Ramayana: रामायण के अनुसार, जब रावण को यह ज्ञात हुआ कि हनुमान जी संजीवनी लेने जा रहे हैं, तब उसने कालनेमि नामक राक्षस को उन्हें रोकने के लिए भेजा।
Ramayana Mythological Story: रामायण में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी से जुड़े अनेक ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जो उनकी दिव्य लीलाओं और अद्भुत पराक्रम का वर्णन करते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण प्रसंग गंधमादन पर्वत का भी है। यह पर्वत केवल एक साधारण पर्वत नहीं माना जाता, बल्कि इसे हनुमान जी की अनुपम शक्ति, बुद्धि और श्रीराम के प्रति उनकी अटूट भक्ति का सबसे बड़ा साक्षी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पर्वत से जुड़ी घटनाओं ने युद्ध का रुख बदल दिया और लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा संभव हो सकी। आइए विस्तार से जानते हैं कि गंधमादन पर्वत का रामायण में क्या महत्व है और यह कैसे हनुमान जी की वीरता का अमर प्रतीक बन गया।
गंधमादन पर्वत का पौराणिक परिचय
रामायण और अन्य पुराणों में गंधमादन पर्वत का उल्लेख अत्यंत पवित्र और दिव्य पर्वत के रूप में मिलता है। यह पर्वत हिमालय क्षेत्र में स्थित माना गया है। इसकी विशेषता यह थी कि यहां अनेक दुर्लभ औषधियां, दिव्य वनस्पतियां और सुगंधित वृक्ष विद्यमान थे। कहा जाता है कि इस पर्वत पर देवता, सिद्ध, ऋषि और यक्ष भी तपस्या करते थे। गंधमादन पर्वत का वातावरण इतना पवित्र और दिव्य बताया गया है कि यहां की वायु भी औषधीय गुणों से युक्त मानी जाती थी। इसी कारण इसे देवताओं के प्रिय स्थलों में भी स्थान प्राप्त था।
मेघनाद के शक्तिबाण से मूर्छित हुए लक्ष्मण
लंका युद्ध अपने निर्णायक चरण में पहुंच चुका था। रावण का पुत्र मेघनाद अत्यंत पराक्रमी और मायावी योद्धा था। युद्ध के दौरान उसने दिव्य शक्तिबाण का प्रयोग कर लक्ष्मण जी पर प्रहार किया। उस अस्त्र के प्रभाव से लक्ष्मण जी रणभूमि में मूर्छित होकर गिर पड़े। वानर सेना सहित श्रीराम अत्यंत व्याकुल हो गए। किसी को भी यह समझ नहीं आ रहा था कि लक्ष्मण जी के प्राण कैसे बचाए जाएं। तभी लंका में रहने वाले वैद्य सुषेण को बुलाया गया। उन्होंने लक्ष्मण जी की स्थिति देखकर बताया कि यदि सूर्योदय से पहले हिमालय स्थित गंधमादन पर्वत से संजीवनी बूटी सहित कुछ विशेष दिव्य औषधियां लाकर दी जाएं, तभी लक्ष्मण जी के प्राण बच सकते हैं।
हनुमान जी को मिला सबसे कठिन दायित्व
वैद्य सुषेण की बात सुनते ही श्रीराम की ओर सभी की दृष्टि गई। उस समय यह कठिन कार्य केवल हनुमान जी ही कर सकते थे। श्रीराम की आज्ञा मिलते ही हनुमान जी बिना किसी विलंब के आकाश मार्ग से हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए। यह यात्रा साधारण नहीं थी। लंका से हिमालय तक का विशाल मार्ग, समय की कमी और लक्ष्मण जी के जीवन का प्रश्न, इन सभी परिस्थितियों ने इस कार्य को अत्यंत कठिन बना दिया था। फिर भी हनुमान जी ने अपने साहस और संकल्प में कोई कमी नहीं आने दी।
कालनेमि की माया
रामायण के अनुसार, जब रावण को यह ज्ञात हुआ कि हनुमान जी संजीवनी लेने जा रहे हैं, तब उसने कालनेमि नामक राक्षस को उन्हें रोकने के लिए भेजा। कालनेमि ने मार्ग में एक ऋषि का वेश धारण कर आश्रम बनाया और हनुमान जी को विश्राम के लिए रोकने का प्रयास किया। हनुमान जी पहले तो उसके आश्रम में पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें उसकी गतिविधियों पर संदेह हुआ। तभी एक दिव्य घटना के माध्यम से उन्हें कालनेमि के वास्तविक स्वरूप का पता चल गया। इसके बाद हनुमान जी ने उसी समय उसका वध कर दिया और बिना समय गंवाए अपनी यात्रा आगे बढ़ा दी।
गंधमादन पर्वत पर पहुंचकर सामने आई सबसे बड़ी चुनौती
हनुमान जी अंततः गंधमादन पर्वत पर पहुंच गए। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि पर्वत पर असंख्य दिव्य औषधियां चमक रही हैं। वैद्य सुषेण ने जिन औषधियों का नाम बताया था, उनमें मुख्य रूप से संजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी जैसी दिव्य औषधियां थीं, लेकिन इन सभी औषधियों की पहचान करना अत्यंत कठिन था। पौराणिक वर्णनों के अनुसार, दिव्य औषधियों ने स्वयं को छिपा लिया था, जिससे कोई भी उन्हें आसानी से पहचान न सके। समय तेजी से बीत रहा था और सूर्योदय निकट था। ऐसे में हनुमान जी ने एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गंवाया।
जब हनुमान जी ने उठा लिया पूरा गंधमादन पर्वत
औषधियों की पहचान न हो पाने पर हनुमान जी ने अपनी अद्भुत शक्ति का परिचय दिया। उन्होंने अपने विशाल स्वरूप को धारण किया और पूरे गंधमादन पर्वत के उस भाग को ही उखाड़ लिया, जहां दिव्य औषधियां स्थित थीं। यह दृश्य अत्यंत अद्भुत बताया गया है। विशाल पर्वत को हाथों में उठाकर हनुमान जी आकाश मार्ग से लंका की ओर उड़ चले। उनके इस अद्वितीय पराक्रम को देखकर देवता, ऋषि और समस्त लोक आश्चर्यचकित रह गए। यही वह प्रसंग है, जिसने गंधमादन पर्वत को हनुमान जी की वीरता का सबसे बड़ा साक्षी बना दिया। क्योंकि इस पर्वत ने स्वयं उस दिव्य क्षण को देखा, जब एक भक्त ने अपने आराध्य के कार्य के लिए असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को भी सहजता से पूर्ण कर दिया।
संजीवनी से बच गए लक्ष्मण जी के प्राण
हनुमान जी पर्वत लेकर समय रहते युद्धभूमि में पहुंच गए। वैद्य सुषेण ने उसी पर्वत से आवश्यक दिव्य औषधियां प्राप्त कीं। उन्होंने संजीवनी बूटी का प्रयोग कर लक्ष्मण जी का उपचार किया। कुछ ही समय बाद लक्ष्मण जी को चेतना प्राप्त हो गई। उनके स्वस्थ होते ही श्रीराम, वानर सेना और समस्त सहयोगियों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। लक्ष्मण जी के पुनर्जीवित होने से युद्ध फिर से आरंभ हुआ और आगे चलकर रावण का अंत संभव हो सका।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)