Ganga Avataran Story: भोलेनाथ गले में आभूषण नहीं बल्कि सर्पों की माला धारण करते हैं और उनकी जटाओं से मां गंगा बहती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव की जटाओं से मां गंगा क्यों बहती हैं? पौराणिक कथा में इसका वर्णन किया गया है।
Lord Shvia And Ganga Story: भगवान शिव एक ऐसे देवता हैं, जिनका स्वरूप सबसे अलग और अनोखा है। भोलेनाथ के स्वरूप का वर्णन करते ही मन में एक अलग ही छवि बन जाती है। भोलेनाथ गले में आभूषण नहीं बल्कि सर्पों की माला धारण करते हैं। उनके सिर पर कोई मुकुट नहीं है, बल्कि चंद्रदेव विराजमान हैं और उनकी जटाओं से मां गंगा बहती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव की जटाओं से मां गंगा क्यों बहती हैं और इसके पीछे क्या कारण है? चलिए जानते हैं क्या है पौराणिक कथा..
राजा सगर का अश्वमेध यज्ञ और उनके पुत्रों का संकट
पौराणिक कथा के अनुसार, बहुत प्राचीन काल की बात है। सूर्यवंश के इक्ष्वाकु कुल में राजा सगर हुए। वे अत्यंत पराक्रमी, धर्मपरायण और प्रजापालक राजा थे। उनकी दो रानियां थीं – केशिनी और सुमति। केशिनी से एक पुत्र हुआ, जिसका नाम असमंजस रखा गया, जबकि सुमति से 60 हजार पुत्र उत्पन्न हुए। राजा सगर ने अपनी शक्ति और साम्राज्य विस्तार के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया। इस यज्ञ में एक पवित्र अश्व को खुला छोड़ दिया जाता है और वह जहां-जहां जाता है, उस भूमि पर राजा का अधिकार स्थापित होता है। यदि कोई राजा उस अश्व को रोकता है तो युद्ध होता है।
देवराज इंद्र की ईर्ष्या
राजा सगर के 60 हजार पुत्र उस अश्व की रक्षा के लिए नियुक्त किए गए। अश्व स्वतंत्र रूप से विचरण करने लगा, लेकिन देवराज इंद्र को राजा सगर की बढ़ती शक्ति से ईर्ष्या हुई। उन्होंने छिपकर उस अश्व को चुरा लिया और उसे पाताल लोक में ले जाकर कपिल मुनि के आश्रम के समीप बांध दिया। कपिल मुनि उस समय गहन समाधि में लीन थे।
राजा सगर के पुत्रों ने अश्व की खोज आरंभ की। वे पूरी पृथ्वी को खोदते हुए, समुद्रों को पार करते हुए, अंत में पाताल लोक पहुंचे। वहां उन्होंने अश्व को कपिल मुनि के आश्रम में बंधा देखा। अज्ञानवश वे कपिल मुनि को ही चोर समझ बैठे और उन्हें अपशब्द कहकर अपमानित करने लगे। "तुमने हमारे पिता के यज्ञ-अश्व को चुराया है।" यह कहकर उन्होंने मुनि पर आक्रमण करने का प्रयास किया।
60 हजार पुत्रों को किया भस्म
कपिल मुनि की समाधि भंग हुई। उनका क्रोध इतना प्रचंड था कि उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से सगर के सभी 60 हजार पुत्रों को भस्म कर दिया। केवल भस्मावशेष रह गए। इस घटना से सगर वंश पर बड़ा संकट आ गया, क्योंकि बिना उचित संस्कार और पवित्र जल के स्पर्श के उन आत्माओं को मोक्ष नहीं मिल सकता था। राजा सगर को जब यह समाचार मिला, तो वे अत्यंत दुखी हुए।
अंशुमान और दिलीप की तपस्या
राजा सगर के बाद उनके पौत्र अंशुमान राजा बने। अंशुमान भी पराक्रमी थे। उन्होंने अपने चाचा यानी सगर के 60 हजार पुत्रों की अस्थियों को मोक्ष दिलाने के लिए गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने का संकल्प लिया। गंगा, जो स्वर्गलोक में विराजमान थीं और विष्णु भगवान के चरणों से निकली हुई पवित्र नदी थीं, उन्हें धरती पर उतारना आसान कार्य नहीं था।
अंशुमान ने हिमालय की दुर्गम चोटियों पर जाकर ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। वे वर्षों तक उपवास रखकर, भूमि पर शयन करके, केवल फलाहार पर जीवित रहकर तप करते रहे। उनकी तपस्या से ब्रह्मलोक कंपित हो गया। अंत में ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले, "हे अंशुमान! तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूं। लेकिन गंगा को धरती पर लाना मेरे वश में नहीं है, क्योंकि वे विष्णु जी की कृपा से उत्पन्न हैं। फिर भी, यदि तुम चाहो, तो मैं तुम्हें मार्गदर्शन दे सकता हूं।"
अंशुमान ने प्रार्थना की कि उनके पूर्वजों को मोक्ष कैसे मिले। ब्रह्मा जी ने कहा कि केवल गंगा जल से ही उन अस्थियों का स्पर्श कर मोक्ष संभव है, लेकिन अंशुमान की तपस्या अधूरी रह गई और वे सफल नहीं हो सके।
अंशुमान के बाद उनके पुत्र दिलीप राजा बने। दिलीप भी धर्मात्मा थे। उन्होंने भी गंगा अवतरण के लिए कठोर तपस्या की। वे हिमालय गए, जहां उन्होंने ब्रह्मा जी और अन्य देवताओं की आराधना की। उनकी तपस्या में वे बिना अन्न-जल के, केवल ध्यान में लीन रहते, लेकिन भाग्यवश वे भी पूर्ण सफलता नहीं पा सके। दिलीप ने अपने जीवन का अधिकांश भाग इस संकल्प में लगा दिया, किंतु गंगा धरती पर नहीं आईं।
भागीरथ की दृढ़ तपस्या और ब्रह्मा जी का वरदान
दिलीप के पुत्र थे भागीरथ। भागीरथ बचपन से ही अपने पूर्वजों की कथा सुनते आए थे। वे जानते थे कि सगर वंश का उद्धार केवल गंगा से ही संभव है। राजा बनते ही भागीरथ ने राजपाट का त्याग किया और हिमालय की ओर प्रस्थान किया। वहां उन्होंने ब्रह्मा जी की तपस्या आरंभ की।
भागीरथ की तपस्या अत्यंत कठिन थी। पहले वर्ष वे एक पैर पर खड़े होकर, आकाश की ओर देखकर तप करते रहे। दूसरे वर्ष वे केवल वायु पर जीवित रहकर ध्यान करते। तीसरे वर्ष वे अग्नि के चारों ओर घेरा बनाकर तप करते, जहां सूर्य की किरणें उन्हें झुलसा रही थीं। चौथे वर्ष वे जल में खड़े होकर तप करते। पांचवें वर्ष वे भूमि पर लेटकर, बिना हिले-डुले तप करते। इस प्रकार सहस्र वर्षों तक उनकी तपस्या चलती रही।
अंत में ब्रह्मा जी प्रकट हुए। वे बोले, "हे भागीरथ, तुम्हारी भक्ति और दृढ़ता से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। बताओ, क्या वर मांगते हो?" भागीरथ ने हाथ जोड़कर कहा, "हे पितामह! मेरे पूर्वज सगर के 60 हजार पुत्र कपिल मुनि के शाप से भस्म हो गए। उनकी मुक्ति के लिए स्वर्ग की गंगा को धरती पर लाएं, ताकि उनका स्पर्श उन अस्थियों को मोक्ष दे।"
ब्रह्मा जी मुस्कुराए और बोले, "तथास्तु! मैं गंगा को धरती पर भेजूंगा, लेकिन गंगा का वेग इतना प्रचंड है कि यदि वे सीधे पृथ्वी पर गिरेंगी,तो पृथ्वी चीरकर पाताल में समा जाएगी। सृष्टि का विनाश हो जाएगा। इस वेग को सहन करने की शक्ति केवल महादेव शिव में है, इसलिए तुम शिव जी की शरण लो और उनकी तपस्या करो।"
गंगा का अहंकार और शिव जी की तपस्या
ब्रह्मा जी के आदेश पर गंगा स्वर्ग से धरती की ओर आने को तैयार हुईं। गंगा विष्णु जी के चरण कमल से निकली हुई थीं, इसलिए उन्हें 'विष्णुपदी' भी कहा जाता है। लेकिन गंगा को अहंकार हो गया। उन्होंने सोचा, "मैं इतनी पवित्र और शक्तिशाली हूं। मेरा वेग इतना तेज है कि पूरी पृथ्वी को बहा लूंगी। यह भागीरथ कौन है, जो मुझे बुला रहा है?" गंगा प्रचंड वेग से गिरने लगीं। उनका जल इतना विशाल था कि आकाश में बादलों की तरह छा गया। देवता भी भयभीत होकर देखने लगे।
भागीरथ ने ब्रह्मा जी की सलाह मानकर अब कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव की आराधना आरंभ की। कैलाश की बर्फीली चोटियों पर, जहां हवा भी ठंड से कांपती है, भागीरथ ने तप किया। वे शिव लिंग की स्थापना कर, मंत्र जपते, बिल्व पत्र चढ़ाते, ध्यान में लीन रहते। उनकी तपस्या से कैलाश पर्वत हिलने लगा। पक्षी, पशु, देवता सभी चकित थे।
अंत में भगवान शिव, जो भोलेनाथ के नाम से जाने जाते हैं, प्रसन्न होकर प्रकट हुए। उनका स्वरूप दिव्य था– जटाओं में चंद्रमा, गले में रुद्राक्ष की माला, शरीर पर भस्म, हाथ में त्रिशूल और डमरू। शिव जी ने भागीरथ से कहा, "हे भागीरथ, तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूं। बताओ, क्या इच्छा है?" भागीरथ ने प्रणाम कर कहा, "हे महादेव, गंगा का वेग पृथ्वी सहन नहीं कर सकती। कृपा कर उन्हें अपनी जटाओं में धारण करें, ताकि शांत होकर धरती पर बहें और मेरे पूर्वजों को मोक्ष मिले।" शिव जी ने करुणामय होकर कहा, "तथास्तु, मैं गंगा को अपनी जटाओं में बांध लूंगा। सृष्टि की रक्षा होगी।"
गंगा का जटाओं में समाना और धरती पर अवतरण
जैसे ही गंगा प्रचंड वेग से गिरने लगीं, भगवान शिव ने अपनी घनी, लंबी और उलझी हुई जटाएं फैला दीं। गंगा का सारा जल उन जटाओं के जाल में उलझकर रह गया। गंगा छटपटाने लगीं। वे दाएं-बाएं घूमकर निकलने का प्रयास करतीं, लेकिन शिव की जटाएं इतनी मजबूत थीं कि वे कैद हो गईं। गंगा का अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने मन ही मन शिव जी से क्षमा मांगी और बोलीं, "हे गंगाधर, मुझे मुक्त करें। मैं अब शांत होकर बहूंगी।"
भगवान शिव की दया अपार है। उन्होंने अपनी जटाओं की एक छोटी-सी लट खोली। उससे गंगा की एक पतली धारा निकली, जो शांत और पवित्र थी। इस धारा को 'भागीरथी' कहा गया, क्योंकि यह भागीरथ की तपस्या का फल थी। गंगा सात धाराओं में विभक्त होकर बहने लगीं– ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व दिशा में, सुचक्षु, सीता और सिंधु पश्चिम दिशा में, तथा सातवीं धारा भागीरथ के पीछे-पीछे।
भागीरथ स्वर्ण रथ पर सवार होकर आगे-आगे चले। गंगा उनके पीछे बहती गईं। रास्ते में जहां-जहां गंगा का जल स्पर्श करता, वहां पापों का नाश होता, भूमि पवित्र हो जाती। एक स्थान पर गंगा जाह्नु मुनि के आश्रम से होकर गुजरीं। उनके वेग से आश्रम बहने लगा। जाह्नु मुनि क्रोधित होकर गंगा को पी गए। भागीरथ ने प्रार्थना की तो जाह्नु मुनि ने गंगा को अपने कान से निकाला, इसलिए गंगा को 'जाह्नवी' भी कहा जाता है।
अंत में गंगा कपिल मुनि के आश्रम पहुंचीं, जहां सगर के 60 हजार पुत्रों की भस्म अस्थियां पड़ी थीं। जैसे ही गंगा जल ने उन अस्थियों को स्पर्श किया, वे सभी आत्माएं पापमुक्त होकर स्वर्ग लोक को चली गईं। देवताओं ने पुष्प वर्षा की, गंधर्वों ने गान किया। भागीरथ का संकल्प पूरा हुआ। इस प्रकार भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण कर सृष्टि की रक्षा की और सगर वंश को मोक्ष प्रदान किया।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)