Lord Shiva: शिव पुराण के अनुसार, अनंत ज्योति स्तंभ की उत्पत्ति की घटना सृष्टि के प्रारंभिक चरण में हुई, जब ब्रह्मांड अभी पूरी तरह से स्थापित नहीं हुआ था। अनंत ज्योति-स्तंभ का उदय उस समय हुआ, जब ब्रह्मा और विष्णु का अहंकार चरम पर पहुंच गया।
Shivling Mythological Story: सनातन धर्म में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। शिवलिंग के रूप में भी भगवान शिव को पूजा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई थी और क्या है इसका रहस्य? हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथ शिव पुराण में अनंत ज्योति-स्तंभ की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है। यह घटना सृष्टि के प्रारंभिक काल से जुड़ी है, जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। इस विवाद के समाधान के रूप में भगवान शिव ने अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट होकर अपनी सर्वोच्चता सिद्ध की। ऐसे में आइए जानते हैं इस प्रसंग से जुड़ी पौराणिक कथा...
कैसे हुई अनंत ज्योति-स्तंभ की उत्पत्ति
हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में अनंत ज्योति-स्तंभ की कथा एक ऐसा रहस्यमयी अध्याय है, जो सृष्टि के आदि-अनादि स्वरूप को दर्शाती है। यह कथा न केवल शिव के अनंत रूप की महिमा गाती है, बल्कि ब्रह्मा और विष्णु जैसे देवताओं की सीमाओं को भी उजागर करती है। अनंत ज्योति-स्तंभ, जिसे 'अग्नि स्तंभ' या 'प्रकाश स्तंभ' के रूप में भी जाना जाता है, वह शिव के लिंग स्वरूप की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है।
सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा और विष्णु का विवाद
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आदि काल में जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी, तब वे स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानते थे। ब्रह्मा, जो सृष्टिकर्ता हैं, चार मुख वाले देवता के रूप में जाने जाते हैं और वे वेदों के ज्ञान से युक्त हैं। दूसरी ओर, विष्णु, जो पालनकर्ता हैं, अनंत शयन पर विराजमान रहते हैं और जगत की रक्षा करते हैं। एक बार, जब दोनों देवता एक साथ मिले तो उनके बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद छिड़ गया। ब्रह्मा ने कहा, "मैं सृष्टि का रचयिता हूं, इसलिए मैं सबसे बड़ा हूं। बिना मेरी रचना के क्या कोई पालन कर सकता है?" विष्णु ने उत्तर दिया, "सृष्टि की रक्षा और संतुलन मेरे हाथों में है। यदि मैं न होता तो सृष्टि का अस्तित्व ही न बचता। इसलिए मैं श्रेष्ठ हूं।"
भगवान शिव का हस्तक्षेप
यह विवाद इतना तीव्र हो गया कि दोनों देवता एक-दूसरे से लड़ने को तैयार हो गए। ब्रह्मा के मन में अहंकार जागा और विष्णु भी अपनी महिमा को सिद्ध करने के लिए उतावले हो उठे। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि इस विवाद के दौरान पूरा ब्रह्मांड कंपित हो उठा। देवताओं ने देखा कि यदि यह झगड़ा बढ़ा तो सृष्टि का विनाश हो सकता है, तभी ईश्वर की लीला आरंभ हुई। शिव न तो आदि हैं और न ही अंत, जो निराकार और साकार दोनों रूपों में विद्यमान हैं, उन्होंने इस विवाद को शांत करने के लिए अपना अनोखा रूप प्रकट किया। यह रूप था अनंत ज्योति-स्तंभ का– एक ऐसा प्रकाश का स्तंभ जो आकाश से पाताल तक फैला हुआ था, जिसका न आदि दिखाई देता था और न ही अंत।
शिव पुराण के अनुसार, यह घटना सृष्टि के प्रारंभिक चरण में हुई, जब ब्रह्मांड अभी पूरी तरह से स्थापित नहीं हुआ था। अनंत ज्योति-स्तंभ का उदय उस समय हुआ, जब ब्रह्मा और विष्णु का अहंकार चरम पर पहुंच गया। यह स्तंभ इतना विशाल और चमकदार था कि उसकी ज्योति से पूरा ब्रह्मांड आलोकित हो उठा। ब्रह्मा और विष्णु दोनों स्तब्ध रह गए। उन्होंने सोचा कि यह क्या है? कौन इसका स्रोत है? तभी, आकाशवाणी हुई: "यह अनंत ज्योति-स्तंभ है। जो इसका आदि और अंत ढूंढ लेगा, वही सबसे श्रेष्ठ होगा।"
ब्रह्मा और विष्णु की परीक्षा
ब्रह्मा और विष्णु ने इस चुनौती को स्वीकार किया। ब्रह्मा ने ऊपर की ओर अर्थात आकाश की दिशा में स्तंभ का अंत ढूंढने का निर्णय लिया। वे अपने हंस वाहन पर सवार होकर उड़ान भरने लगे। विष्णु ने नीचे की ओर, पाताल की दिशा में, स्तंभ का आदि ढूंढने का फैसला किया। उन्होंने वराह अवतार धारण किया और पृथ्वी को खोदते हुए नीचे उतरने लगे।
ब्रह्मा की यात्रा
ब्रह्मा ऊपर जाते रहे, लाखों युग बीत गए, लेकिन स्तंभ का अंत कहीं नहीं मिला। वे थक चुके थे, लेकिन उनका अहंकार उन्हें रुकने नहीं दे रहा था। रास्ते में उन्हें एक केतकी का फूल मिला, जो स्तंभ से गिरकर नीचे आ रहा था। ब्रह्मा ने फूल से पूछा, "तुम कहां से आ रहे हो?" केतकी ने कहा, "मैं स्तंभ के शीर्ष से गिरा हूं।" ब्रह्मा ने सोचा कि यदि मैं कह दूं कि मैंने अंत देख लिया है तो मैं विजयी हो जाऊंगा। उन्होंने केतकी से झूठ बोलने को कहा, "तुम गवाही दो कि मैंने स्तंभ का अंत देखा है।" केतकी सहमत हो गई, क्योंकि वह ब्रह्मा की शक्ति से भयभीत थी। इस प्रकार, ब्रह्मा झूठ का सहारा लेकर लौट आए।
विष्णु की यात्रा
विष्णु वराह रूप में पाताल की गहराइयों में उतरते रहे। उन्होंने असंख्य लोकों को पार किया, लेकिन स्तंभ का आदि कहीं नहीं मिला। लाखों वर्ष बीत गए, लेकिन वे असफल रहे। विष्णु ने अपनी सीमा को स्वीकार किया और सत्य का सहारा लिया। वे वापस लौट आए और बोले, "मैं स्तंभ का आदि नहीं ढूंढ सका। यह अनंत है।"
दोनों देवता वापस मूल स्थान पर पहुंचे। ब्रह्मा ने झूठ बोलकर कहा, "मैंने स्तंभ का अंत देख लिया है और केतकी फूल मेरी गवाही है।" केतकी ने भी झूठी गवाही दी, लेकिन विष्णु ने सत्य कहा, तभी अनंत ज्योति-स्तंभ से शिव का साकार रूप प्रकट हुआ। शिव ने क्रोधित होकर ब्रह्मा को दंडित किया। उन्होंने कहा, "झूठ बोलने के कारण, ब्रह्मा, तुम्हारा कभी कोई मंदिर नहीं बनेगा और केतकी फूल मेरी पूजा में कभी इस्तेमाल नहीं होगा।" विष्णु की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इस प्रकार, शिव ने अपना लिंग रूप स्थापित किया, जो अनंत ज्योति-स्तंभ का प्रतीक बन गया।
शिव का लिंग स्वरूप
इस कथा से शिव के लिंग स्वरूप की उत्पत्ति हुई। लिंग का अर्थ है 'चिन्ह' या 'प्रतीक', जो शिव के निराकार और अनंत स्वरूप को दर्शाता है। अनंत ज्योति-स्तंभ शिव का वह रूप था, जो ब्रह्मांड की अनंतता को प्रतिबिंबित करता है। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि इस घटना के बाद शिव ने कहा, "मैं न आदि हूं, न अंत। मैं अनादि-अनंत हूं।"
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)