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Ram Navami 2025: रामजी के जन्म से पहले मां कौशल्या ने खाया था पुत्रेष्टि यज्ञ का प्रसाद, जानें खीर का महत्व

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Ram Navami 2025: राम जैसा पुत्र हर कोई पाना चाहता है। अवध के राजा दशरथ और उनकी पत्नी कौशल्या ने पुत्र को पाने के लिए कठोर तपस्या करनी पड़ी थी। कहा जाता है कि राजा दशरथ जिन्हें स्वयंभू मनु कहा जाता है और रानी कौशल्या जो शतरूपा हैं।

Ram Navami 2025
Ram Navami 2025: राम जैसा पुत्र हर कोई पाना चाहता है। अवध के राजा दशरथ और उनकी पत्नी कौशल्या को पुत्र पाने के लिए कठोर तपस्या करनी पड़ी थी। कहा जाता है कि राजा दशरथ जिन्हें स्वयंभू मनु कहा जाता है और रानी कौशल्या जो शतरूपा हैं, दोनों ने सत्ययुग में भगवान विष्णु को पुत्र रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। भगवान विष्णु उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें त्रेतायुग में माता-पिता बनने का वरदान दिया।

सभी लोग राम के रूप में विष्णु के अवतार का इंतजार कर रहे थे, लेकिन राम के माता-पिता बनने का वरदान पा चुके दशरथ और कौशल्या का धैर्य जवाब दे रहा था। ऐसे में आज इस खबर में जानेंगे कि आखिर कैसे राजा दशरथ और कौशल्या को पुत्र की प्राप्ति हुई। आइए इस खबर में राम जी के जन्म के बारे में विस्तार से जानते हैं।

तीन रानियों से जन्मे चार पुत्र

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, धैर्य खो चुके राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन में पुत्रयेष्टि यज्ञ करवाया था। जिसका संचालन श्रृंगी ऋषि ने किया था। कहा जाता है कि जब यज्ञ पूरा हुआ तो अग्निदेव स्वयं दोनों हाथों में खीर के दो बर्तन लेकर यज्ञ कुंड से प्रकट हुए। राजा दशरथ ने दोनों खीर के बर्तन अपनी तीनों रानियों कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा में बांट दिए। एक कटोरी का आधा हिस्सा कौशल्या ने और बाकी सुमित्रा ने खाया। इसी तरह दूसरे कटोरी का आधा हिस्सा कैकेयी ने और बाकी सुमित्रा ने खाया। खीर खाने के कुछ दिनों बाद कौशल्या के गर्भ से भगवान राम, कैकेयी के गर्भ से भरत और सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

राजा दशरथ ने ऋष्यश्रृंग की देखरेख में करवाया था पुत्रयेष्टि यज्ञ

वाल्मीकि रामायण के बालकांड के 15वें सर्ग में स्पष्ट उल्लेख है कि राजा दशरथ ने ऋष्यश्रृंग की देखरेख में पुत्रयेष्टि नामक यज्ञ करवाया था। वैदिक यज्ञों में किसी विशेष कामना के लिए अनेक प्रकार के ग्राम-इष्टि, पशु-इष्टि आदि यज्ञ बताए गए हैं, जिन्हें करने से उन यज्ञों के देवता प्रसन्न होकर यजमान की कामना पूरी करते हैं। इनमें से एक है पुत्रयेष्टि अर्थात संतान प्राप्ति की कामना से किया जाने वाला यज्ञ। रामायण के अनुसार महामुनि ऋष्यश्रृंग ने अथर्वशीर्ष के मंत्रों से यह यज्ञ किया था।

हुतशेष खीर भी देती है उत्तम स्वास्थ्य

रामायण के 16वें सर्ग के वर्णन के अनुसार, जब यज्ञ समाप्त हो गया और सभी देवता आहुतियां ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक चले गए, तब उस अग्नि से एक विशेष प्राणी प्रकट हुआ, जिसके हाथ में दिव्य पायस (खीर) से भरा पात्र था। वह पायस देवताओं का प्रसाद ही था। उसने न केवल संतान प्रदान की, बल्कि उसे उत्तम स्वास्थ्य देने वाला भी कहा गया है। यदि इसे वैदिक यज्ञ की विधि के रूप में देखें तो यह हुतशेष खीर है। प्रत्येक यज्ञ में जहां हवन के रूप में पायस का प्रयोग किया जाता है, वहीं हवन के पश्चात यजमान की मनोकामना पूर्ति के लिए उसी हुतशेष खीर का सेवन करने का विधान है।

हुतशेष खीर बनाने की विधि

जिस प्रकार किसी पूजा का फल उसके प्रसाद को खाने से प्राप्त होता है, उसी प्रकार इस पुत्रयेष्टि यज्ञ से संतान प्राप्ति में इस हुतशेष पायस (खीर) का सेवन फलदायी होता है। इस विशेष आहुति का यहां आलंकारिक रूप से वर्णन किया गया है कि अग्नि से प्रकट हुए दिव्य पुरुष ने यह खीर दशरथ को सौंपी थी। इसी प्रकार पुत्रयेष्टि यज्ञ में भी माना जाता है कि इस हुतशेष आहुति के आहुति से यजमान राजा बन जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह खीर भी विशेष विधि से बनाई जाती है। इसके लिए सबसे पहले कामधेनु गाय का दूध चाहिए होता है और साथ ही ऐसा खेत चाहिए होता है जहां कभी खेती न की गई हो। यह खीर धरती की पहली सर्दी से उगाए गए धान के चावल से बनाई जाती है। इसमें खजूर के गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है।

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