Guru Dakshina Ka mMahatva: शिव पुराण में देवयज्ञ और दान की महिमा अत्यंत विस्तार से बताई गई है। कहा गया है कि अपने घर में शुद्ध भाव से किया गया देवयज्ञ उत्तम फल देने वाला होता है।
Daan Ki Mahima: शिव पुराण में देवयज्ञ और दान की महिमा अत्यंत विस्तार से बताई गई है। कहा गया है कि अपने घर में शुद्ध भाव से किया गया देवयज्ञ उत्तम फल देने वाला होता है। यदि वही यज्ञ गोशाला में किया जाए तो उसका फल घर से दस गुना अधिक होता है। जलाशय के तट पर किया गया देवयज्ञ गोशाला से भी दस गुना अधिक फलदायक माना गया है। जहां तुलसी, बेल और पीपल जैसे पवित्र वृक्षों का मूल हो, वहां किया गया पूजन और भी अधिक श्रेष्ठ होता है। देवालय का स्थान उससे भी ऊँचा है। देवालय से बढ़कर तीर्थभूमि का तट श्रेष्ठ माना गया है। नदी का किनारा उससे भी अधिक पुण्यदायक है और तीर्थनदी का तट उससे दस गुना अधिक फल देने वाला बताया गया है।
सप्तगंगा- गंगा, गोदावरी, कावेरी, ताम्रपर्णी, सिंधु, सरयू और रेवा इन नदियों के तट का महत्व और भी बढ़ जाता है। समुद्र का तट इनसे दस गुना अधिक फल देने वाला कहा गया है, और पर्वत की चोटी पर किया गया पूजन उससे भी अधिक प्रभावशाली होता है। किंतु इन सब से ऊपर वह स्थान है, जहां मन प्रसन्न और एकाग्र हो जाए। स्पष्ट है कि बाहरी स्थान से अधिक महत्व अंतःकरण की शुद्धता का है।
समय का भी विशेष महत्व
समय का भी विशेष महत्व बताया गया है। सतयुग में यज्ञ और दान से पूर्ण फल मिलता था, त्रेता में उसका तिहाई, द्वापर में आधा और कलियुग में उससे भी कम फल प्राप्त होता है। फिर भी यदि पूजन शुद्ध हृदय से किया जाए तो वह अवश्य फलदायी होता है। सूर्य-संक्रांति के दिन किया गया पूजन सामान्य दिनों से दस गुना अधिक फल देता है। तुला और मेष की संक्रांति में उसका फल और बढ़ जाता है। चंद्रग्रहण में उससे भी अधिक और सूर्यग्रहण में उससे दस गुना अधिक फल मिलता है। महापुरुषों की संगति को तो करोड़ों सूर्यग्रहण के समान पवित्र माना गया है।
दान का महत्व
दान के विषय में भी पात्र और भावना का विशेष महत्व बताया गया है। जो स्त्री या पुरुष भूखा हो, वही अन्नदान का सच्चा पात्र है। यदि किसी को उसकी इच्छा की वस्तु बिना मांगे दे दी जाए तो दाता को पूर्ण फल मिलता है। याचना के बाद दिया गया दान आधा फल देता है, और सेवक को दिया गया दान चौथाई फल देने वाला होता है। दीन ब्राह्मण को दिया गया धन इस लोक में सुख देने वाला है, और वेदज्ञ ब्राह्मण को दिया गया दान स्वर्गलोक में दिव्य भोग प्रदान करता है।
गुरुदक्षिणा में क्या देना शुभ है?
गुरुदक्षिणा में प्राप्त शुद्ध धन का दान संपूर्ण फल देने वाला माना गया है। क्षत्रिय का पराक्रम से कमाया हुआ, वैश्य का व्यापार से अर्जित और शूद्र का सेवा से प्राप्त धन उत्तम द्रव्य कहा गया है। बारह प्रमुख दानों का वर्णन किया गया है। गाय, भूमि, तिल, सुवर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चांदी, नमक, कूष्माण्ड और कन्या। गोदान से पापों का नाश होता है। भूमि का दान परलोक में आश्रय देता है। तिल बल और आयु प्रदान करता है। सुवर्ण वीर्यवर्धक है और घी पुष्टिकारक। वस्त्र आयुवृद्धि करता है और धान्य समृद्धि लाता है। गुड़ मधुर फल देता है, चांदी से शक्ति बढ़ती है, नमक से भोजन की पूर्णता मिलती है और कूष्माण्ड पुष्टिदायक माना गया है। कन्यादान को आजीवन सुख देने वाला कहा गया है।
यदि किसी के पास धन न हो तो वह वाणी और सद्कर्म से भी पूजन कर सकता है। तीर्थयात्रा, व्रत, तपस्या और दान ये सब मनुष्य को नियमित रूप से करने चाहिए। जो कुछ देवताओं की तृप्ति के लिए समर्पित किया जाता है, वह इस लोक और परलोक दोनों में सुख देता है। अंततः जब मनुष्य अपने कर्म, दान और यज्ञ को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)