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Lord Shiva: नीलकंठ कैसे बने भगवान शिव, जानें समुद्र मंथन की अद्भुत कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी साह
सार

Lord Shiva Story: समुद्र मंथन से सबसे पहले हलाहल यानी कालकूट विष निकला। यह विष इतना भयंकर था कि इसकी ज्वालाएं आकाश छू रही थीं, गंध से जीव मर रहे थे, तीनों लोक जलने लगे। देव-असुर सभी भयभीत हो गए।

Lord Shiva Mythological Story
Lord Shiva Mythological Story: भगवान शिव को देवों के देव महादेव भी कहा जाता है और भोलेनाथ कहकर भी पुकारा जाता है। भगवान शिव के कई नाम है, जो उनके कई रूपों और अवतारों से जुड़ा हुआ है। इनमें से ही एक नाम है- नीलकंठ, जो उनके नीले गले से जुड़ा है। यह नाम महान त्याग और करुणा की कथा सुनाता है, जो समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा हुआ है। समुद्र मंथन की कथा, जो भगवान विष्णु के कूर्म अवतार से जुड़ी है, देवताओं और असुरों के बीच अमरत्व की खोज की अद्भुत गाथा है। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर भगवान शिव को क्यों कहा जाता है नीलकंठ और क्या है इस नाम के पीछे का रहस्य...

अमरत्व की खोज में समुद्र मंथन

हिंदू पुराणों के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभिक काल में देवता और असुर दोनों ही अमरत्व की तलाश में थे। देवताओं का नेतृत्व इंद्र करते थे, जबकि असुरों का राजा बलि था। एक बार, देवराज इंद्र को दुर्वासा ऋषि के शाप से कमजोर हो जाना पड़ा। दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को एक माला भेंट की थी, लेकिन इंद्र के ऐरावत हाथी ने उसे पैरों तले रौंद दिया। क्रोधित होकर दुर्वासा ने देवताओं को शाप दिया कि वे अपनी शक्ति खो देंगे। फलस्वरूप, असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें पराजित कर दिया। देवता अपनी शक्ति और अमरत्व खोकर भयभीत हो गए।

इस संकट से मुक्ति पाने के लिए देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें सलाह दी कि वे असुरों के साथ मिलकर क्षीर सागर यानी दूध के समुद्र का मंथन करें। इस मंथन से अमृत यानी अमरत्व का रस निकलेगा, जो देवताओं को फिर से शक्तिशाली बना देगा। लेकिन विष्णु जी ने चेतावनी दी कि मंथन के दौरान कई दिव्य और खतरनाक वस्तुएं निकलेंगी, जिन्हें संभालना होगा। देवताओं ने असुरों से समझौता किया। असुरों ने सहमति दी, क्योंकि वे भी अमृत चाहते थे, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि मंथन का कार्य वे करेंगे और अमृत का बंटवारा बाद में होगा। इस प्रकार, देव-असुर गठबंधन बना।

 

LORD SHIV

मंदराचल और वासुकि की भूमिका

समुद्र मंथन के लिए एक विशाल मथानी और रस्सी की आवश्यकता थी। देवताओं और असुरों ने मंदराचल पर्वत को मथानी के रूप में चुना, जो अत्यंत विशाल और मजबूत था, लेकिन पर्वत को उठाना असंभव था, तब भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लिया और समुद्र के तल पर जाकर पर्वत को अपनी पीठ पर टिका लिया। रस्सी के लिए नागराज वासुकि को चुना गया। वासुकि ने सहर्ष इस भूमिका को स्वीकार किया। देवताओं ने वासुकि की पूंछ की ओर से पकड़ा, जबकि असुरों ने फन की ओर से। यह व्यवस्था विष्णु जी की चतुराई थी, क्योंकि फन की ओर विष निकल सकता था, जो असुरों को प्रभावित करता। मंथन शुरू हुआ। जैसे-जैसे मंदराचल घूमता गया, समुद्र की लहरें उछलने लगीं। मंथन के दौरान वासुकि के फनों से विष की धुआं निकलने लगा, जो असुरों को परेशान करने लगा, लेकिन वे रुके नहीं। 

सबसे पहले निकला हलाहल विष

समुद्र मंथन से सबसे पहले हलाहल यानी कालकूट विष निकला। यह विष इतना भयंकर था कि इसकी ज्वालाएं आकाश छू रही थीं, गंध से जीव मर रहे थे, तीनों लोक जलने लगे। देव-असुर सभी भयभीत हो गए। विष को कहीं फेंका नहीं जा सकता था, क्योंकि यह पूरी सृष्टि नष्ट कर देता। पुराणों में स्पष्ट है कि विष सृष्टि के नकारात्मक तत्वों का प्रतीक है। अच्छाई से पहले बुराई निकलती है। ब्रह्मा और विष्णु ने भी इसे संभालने से इनकार कर दिया। सभी ने महादेव शिव की शरण ली।

 

Lord Shiva Mythological Story

शिव का विषपान

शिव कैलाश पर ध्यान में थे। देवताओं की पुकार सुनकर वे प्रकट हुए। करुणा से भरकर बोले: "मैं इसे ग्रहण करता हूं।" शिव ने विष को हथेली पर लिया, मुंह में डाला और गले में रोक लिया, निगला नहीं। देवी पार्वती ने उनके कंठ को पकड़कर विष को आगे जाने से रोका, ताकि पेट में न जाए, क्योंकि शिव के उदर में समस्त लोक हैं, विष नष्ट कर देता। विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया। इसी से उन्हें नीलकंठ नाम मिला। देवता-असुर सभी ने स्तुति की। शिव ने विष की जलन सहन की, ध्यान लगाया और सृष्टि बचाई। 

मंथन से निकली दिव्य वस्तुएं

समुद्र मंथन से एक-एक करके चौदह रत्न निकले, जो सृष्टि के लिए वरदान सिद्ध हुए। सबसे पहले कामधेनु गाय निकली, जो सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली थी। देवताओं ने उसे ऋषियों को सौंप दिया। फिर उच्चैश्रवा नामक सफेद घोड़ा निकला, जो असुर राजा बलि ने रख लिया। अगला रत्न था ऐरावत हाथी, जो चार दांतों वाला दिव्य हाथी था और इंद्र ने उसे अपना वाहन बनाया।

फिर कौस्तुभ मणि निकली, जो चमकदार रत्न था और भगवान विष्णु ने उसे अपने गले में धारण किया। इसके बाद पारिजात वृक्ष निकला, जो स्वर्ग में लगा और हमेशा फूलों से लदा रहता है। अप्सराएं निकलीं, जो नृत्य और संगीत की देवियां थीं और स्वर्ग को सुशोभित करती हैं। फिर देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं, जो धन और समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं। लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को अपना पति चुना, जो वैकुंठ में उनकी लीला का प्रतीक है।

इसके बाद वारुणी यानी मदिरा निकली, जिसे असुरों ने ग्रहण किया। फिर धन्वंतरी वैद्य निकले, जो अमृत कलश हाथ में लिए थे। धन्वंतरी आयुर्वेद के जनक माने जाते हैं। इन रत्नों के निकलने से देवता और असुर उत्साहित हो गए।

 

vishnu ji

भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार

असुरों ने अमृत हड़पने की कोशिश की, लेकिन भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। मोहिनी, जो अत्यंत सुंदर स्त्री का अवतार थी, उन्होंने असुरों को मोहित कर अमृत देवताओं को पिला दिया। स्वरभानु नामक असुर ने चालाकी से अमृत पी लिया, लेकिन विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया, जो राहु-केतु बन गए।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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