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Maa Annapurna Katha: माता अन्नपूर्णा ने यशोदा मां की कब और कैसे की थी मदद, जानें क्या है पौराणिक कथा

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Maa Annapurna Ki Story: माता अन्नपूर्णा और यशोदा मां की यह पौराणिक कथा केवल धार्मिक भावनाओं को नहीं, बल्कि मानवता के मूल सिद्धांत को भी उजागर करती है कि भूखे को अन्न देना ही सर्वोच्च पूजा है।

माता अन्नपूर्णा ने यशोदा मां की कब और कैसे की थी मदद, जानें क्या है पौराणिक कथा
Mata Annapurna or Maa Yashoda Ki Kahani: भारतीय संस्कृति में देवी-देवताओं की कथाएं न केवल आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि उनमें गहरे आध्यात्मिक और नैतिक संदेश भी छिपे होते हैं। इन्हीं कथाओं में से एक है “माता अन्नपूर्णा और यशोदा मां” से जुड़ी पौराणिक कथा, जो इस बात का सुंदर उदाहरण है कि मां का स्नेह, भक्ति और विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाता। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि सच्चे भाव से की गई पुकार का उत्तर स्वयं देवी-देवता भी अवश्य देते हैं। माता अन्नपूर्णा, भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती का एक स्वरूप हैं। ‘अन्नपूर्णा’ शब्द दो शब्दों से बना है अन्न अर्थात भोजन और पूर्णा अर्थात पूर्णता। इस रूप में माता संपूर्ण संसार को अन्न (भोजन) प्रदान करने वाली देवी हैं। 

स्कंद पुराण के अनुसार, माता अन्नपूर्णा का वर्णन इस रूप में मिलता है कि जब सृष्टि में अन्न का अभाव हुआ, तब माता पार्वती ने अन्नपूर्णा का रूप धारण किया और समस्त प्राणियों का पोषण किया। वाराणसी (काशी) में माता अन्नपूर्णा का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जहां यह माना जाता है कि माता स्वयं भक्तों को अन्न प्रदान करती हैं।

यशोदा और श्रीकृष्ण की लीला

श्रीमद् भागवत और पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण बचपन में गोकुल में अपनी पालक माता यशोदा के सान्निध्य में रहते थे। यशोदा मां के लिए कृष्ण केवल भगवान नहीं, बल्कि उनके लाडले बालक थे। कृष्ण की बाल लीलाएं, माखन चोरी, गोपियों के साथ हंसी-मज़ाक, और उनकी चपलता गोकुलवासियों के जीवन का केंद्र बन चुकी थीं। एक दिन की घटना ऐसी है जब यशोदा मां को भोजन से संबंधित एक कठिन परिस्थिति का सामना करना पड़ा, और उस समय स्वयं माता अन्नपूर्णा ने उनकी सहायता की।

जब गोकुल में पड़ा भोजन का संकट

कथाओं के अनुसार, एक बार गोकुल में अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई। वर्षा नहीं हुई, गोशालाओं में चारा नहीं बचा, और घरों में अन्न का भंडार भी समाप्त होने लगा। सभी लोग परेशान थे। यशोदा मां, जो अपने बालक कृष्ण के लिए सदैव सुस्वादु भोजन बनाती थीं, अब असहाय हो गईं। उनके घर में भी अन्न का एक दाना नहीं बचा था।
 
माता अन्नपूर्णा ने यशोदा मां की कब और कैसे की थी मदद, जानें क्या है पौराणिक कथा

यशोदा मां ने चिंता से भरे हृदय से कहा कि हे नंदलाल! आज तेरे लिए क्या बनाऊं? घर में न दूध है, न माखन, न अनाज। मां का हृदय रो रहा है कि तुझे भूखा न रहना पड़े। यह देखकर बालक कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा कि मां, चिंता मत कर। जब भी सच्चे भाव से पुकारो, अन्नपूर्णा माता स्वयं अन्न प्रदान करती हैं। यशोदा मां ने हृदय से माता पार्वती के अन्नपूर्णा रूप का ध्यान किया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की। हे जगत की पालनहार माता! तू ही सृष्टि की पोषक है। आज तेरी यह दासी तेरे बालक के लिए अन्न मांगती है। कृपा कर मेरी लाज रख।

माता अन्नपूर्णा का प्रकट होना

कहा जाता है कि उसी क्षण उनके द्वार पर एक तेजस्वी स्त्री प्रकट हुईं। उनके हाथ में सोने का कलश था और दूसरे हाथ में चांदी का चमचा। वह अत्यंत सुंदर, तेजमयी और करुणामयी थीं। उन्होंने मुस्कुराकर कहा कि यशोदा! मैं अन्नपूर्णा हूं। तुम्हारी भक्ति और मातृत्व ने मुझे यहां आने को विवश किया है। चिंता मत कर, तुम्हारे घर में अब कभी अन्न का अभाव नहीं रहेगा।

इतना कहकर माता अन्नपूर्णा ने अपने कलश से अनाज और भोजन सामग्री निकाली। यशोदा मां ने देखा कि उनके रसोई घर के सभी बर्तन अन्न से भर गए हैं। गोकुल के घरों में भी अन्न का वर्षा-सा दृश्य बन गया। सभी ग्रामीण आश्चर्यचकित थे कि अचानक इतनी समृद्धि कैसे आई। जब यशोदा मां ने उन्हें धन्यवाद देने के लिए सिर झुकाया, तब तक देवी अदृश्य हो चुकी थीं। केवल मंद सुगंध और भोजन की दिव्य खुशबू रह गई थी।

कृष्ण की मुस्कान और लीला का अर्थ

माता अन्नपूर्णा के चले जाने के बाद कृष्ण ने अपनी मां से कहा कि मां, देखो, जिसने सच्चे हृदय से माता को पुकारा, उसे कभी अन्न की कमी नहीं होती। यह लीला केवल तुम्हारे लिए नहीं, बल्कि पूरे संसार के लिए है कि कोई भी भूखा न रहे, कोई भी अन्न को व्यर्थ न फेंके। इस पर यशोदा मां ने बालक कृष्ण को गले से लगा लिया और कहा कि सचमुच तू ही अन्नपूर्णा का पुत्र है, क्योंकि तेरा घर कभी खाली नहीं रहता।

कथा का प्रतीकात्मक अर्थ

यह कथा केवल एक चमत्कारिक घटना नहीं है, बल्कि इसके भीतर गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है।
 
माता अन्नपूर्णा ने यशोदा मां की कब और कैसे की थी मदद, जानें क्या है पौराणिक कथा
 
  • मातृत्व की शक्ति: जब मां अपने बच्चे के लिए सच्चे भाव से कुछ मांगती है, तो सृष्टि की सभी शक्तियां उसके पक्ष में हो जाती हैं।
  • भक्ति और विश्वास: यशोदा मां ने जब पूर्ण श्रद्धा से देवी अन्नपूर्णा का स्मरण किया, तब स्वयं देवी प्रकट हुईं। यह दर्शाता है कि ईश्वर केवल भव्य पूजा नहीं, बल्कि सच्ची भावना से प्रसन्न होते हैं।
  • अन्न का महत्व: अन्न ही जीवन का आधार है। अन्नपूर्णा का संदेश है कि कभी भी भोजन का अपमान न करें, और दूसरों के साथ बांटकर खाएं।
  • कृष्ण की लीला का बोध: श्रीकृष्ण इस कथा के माध्यम से संसार को यह संदेश देते हैं कि सेवा, प्रेम और विश्वास ही सच्चा धर्म है।

अन्नपूर्णा माता की पूजा और व्रत

भारतीय घरों में नवरात्र, दीपावली या विशेष अवसरों पर माता अन्नपूर्णा की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर अन्नपूर्णा जयंती मार्गशीर्ष माह में मनाई जाती है। इस दिन लोग माता का व्रत रखते हैं, गरीबों को अन्नदान करते हैं और रसोई में माता की तस्वीर स्थापित कर प्रार्थना करते हैं। “अन्नं बहु कुर्वन् अन्नदाता भव।” अर्थात हे माता, मेरे घर में अन्न की समृद्धि बनी रहे ताकि मैं दूसरों को भी अन्न प्रदान कर सकूं।

कथा से मिलने वाली सीख

सच्ची आस्था से किया गया स्मरण कभी व्यर्थ नहीं जाता। अन्न का सम्मान करना ही माता अन्नपूर्णा की सच्ची आराधना है। भक्ति का मूल्य बाह्य साधनों में नहीं, हृदय की भावना में है। किसी की भूख मिटाना सबसे बड़ा धर्म है। माता अन्नपूर्णा और यशोदा मां की यह पौराणिक कथा केवल धार्मिक भावनाओं को नहीं, बल्कि मानवता के मूल सिद्धांत को भी उजागर करती है। भूखे को अन्न देना ही सर्वोच्च पूजा है। यशोदा मां की भक्ति, उनकी मातृत्व भावना और माता अन्नपूर्णा की करुणा आज भी हर घर की रसोई में विद्यमान है। जब भी कोई मां अपने बच्चों के लिए प्रेम से भोजन बनाती है, जब भी कोई व्यक्ति भूखे को अन्न खिलाता है, तब-तब माता अन्नपूर्णा उसी रूप में प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं कि तेरे घर में कभी अन्न का अभाव न हो।”

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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