विज्ञापन
Home  mythology  mahabharata brahmastra aur narayanastra me kya tha antar janiye donon divya astron ki shakti

Mahabharata: ब्रह्मास्त्र और नारायणास्त्र में क्या था अंतर? जानें दोनों दिव्य अस्त्रों की शक्ति

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Brahmastra-Narayanastra: ब्रह्मास्त्र को भगवान ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त दिव्य अस्त्र कहा गया है। यह अस्त्र अत्यंत दुर्लभ था और केवल वही योद्धा इसे प्राप्त कर सकता था जो कठोर तप, विद्या और मंत्र-साधना में निपुण हो। 

mahabharata
Brahmastra-Narayanastra: महाभारत में अनेक दिव्य अस्त्रों का उल्लेख मिलता है, लेकिन ब्रह्मास्त्र और नारायणास्त्र को सबसे भयावह और प्रभावशाली अस्त्रों में गिना गया है। इन दोनों अस्त्रों का प्रयोग सामान्य युद्ध में नहीं किया जाता था, क्योंकि इनके प्रभाव से विशाल विनाश हो सकता था। ब्रह्मास्त्र को सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का दिव्य अस्त्र माना गया, जबकि नारायणास्त्र भगवान विष्णु के नारायण स्वरूप की शक्ति से युक्त था। महाभारत के युद्ध में दोनों अस्त्रों का प्रयोग अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ और उनकी कार्यप्रणाली भी एक-दूसरे से भिन्न थी। ब्रह्मास्त्र और नारायणास्त्र के अंतर को समझने के लिए उनके उद्गम, प्रयोग की विधि, प्रभाव तथा महाभारत में हुए उपयोग का उल्लेख महत्वपूर्ण माना जाता है।

ब्रह्मास्त्र का उद्गम और स्वरूप

ब्रह्मास्त्र को भगवान ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त दिव्य अस्त्र कहा गया है। यह अस्त्र अत्यंत दुर्लभ था और केवल वही योद्धा इसे प्राप्त कर सकता था जो कठोर तप, विद्या और मंत्र-साधना में निपुण हो। महर्षि परशुराम, द्रोणाचार्य, कर्ण, अर्जुन और अश्वत्थामा जैसे कुछ ही योद्धाओं को इसका ज्ञान प्राप्त था।

ब्रह्मास्त्र का प्रयोग साधारण बाण की तरह नहीं होता था। इसे विशेष मंत्रों के माध्यम से जागृत किया जाता था। एक बार पूर्ण शक्ति से छोड़े जाने पर यह अग्नि, तेज और दिव्य ऊर्जा से युक्त होकर अपने लक्ष्य का संपूर्ण विनाश कर सकता था। पौराणिक वर्णनों में कहा गया है कि इसके प्रभाव से भूमि बंजर हो सकती थी और दीर्घकाल तक उस क्षेत्र में जीवन प्रभावित हो सकता था।

महाभारत में ब्रह्मास्त्र का प्रयोग

महाभारत के अंत में, जब कौरव सेना लगभग नष्ट हो चुकी थी, तब अश्वत्थामा ने क्रोध में आकर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। उसने पांडवों का वंश समाप्त करने के उद्देश्य से यह अस्त्र छोड़ा। उसी समय अर्जुन ने भी द्रोणाचार्य से प्राप्त विद्या के आधार पर ब्रह्मास्त्र का संधान किया।

दोनों दिव्य अस्त्रों के आमने-सामने आने से भयंकर संकट उत्पन्न हो गया। आकाश में अग्निमय प्रकाश फैल गया और पृथ्वी कांप उठी। महर्षि व्यास तथा नारद ने हस्तक्षेप कर दोनों योद्धाओं को अस्त्र वापस लेने का आदेश दिया। अर्जुन ने अपने अस्त्र को वापस बुला लिया, किंतु अश्वत्थामा उसे पूर्णतः वापस लेने में असमर्थ रहा। तब उसने अस्त्र की दिशा बदलकर उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दी, जहाँ अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित स्थित था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से गर्भस्थ शिशु की रक्षा की।

नारायणास्त्र का उद्गम और स्वरूप

नारायणास्त्र भगवान विष्णु के नारायण स्वरूप से संबंधित दिव्य अस्त्र था। इसे द्रोणाचार्य ने प्राप्त किया था और बाद में यह ज्ञान अश्वत्थामा को मिला। यह अस्त्र ब्रह्मास्त्र की तरह किसी एक लक्ष्य को नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि पूरी सेना पर प्रलयंकारी आक्रमण करने के लिए प्रसिद्ध था।

जब नारायणास्त्र छोड़ा जाता था, तब उससे असंख्य अग्निबाण, चक्र, गदा और दिव्य अस्त्रों की वर्षा होने लगती थी। इसकी सबसे विशेष बात यह थी कि जो योद्धा इसका प्रतिरोध करता या हथियार उठाकर खड़ा रहता, उस पर अस्त्र का प्रकोप और बढ़ जाता था। जो शस्त्र त्यागकर विनम्र भाव से भूमि पर लेट जाता, उसे यह अस्त्र क्षति नहीं पहुंचाता था।

महाभारत में नारायणास्त्र का प्रयोग

द्रोणाचार्य के वध के बाद अश्वत्थामा अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने पांडव सेना का विनाश करने के लिए नारायणास्त्र का प्रयोग किया। अस्त्र के प्रभाव से आकाश अग्निमय हो उठा और पांडव सेना पर असंख्य दिव्य आयुधों की वर्षा होने लगी। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने तुरंत सभी पांडव योद्धाओं को आदेश दिया कि वे अपने शस्त्र त्यागकर भूमि पर लेट जाएं। श्रीकृष्ण ने बताया कि नारायणास्त्र का प्रतिकार युद्ध करके नहीं किया जा सकता।

भीमसेन प्रारंभ में इस आदेश को मानने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने गदा उठाकर अस्त्र का सामना करने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप नारायणास्त्र का प्रकोप और तीव्र हो गया और अग्निबाण सीधे भीम की ओर बढ़ने लगे। तब श्रीकृष्ण और अर्जुन ने उन्हें बलपूर्वक नीचे झुकाया। जैसे ही भीम ने शस्त्र त्यागे, अस्त्र शांत होने लगा। अंततः संपूर्ण पांडव सेना के निःशस्त्र होने पर नारायणास्त्र का प्रभाव समाप्त हो गया।

ब्रह्मास्त्र की भयावहता

पौराणिक ग्रंथों में ब्रह्मास्त्र को ऐसा अस्त्र बताया गया है जिसका प्रयोग अत्यंत विवशता में ही किया जाता था। इसके प्रभाव से अग्नि, धुआं और तेजस्वी ऊर्जा का ऐसा विस्तार होता था कि आसपास का क्षेत्र लंबे समय तक प्रभावित रह सकता था। महर्षि व्यास ने स्वयं अर्जुन और अश्वत्थामा को इसे वापस लेने का आदेश इसलिए दिया, क्योंकि दो ब्रह्मास्त्रों का टकराव पृथ्वी के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता था।

नारायणास्त्र की अद्वितीय शक्ति

नारायणास्त्र की सबसे अद्भुत विशेषता उसकी चेतन प्रतिक्रिया थी। यह अस्त्र शत्रु के व्यवहार के अनुसार अपना प्रकोप बढ़ाता या घटाता था। जो योद्धा युद्ध करता, उस पर यह और अधिक तीव्रता से प्रहार करता। जो विनम्र होकर शस्त्र त्याग देता, उस पर इसका प्रभाव समाप्त हो जाता। महाभारत में वर्णित है कि श्रीकृष्ण के निर्देश के बिना पांडव सेना इस अस्त्र से बच नहीं सकती थी।

अर्जुन और अश्वत्थामा का ज्ञान

अर्जुन को ब्रह्मास्त्र का ज्ञान द्रोणाचार्य से प्राप्त हुआ था और वे उसे वापस लेने की विधि भी जानते थे। अश्वत्थामा को भी अस्त्र का संधान ज्ञात था, किंतु उसे पूर्णतः वापस बुलाने की क्षमता नहीं थी। यही कारण था कि ब्रह्मास्त्र की दिशा बदलने के बाद भी उसका प्रभाव बना रहा। नारायणास्त्र के विषय में भी अश्वत्थामा विशेष रूप से दक्ष था। उसने द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद इसी अस्त्र का सहारा लिया और पांडव सेना को भारी संकट में डाल दिया।

दोनों अस्त्रों का पौराणिक महत्व

ब्रह्मास्त्र और नारायणास्त्र दोनों ही दिव्य शक्तियों के प्रतीक माने गए हैं, किंतु उनकी प्रकृति अलग थी। ब्रह्मास्त्र केंद्रित विनाश का अस्त्र था, जबकि नारायणास्त्र व्यापक प्रलयंकारी आक्रमण का। ब्रह्मास्त्र को रोकने के लिए समान स्तर की दिव्य विद्या आवश्यक थी, जबकि नारायणास्त्र से बचने का उपाय शस्त्र त्याग और समर्पण था।

यह भी पढ़े-

Temple Mystery: नदी किनारे ही क्यों बनाए गए अधिकतर प्राचीन मंदिर? जानें सदियों पुराने रहस्य का सच 

Nariyal Ritual: किसी भी शुभ कार्य से पहले क्यों फोड़ा जाता है नारियल? जानिए इस परंपरा का धार्मिक महत्व व रहस्य 

Temple Bells Mystery: कहीं मधुर, कहीं गंभीर! अलग-अलग मंदिरों में घंटियों की आवाज अलग क्यों होती है? 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel