facebook pixel
विज्ञापन
Home  mythology  ram katha  ramayana ravana pichle janam me kaun tha janiye pauranik katha aur bhagwan vishnu se juda rahasya

Ramayana: रावण पिछले जन्म में कौन था? जानें पौराणिक कथा और भगवान विष्णु से जुड़ा रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana Mythology: भगवान विष्णु ने अपने दोनों सेवकों को समझाया कि अब उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना ही होगा। हालांकि उन्होंने उन्हें दो विकल्प दिए। पहला विकल्प यह था कि वे सात जन्म तक भगवान विष्णु के परम भक्त बनकर पृथ्वी पर जन्म लें और उसके बाद वैकुंठ लौटें।

Ramayana
Ramayana Katha: रामायण में रावण को लंका का पराक्रमी, विद्वान और महाशक्तिशाली राजा बताया गया है। वह भगवान शिव का परम भक्त, चारों वेदों का ज्ञाता और असाधारण तपस्वी था, लेकिन रामायण, भागवत पुराण, विष्णु पुराण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में यह भी वर्णन मिलता है कि रावण का जन्म केवल एक साधारण राक्षस के रूप में नहीं हुआ था। उसके पिछले जन्म का संबंध सीधे भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ से जुड़ा हुआ था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रावण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपालों में से एक था, जिसे एक ऋषि के श्राप के कारण पृथ्वी पर राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ा। आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा...

वैकुंठ के द्वारपाल थे जय और विजय

भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ के मुख्य द्वार पर दो परम तेजस्वी द्वारपाल रहते थे, जिनके नाम जय और विजय थे। दोनों भगवान विष्णु के अत्यंत प्रिय सेवक थे और वैकुंठ की रक्षा का दायित्व निभाते थे। एक दिन ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ पहुंचे। चारों कुमार बालक के समान दिखाई देते थे, लेकिन वे महान तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी ऋषि थे। जब वे भगवान विष्णु के दर्शन के लिए द्वार पर पहुंचे, तब जय और विजय ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। द्वारपालों का उद्देश्य भगवान की विश्राम अवस्था में किसी को प्रवेश न देने का था, लेकिन ऋषियों ने इसे अपना अपमान समझा।

सनकादिक ऋषियों ने दिया कठोर श्राप

चारों कुमारों को जब प्रवेश नहीं मिला तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने जय और विजय से कहा कि वैकुंठ जैसे दिव्य स्थान में अहंकार और भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने दोनों द्वारपालों को श्राप दिया कि वे अपने दिव्य स्वरूप से वंचित होकर मृत्युलोक में जन्म लेंगे। श्राप मिलते ही जय और विजय को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने ऋषियों से क्षमा मांगी, लेकिन एक बार दिया गया श्राप वापस नहीं लिया जा सकता था। उसी समय भगवान विष्णु स्वयं वहां प्रकट हुए और उन्होंने भी बताया कि ऋषियों का श्राप अब अवश्य फलित होगा।

 

जय और विजय दिव्यता

भगवान विष्णु ने दिया दो विकल्प

भगवान विष्णु ने अपने दोनों सेवकों को समझाया कि अब उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना ही होगा। हालांकि उन्होंने उन्हें दो विकल्प दिए। पहला विकल्प यह था कि वे सात जन्म तक भगवान विष्णु के परम भक्त बनकर पृथ्वी पर जन्म लें और उसके बाद वैकुंठ लौटें।

दूसरा विकल्प यह था कि वे केवल तीन जन्म तक भगवान विष्णु के शत्रु बनकर जन्म लें। उन तीनों जन्मों में भगवान स्वयं अवतार लेकर उनका वध करेंगे और उसके बाद वे दोबारा वैकुंठ लौट आएंगे। जय और विजय भगवान विष्णु से अधिक समय तक दूर नहीं रहना चाहते थे, इसलिए उन्होंने दूसरा विकल्प चुना और तीन जन्म तक भगवान के विरोधी बनने का निर्णय लिया।

पहले जन्म में बने हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु

श्राप के प्रभाव से सतयुग में जय और विजय ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लिया। दोनों दैत्य अत्यंत शक्तिशाली थे और देवताओं के लिए बड़ा संकट बन गए। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में डुबो दिया था। तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर उसका वध किया और पृथ्वी को पुनः अपने स्थान पर स्थापित किया। दूसरी ओर हिरण्यकशिपु ने स्वयं को सबसे बड़ा मान लिया और भगवान विष्णु का विरोध किया। उसके पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु के महान भक्त थे। अंततः भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया। इस प्रकार जय और विजय का पहला जन्म समाप्त हुआ।

 

Ramayana

त्रेतायुग में रावण और कुंभकर्ण के रूप में हुआ दूसरा जन्म

दूसरे जन्म में जय और विजय ने ऋषि विश्रवा और राक्षसी कैकसी के पुत्रों के रूप में जन्म लिया। बड़े भाई का नाम रावण और छोटे भाई का नाम कुंभकर्ण रखा गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस जन्म में जय ने रावण और विजय ने कुंभकर्ण का रूप धारण किया। दोनों असाधारण बल, ज्ञान और तपस्या से संपन्न थे। रावण ने कठोर तप कर ब्रह्मा जी से अनेक वरदान प्राप्त किए, जिससे वह देवताओं, यक्षों और गंधर्वों के लिए भी अजेय बन गया।

रावण ने अपनी शक्ति के बल पर तीनों लोकों में अपना प्रभाव स्थापित किया। उसने अनेक देवताओं को पराजित किया और लंका को स्वर्णमयी नगरी के रूप में विकसित किया। लेकिन सीता हरण की घटना के बाद भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेकर धर्म की स्थापना के लिए रावण का वध किया। रामायण में वर्णित यह युद्ध केवल श्रीराम और रावण के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि वैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय के दूसरे जन्म की पूर्णता भी थी।

तीसरे जन्म में बने शिशुपाल और दंतवक्र

द्वापर युग में जय और विजय ने तीसरा और अंतिम जन्म शिशुपाल तथा दंतवक्र के रूप में लिया। दोनों भगवान श्रीकृष्ण के विरोधी थे। शिशुपाल ने राजसूय यज्ञ के दौरान भगवान श्रीकृष्ण का सार्वजनिक अपमान किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका वध किया। बाद में दंतवक्र भी भगवान श्रीकृष्ण के हाथों युद्ध में मारा गया। पुराणों में वर्णन है कि इन दोनों के शरीर से निकली दिव्य ज्योति भगवान श्रीकृष्ण में समा गई। इसी के साथ जय और विजय का श्राप समाप्त हो गया और वे पुनः वैकुंठ लौट गए।





यह भी पढ़ें-

Ramayana: रामायण में आखिर कौन था केवट? भगवान श्रीराम को गंगा पार कराने वाले भक्त की अद्भुत कथा 

Ramayana: श्रीराम को क्यों लेनी पड़ी वानर सेना की सहायता? नारद मुनि से जुड़ा है इसका रहस्य 

Ramayana: नलकुबेर ने क्यों दिया रावण को श्राप? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 


(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel