Vishwamitra-Lord Rama Story: महर्षि विश्वामित्र दक्षिण भारत के सिद्धाश्रम में रहते थे। वे एक महान यज्ञ करने जा रहे थे, जो देवताओं को बल प्रदान करता, लेकिन राक्षस- मारीच और सुबाहु यज्ञ में विघ्न डालते थे। वे मांस-रक्त की वर्षा कर अग्नि को अपवित्र करते।
Ramayana Mythological Story: हिन्दू धर्म का महाकाव्य रामायण भगवान राम के दिव्य चरित्र, कर्मों एवं मर्यादा का अद्भुत वर्णन करता है। भगवान राम विष्णु के सातवें अवतार थे, जिन्होंने राक्षसों के संहार और धर्म की पुनर्स्थापना हेतु पृथ्वी पर जन्म लिया। किन्तु क्या आपको ज्ञात है कि इस महान अवतार की प्रथम यात्रा कब और कैसे आरम्भ हुआ? उस प्रथम कड़ी का सूत्रपात करने वाले थे महर्षि विश्वामित्र, जिनके एक मात्र आगमन ने बालक राम को रघुकुल-रत्न से मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने की नींव रख दी। ऐसे में चलिए जानते हैं कि विश्वामित्र आखिर अयोध्या क्यों आए थे और उनके इस उद्देश्य के पीछे की क्या है पौराणिक कथा...
कौन थे विश्वामित्र और क्या था उद्देश्य
विश्वामित्र मूल रूप से क्षत्रिय राजा थे, जिनका नाम था विश्वरथ या गाधि पुत्र। वे कुशिक वंश के राजा थे और अपनी शक्ति व युद्धकौशल के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वे अपने विशाल सेना के साथ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे। वशिष्ठ की कामधेनु गाय 'नंदिनी' ने चमत्कारिक रूप से पूरे सैन्य दल को भोजन उपलब्ध कराया। लालचवश विश्वामित्र ने गाय छीनने की कोशिश की, लेकिन वशिष्ठ की तपोबल से उत्पन्न शक्ति ने उन्हें पराजित कर दिया। इस अपमान से क्रोधित होकर विश्वामित्र ने राजपाट त्याग दिया और कठोर तपस्या शुरू की। वे ब्रह्मर्षि बनना चाहते थे।
वर्षों की तपस्या के बाद वे 'राजर्षि' बने, लेकिन उन्होंने ये उपाधि ठुकरा दी। फिर वह 'महार्षि', लेकिन इंद्र और अन्य देवताओं ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा मेनका भेजी। मेनका से उन्हें शकुंतला नामक कन्या हुई, जो बाद में दुष्यंत से विवाह कर भरत वंश की जननी बनी। फिर भी विश्वामित्र ने तप नहीं छोड़ा। एक अन्य प्रसंग में त्रिशंकु नामक राजा को स्वर्ग भेजने के लिए उन्होंने अपनी तपोशक्ति से नया स्वर्ग बनाया, जिससे वशिष्ठ से वैर बढ़ा। अंततः कठिन संघर्ष के बाद वशिष्ठ ने उन्हें 'ब्रह्मर्षि' स्वीकार किया। विश्वामित्र अब विश्व के मित्र कहलाए। इसके बाद उन्होंने विश्व कल्याण के लिए यज्ञ करना शुरू किया, लेकिन राक्षसों ने उस यज्ञ को संपन्न नहीं होने दिया। अब विश्वामित्र स्वयं राक्षसों का वध नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनका यज्ञ सफल नहीं हो पाता, ऐसे में उन्हें श्रीराम की आवश्यकता पड़ी, जो इन राक्षसों का वध करें और यज्ञ को संपन्न करवाए। इसके बाद विश्वामित्र रक्षा और धर्म स्थापना के लिए विचरने लगे और अयोध्या पहुंचे।
अयोध्या में श्रीराम का जन्म
राजा दशरथ इक्ष्वाकु वंश के वंशज थे, जिन्हें सगर, दिलीप, रघु जैसे महान पूर्वजों से विरासत मिली थी। दशरथ निषाद राज गुह के मित्र थे और देवताओं के युद्धों में सहयोगी। उनकी तीन रानियां थीं – कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा, लेकिन संतान सुख नहीं था। राज्य में सुख-शांति थी, लेकिन उत्तराधिकारी की चिंता सताती थी। दशरथ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ की योजना बनाई, जिसे ऋष्यशृंग ने संपन्न किया। यज्ञ से प्राप्त खीर से कौसल्या को राम, कैकयी को भरत और सुमित्रा को लक्ष्मण-शत्रुघ्न हुए। चारों राजकुमार गुणवान, वीर और विद्या में निपुण थे। राम सबसे बड़े और सबसे प्रिय थे– नीले कमल जैसे नेत्र, लंबे भुजा, सिंह जैसे गति। वे वेद, शास्त्र, धनुर्विद्या में पारंगत थे। अयोध्या में उत्सवों का माहौल था, लेकिन दूर जंगलों में राक्षसों का आतंक बढ़ रहा था।
विश्वामित्र क्यों आए अयोध्या?
महर्षि विश्वामित्र दक्षिण भारत के सिद्धाश्रम में रहते थे। वे एक महान यज्ञ करने जा रहे थे, जो देवताओं को बल प्रदान करता, लेकिन राक्षस- मारीच और सुबाहु यज्ञ में विघ्न डालते थे। वे मांस-रक्त की वर्षा कर अग्नि को अपवित्र करते। विश्वामित्र की तपोबल से राक्षस दूर भागते, लेकिन यज्ञ पूरा नहीं होता। इंद्र के भय से कोई ऋषि सहायता नहीं करता, तब विश्वामित्र को स्मरण हुआ श्रीराम का। वे जानते थे कि राम विष्णु अवतार हैं और राक्षस संहार के लिए जन्मे हैं, लेकिन राम अभी बालक थे-लगभग 12-15 वर्ष के। विश्वामित्र ने सोचा, यही अवसर है राम को प्रशिक्षित करने और उनकी शक्ति जगाने का।
एक दिन सूर्योदय के समय विश्वामित्र अयोध्या पहुंचे। उनके साथ अन्य ऋषि थे। राजद्वार पर द्वारपालों ने दशरथ को सूचना दी। दशरथ स्वयं बाहर आए, विश्वामित्र का स्वागत किया, पाद्य-अर्घ्य दिया और पूछा- हे मुनि, क्या प्रयोजन है? विश्वामित्र ने कहा- महाराज, मैं यज्ञ कर रहा हूं, लेकिन राक्षस विघ्न डालते हैं। आपके पुत्र राम और लक्ष्मण को मेरे साथ भेजें। मैं उन्हें अस्त्र-शस्त्र विद्या सिखाऊंगा और यज्ञ रक्षा करवाऊंगा। वे सुरक्षित लौटेंगे। दशरथ स्तब्ध रह गए। राम उनके प्राण थे। उन्होंने कहा- मुनिवर, राम अभी बालक हैं। मैं स्वयं अपनी सेना लेकर आऊंगा, लेकिन विश्वामित्र क्रोधित हो गए। उनका चेहरा लाल हो गया, वे बोले- इक्ष्वाकु वंश की प्रतिज्ञा भूल गए? रघुकुल की रीति है– ऋषि मांगें तो सिर दे दो। यदि नहीं भेजोगे तो मैं शाप देकर चला जाऊंगा। दशरथ भयभीत हो गए। राज्य में अकाल, रोग फैलने का डर था, तब वशिष्ठ ने समझाया- विश्वामित्र ब्रह्मर्षि हैं। राम को भेजो, यह उनके लिए अवसर है। दशरथ ने सहमति दी, लेकिन हृदय रो रहा था। राम-लक्ष्मण को बुलाया गया। विश्वामित्र ने उन्हें गले लगाया और सरयू तट पर चल पड़े। अयोध्या में माताएं विलाप कर रही थीं, लेकिन यह दिव्य योजना थी।
वन यात्रा की शुरुआत
विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर अयोध्या से दक्षिण की ओर चले। रास्ते में उन्होंने काम्पिल्य नदी के तट पर विश्राम किया। विश्वामित्र ने राम को शिक्षा देनी शुरू की। उन्होंने बल और अतिबल नामक दो विद्याएं सिखाईं, जो थकान, भूख-प्यास से मुक्त रखती थीं और शक्ति प्रदान करती थीं। राम जी ने कहा- गुरुदेव, यह विद्या मुझे अजेय बनाएगी।" रात में सोते समय विश्वामित्र ने श्रीराम को जगदीश (विष्णु) का स्मरण कराया। अगले दिन वे सरयू और गंगा के संगम पर पहुंचे।
ताड़का वध कथा
वन में पहुंचते ही भयंकर नाद हुआ। ताड़का सुंद की पत्नी और मारीच की मां थी, वह एक शक्तिशाली राक्षसी थी। वह स्त्री होने पर भी क्रूर थी और ब्रह्मा से वरदान प्राप्त थी कि कोई उसे मार न सके सिवाय श्रीराम के। ताड़का ने पेड़ उखाड़कर श्रीराम पर प्रहार किया। विश्वामित्र ने श्रीराम को आदेश दिया- "राम, स्त्री होने से संकोच न करो। राक्षसों का संहार धर्म है।" राम ने धनुष उठाया और एक बाण से ताड़का का वध कर दिया। यह राम का प्रथम युद्ध था, जिससे उनकी दिव्य शक्ति प्रकट हुई। लक्ष्मण ने सहायता की। विश्वामित्र प्रसन्न होकर राम को अस्त्र-शस्त्र विद्या सिखाने लगे– अग्नेय, वारुण, ऐन्द्र आदि दिव्य अस्त्र का ज्ञान दिया।
मारीच और सुबाहु का संहार
सिद्धाश्रम पहुंचकर विश्वामित्र ने यज्ञ आरंभ किया। छह दिन-रात शांति रही, लेकिन सातवें दिन मारीच और सुबाहु ने आक्रमण किया। वे आकाश से मांस-रक्त बरसाने लगे। श्रीराम ने मानव अस्त्र से मारीच को समुद्र में फेंक दिया, लेकिन वह जीवित रहा और बाद में रावण का सेवक बना। अग्नि अस्त्र से सुबाहु का वध किया। अन्य राक्षस भाग गए। यज्ञ पूर्ण हुआ। विश्वामित्र ने कहा- राम, तुमने विश्वकल्याण किया। अब मिथिला चलो, जहां जनक की पुत्री सीता का स्वयंवर है। फिर यहां से शुरू हुई थी भगवान राम के 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनाने की यात्रा।
मिथिला यात्रा और अहिल्या उद्धार
यज्ञ के बाद विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को मिथिला ले गए। रास्ते में गौतम ऋषि के आश्रम में अहिल्या पत्थर बनी हुई थीं, जो गौतम ऋषि के श्राप का ही फल था। इसके बाद श्रीराम के चरण स्पर्श मात्र से अहिल्या मुक्त हो गईं और गौतम ऋषि से मिलीं। फिर वे सभी अयोध्या पहुंचें, जहां प्रभु राम ने शिव धनुष तोड़ सीता जी के साथ विवाह किया।
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)