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Ramayana: लंका दहन के समय विभीषण का भी महल क्यों नहीं जला? जानिए पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana: सुंदरकांड के अनुसार, समुद्र पार करके हनुमान जी लंका पहुंचे और रात के समय नगर का निरीक्षण किया। उन्होंने देखा कि लंका सोने से बनी हुई अत्यंत भव्य नगरी थी। चारों ओर विशाल महल, ऊंचे द्वार और सुंदर भवन दिखाई दे रहे थे। 

Ramayana
Ramayana: हनुमान जी द्वारा लंका दहन का प्रसंग रामायण का सबसे प्रसिद्ध और चमत्कारिक प्रसंग माना जाता है। जब माता सीता की खोज करते हुए हनुमान जी लंका पहुंचे, तब उन्होंने अशोक वाटिका में माता सीता को श्रीराम का संदेश दिया। इसके बाद उन्होंने रावण की सेना का सामना किया और अंततः रावण के आदेश पर उनकी पूंछ में आग लगा दी गई। लेकिन यही आग कुछ ही क्षणों में पूरी स्वर्णमयी लंका के लिए विनाश का कारण बन गई। वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और अन्य पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि हनुमान जी ने अपनी जलती हुई पूंछ से लंका के महलों, भवनों और राजप्रासादों को अग्नि के हवाले कर दिया। हालांकि, इस पूरे लंका दहन के दौरान एक ऐसा महल था, जिसे अग्नि छू भी नहीं सकी। वह था रावण के छोटे भाई विभीषण का महल। धार्मिक ग्रंथों में इसके पीछे विशेष कारण बताया गया है।

जब हनुमान जी पहुंचे लंका

सुंदरकांड के अनुसार, समुद्र पार करके हनुमान जी लंका पहुंचे और रात के समय नगर का निरीक्षण किया। उन्होंने देखा कि लंका सोने से बनी हुई अत्यंत भव्य नगरी थी। चारों ओर विशाल महल, ऊंचे द्वार और सुंदर भवन दिखाई दे रहे थे। इसी दौरान उन्होंने विभिन्न स्थानों पर राक्षसों के निवास देखे, लेकिन एक स्थान ऐसा भी मिला जो अन्य भवनों से बिल्कुल अलग प्रतीत हो रहा था।

 

Ramayana

विभीषण के महल की पहचान कैसे हुई?

धार्मिक कथाओं के अनुसार, जब हनुमान जी नगर में घूम रहे थे, तब उन्होंने एक ऐसे भवन को देखा जिसके बाहर भगवान विष्णु के आयुधों के चिह्न बने हुए थे। उस भवन के आसपास तुलसी के पौधे भी लगे थे। रामचरितमानस में उल्लेख मिलता है कि लंका जैसी राक्षसों की नगरी में तुलसी का पौधा और भगवान के प्रतीक किसी सामान्य व्यक्ति के घर पर नहीं हो सकते थे।

हनुमान जी ने समझ लिया कि इस भवन में अवश्य कोई ऐसा व्यक्ति रहता है जो भगवान का भक्त है। बाद में उनकी भेंट विभीषण से हुई। दोनों के बीच श्रीराम का नाम लेकर बातचीत हुई और विभीषण ने स्वयं को भगवान श्रीराम का भक्त बताया। उन्होंने हनुमान जी को माता सीता का स्थान भी बताया और आगे की योजना में सहायता की।

रावण के आदेश पर पूंछ में लगाई गई आग

माता सीता से मिलने के बाद हनुमान जी ने अशोक वाटिका में उत्पात मचाया। उन्होंने अनेक वृक्ष उखाड़ दिए और राक्षसों का संहार किया। अंततः मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर उन्हें बंदी बना लिया और रावण के दरबार में प्रस्तुत किया।

सभा में रावण ने पहले हनुमान जी को मृत्युदंड देने का विचार किया, लेकिन विभीषण ने इसका विरोध किया। उन्होंने धर्म और राजधर्म का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी दूत की हत्या करना शास्त्रों के विरुद्ध है। विभीषण की बात स्वीकार करते हुए रावण ने आदेश दिया कि हनुमान जी की पूंछ में कपड़ा और तेल बांधकर आग लगा दी जाए, ताकि उनका अपमान किया जा सके।

राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ पर कपड़े लपेटे और उसमें आग लगा दी। उसी समय हनुमान जी ने अपना सूक्ष्म और फिर विशाल रूप धारण कर लिया तथा बंधनों से मुक्त होकर पूरी लंका में कूदना आरंभ कर दिया।

कैसे शुरू हुआ लंका दहन?

हनुमान जी एक महल से दूसरे महल और एक अट्टालिका से दूसरी अट्टालिका पर छलांग लगाते गए। उनकी जलती हुई पूंछ जहां-जहां पहुंची, वहां-वहां अग्नि फैलती चली गई। तेज हवा के कारण आग पूरे नगर में फैल गई। स्वर्ण से बनी लंका की भव्य इमारतें, रावण के राजमहल, सेनापतियों के भवन और अनेक विशाल प्रासाद अग्नि में जलने लगे।

धार्मिक ग्रंथों में वर्णन है कि लंका के चारों ओर अग्नि की लपटें उठने लगीं और पूरा नगर धधकने लगा। हनुमान जी ने यह कार्य श्रीराम के शत्रु की शक्ति को कमजोर करने और रावण को चेतावनी देने के उद्देश्य से किया।
 
Shree Ram Aur Vibhishan Ki Mulakat:

विभीषण का महल क्यों नहीं जलाया?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, लंका दहन के समय हनुमान जी ने जानबूझकर विभीषण के महल को छोड़ दिया। इसका सबसे प्रमुख कारण यह बताया गया है कि विभीषण भगवान श्रीराम के परम भक्त थे। उन्होंने कभी अधर्म का समर्थन नहीं किया और बार-बार रावण को माता सीता को सम्मानपूर्वक श्रीराम के पास लौटाने की सलाह दी थी।

हनुमान जी स्वयं समझ चुके थे कि विभीषण का हृदय श्रीराम की भक्ति से भरा हुआ है। जिस व्यक्ति के घर में भगवान का स्मरण होता हो, जहां तुलसी का वास हो और जहां धर्म का पालन किया जाता हो, उस स्थान को नष्ट करना उचित नहीं माना गया। इसलिए जब हनुमान जी पूरे नगर में अग्नि फैला रहे थे, तब उन्होंने विभीषण के भवन को छोड़ दिया।

अग्निदेव ने भी नहीं पहुंचाई कोई हानि

धार्मिक मान्यता के अनुसार, हनुमान जी पवनपुत्र हैं और अग्निदेव भी उनके प्रति अनुकूल थे। जिस प्रकार माता सीता अग्नि की प्रार्थना करने के कारण अग्नि की तपन से सुरक्षित रहीं, उसी प्रकार भगवान के भक्त विभीषण के निवास को भी अग्नि ने कोई क्षति नहीं पहुंचाई।

कथाओं में कहा जाता है कि जहां ईश्वर की भक्ति और धर्म का वास होता है, वहां दैवी शक्तियां भी अनुकूल रहती हैं। विभीषण का महल इसी कारण अग्नि की लपटों से सुरक्षित रहा।

विभीषण पहले ही कर चुके थे धर्म का पक्ष

रामायण में वर्णन मिलता है कि रावण की सभा में विभीषण ने बार-बार अपने बड़े भाई को समझाया था कि माता सीता का हरण अनुचित है। उन्होंने श्रीराम की शक्ति का भी वर्णन किया और युद्ध से बचने का सुझाव दिया। लेकिन रावण ने उनके परामर्श को स्वीकार नहीं किया।

हनुमान जी जब रावण के दरबार में पहुंचे थे, तब भी विभीषण ने दूत की हत्या का विरोध किया था। यदि उस समय विभीषण शास्त्रसम्मत बात न कहते, तो संभव था कि रावण क्रोध में हनुमान जी को मृत्युदंड देने का प्रयास करता। इस कारण भी हनुमान जी विभीषण के प्रति सम्मान रखते थे।

लंका दहन के बाद विभीषण का भविष्य

लंका दहन के कुछ समय बाद जब विभीषण ने पुनः रावण को समझाने का प्रयास किया और रावण ने उनका अपमान कर उन्हें सभा से निकाल दिया, तब विभीषण श्रीराम की शरण में पहुंचे। श्रीराम ने उन्हें बिना किसी संकोच के स्वीकार किया और भविष्य का लंकापति घोषित किया।

राम-रावण युद्ध समाप्त होने के बाद रावण के वध के पश्चात भगवान श्रीराम ने विभीषण का विधिपूर्वक राज्याभिषेक कराया। इस प्रकार वही विभीषण, जिनका महल लंका दहन के समय सुरक्षित रहा था, आगे चलकर लंका के धर्मनिष्ठ राजा बने। उनके महल का सुरक्षित रहना भी इसी आगामी घटना का एक महत्वपूर्ण पौराणिक संकेत माना जाता है।



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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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