन्हें तुरंत पराजित नहीं कर पा रहे थे।

भगवान विष्णु ने समझा वरदान का रहस्य

दीर्घकाल तक युद्ध करने के बाद भगवान विष्णु समझ गए कि केवल बल प्रयोग से इन दोनों का अंत संभव नहीं है। उन्हें ज्ञात था कि इच्छा मृत्यु का वरदान मिलने के कारण जब तक दोनों स्वयं अपनी मृत्यु की अनुमति नहीं देंगे, तब तक उनका वध नहीं किया जा सकता, तब भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य माया का सहारा लिया। उन्होंने दोनों असुरों के भीतर गर्व और अहंकार को और बढ़ने दिया। लगातार युद्ध करते-करते मधु और कैटभ स्वयं अपने पराक्रम पर अत्यधिक गर्व करने लगे। उन्हें लगने लगा कि भगवान विष्णु भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

भगवान विष्णु ने मांगा वरदान

युद्ध के बीच भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ की वीरता की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि तुम दोनों महान योद्धा हो। मैं तुमसे प्रसन्न हूं, इसलिए तुम दोनों मुझे कोई वरदान दो। भगवान विष्णु की यह बात सुनकर दोनों असुर अपने अभिमान में आ गए। उन्हें लगा कि स्वयं भगवान विष्णु भी उनकी वीरता स्वीकार कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि आप जो चाहें, वर मांग सकते हैं। यही वह क्षण था जिसकी भगवान विष्णु प्रतीक्षा कर रहे थे।

भगवान विष्णु ने मांगा उनका वध करने का वर

भगवान विष्णु ने मुस्कराते हुए कहा कि यदि तुम वास्तव में मुझे वर देना चाहते हो, तो यही वर दो कि मैं तुम्हारा वध कर सकूं। भगवान विष्णु का यह वचन सुनकर मधु और कैटभ कुछ क्षण के लिए मौन रह गए। उन्हें अपनी भूल का आभास हुआ कि उन्होंने बिना सोचे-समझे वर देने का वचन दे दिया है। अब वे अपने वचन से पीछे नहीं हट सकते थे। फिर भी उन्होंने एक शर्त रखी।

असुरों ने रखी अंतिम शर्त

मधु और कैटभ ने भगवान विष्णु से कहा कि यदि आप हमारा वध करना चाहते हैं, तो ऐसी जगह करें जहां जल न हो, क्योंकि इस समय पूरा ब्रह्मांड जलमग्न है। दोनों असुरों को विश्वास था कि चारों ओर केवल जल ही जल है, इसलिए भगवान विष्णु उनके लिए ऐसा स्थान खोज ही नहीं पाएंगे। किन्तु भगवान विष्णु उनकी योजना समझ चुके थे।

भगवान विष्णु ने अपनी जंघा पर किया दोनों असुरों का वध

भगवान विष्णु ने तुरंत अपने विराट स्वरूप का विस्तार किया। उन्होंने मधु और कैटभ को उठाकर अपनी जंघाओं पर रख लिया। उनकी जंघाएं जल से ऊपर थीं, इसलिए वह स्थान जलरहित था। इसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से दोनों असुरों का मस्तक अलग कर दिया। इस प्रकार मधु और कैटभ का अंत हुआ। इस प्रकार देवी द्वारा दिए गए इच्छा मृत्यु के वरदान का उल्लंघन भी नहीं हुआ, क्योंकि दोनों स्वयं भगवान विष्णु को वर दे चुके थे, और उनकी अंतिम शर्त का पालन भी किया गया, क्योंकि उनका वध जल से ऊपर भगवान विष्णु की जंघाओं पर हुआ।

मधु-कैटभ के वध के बाद क्या हुआ?

पौराणिक वर्णनों के अनुसार दोनों असुरों के शरीर अत्यंत विशाल थे। उनके शरीर से निकले मेद से पृथ्वी के स्थूल स्वरूप की उत्पत्ति का उल्लेख कुछ पुराणों में मिलता है। इसी कारण पृथ्वी के लिए "मेदिनी" नाम का भी प्रयोग किया जाता है। मधु और कैटभ के वध के बाद ब्रह्माजी का संकट समाप्त हुआ। अब वे बिना किसी बाधा के सृष्टि की रचना का कार्य आरंभ कर सके। भगवान विष्णु पुनः सृष्टि के पालन के अपने दायित्व में स्थित हुए और ब्रह्मांड की सृजन प्रक्रिया आगे बढ़ी।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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