Ramayana: रावण केवल बलशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल शासक और रणनीतिकार भी था। उसने लंका को चारों दिशाओं से विशाल दुर्गों, ऊंची दीवारों, गहरी खाइयों और विशाल द्वारों से सुरक्षित बनाया था।
Ramayana: रामायण में स्वर्णमयी लंका का वर्णन केवल उसकी समृद्धि और वैभव के लिए ही नहीं, बल्कि उसकी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी मिलता है। रावण ने अपनी राजधानी को इस प्रकार सुरक्षित बनाया था कि कोई भी शत्रु बिना अनुमति उसके भीतर प्रवेश न कर सके। यही कारण था कि जब भगवान श्रीराम की वानर सेना समुद्र पार कर लंका पहुंची, तब सबसे पहले उसके विशाल दुर्ग, ऊंची प्राचीरों और चारों दिशाओं में स्थित मुख्य द्वारों की सुरक्षा व्यवस्था का सामना करना पड़ा। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में लंका के चारों मुख्य द्वारों पर नियुक्त प्रमुख राक्षस सेनापतियों का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक द्वार की रक्षा किसी साधारण सैनिक को नहीं, बल्कि रावण के सबसे शक्तिशाली योद्धाओं को सौंपी गई थी। आइए जानते हैं कि लंका के चारों मुख्य द्वारों की रक्षा किसे सौंपी गई थी और इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या कहती है।
लंका की सुरक्षा व्यवस्था थी अत्यंत मजबूत
रावण केवल बलशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल शासक और रणनीतिकार भी था। उसने लंका को चारों दिशाओं से विशाल दुर्गों, ऊंची दीवारों, गहरी खाइयों और विशाल द्वारों से सुरक्षित बनाया था। प्रत्येक द्वार पर बड़ी संख्या में राक्षस सैनिकों की तैनाती रहती थी। जब विभीषण ने भगवान श्रीराम की शरण ग्रहण की, तब उन्होंने लंका की पूरी सैन्य व्यवस्था, उसके किलों और चारों मुख्य द्वारों की सुरक्षा का विस्तृत विवरण श्रीराम को बताया। इसी जानकारी के आधार पर श्रीराम ने अपनी सेना की रणनीति तैयार की।
पूर्व द्वार की रक्षा का दायित्व प्रहस्त को सौंपा गया था
लंका के पूर्वी द्वार की सुरक्षा रावण के सबसे विश्वसनीय सेनापति प्रहस्त को सौंपी गई थी। प्रहस्त को राक्षस सेना का प्रधान सेनापति माना जाता था। वह अनेक युद्धों में रावण की ओर से विजय प्राप्त कर चुका था और देवताओं के विरुद्ध भी उसने कई बार युद्ध किया था।
प्रहस्त के अधीन विशाल राक्षस सेना रहती थी। वह युद्ध कौशल, धनुर्विद्या और मायावी शक्तियों में निपुण था। रावण को विश्वास था कि यदि कोई सेना पूर्व दिशा से लंका में प्रवेश करने का प्रयास करेगी तो प्रहस्त उसे किसी भी स्थिति में सफल नहीं होने देगा। युद्ध के दौरान वानर सेना ने पूर्वी द्वार पर भीषण आक्रमण किया। बाद में वानर सेनापति नील और प्रहस्त के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें नील ने प्रहस्त का वध कर दिया। इसके बाद पूर्वी द्वार की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ गई।
दक्षिण द्वार की रक्षा महापार्श्व और महोदर के हाथों में थी
लंका के दक्षिणी द्वार की रक्षा का उत्तरदायित्व महापार्श्व और महोदर को दिया गया था। ये दोनों रावण के अत्यंत पराक्रमी मंत्री और योद्धा माने जाते थे। महापार्श्व अपनी असाधारण शारीरिक शक्ति और युद्ध कौशल के लिए प्रसिद्ध था, जबकि महोदर अपनी रणनीति और युद्ध संचालन में दक्ष माना जाता था। दोनों मिलकर दक्षिणी सीमा की रक्षा करते थे और उनके साथ बड़ी संख्या में राक्षस सैनिक तैनात रहते थे। जब युद्ध प्रारंभ हुआ, तब दक्षिण द्वार पर भी वानर सेना और राक्षसों के बीच भीषण संघर्ष हुआ। अनेक दिनों तक यहां घमासान युद्ध चलता रहा और अंततः श्रीराम की सेना ने इस दिशा में भी बढ़त बना ली।
पश्चिम द्वार की रक्षा इंद्रजीत को सौंपी गई थी
लंका के पश्चिमी द्वार की रक्षा का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व रावण ने अपने पुत्र मेघनाद, जिसे इंद्रजीत के नाम से जाना जाता है, को सौंपा था। इंद्रजीत रावण का सबसे शक्तिशाली पुत्र था। उसने देवताओं के राजा इंद्र को पराजित कर 'इंद्रजीत' की उपाधि प्राप्त की थी। वह मायावी युद्ध, दिव्य अस्त्रों और अदृश्य होकर युद्ध करने की क्षमता के कारण अत्यंत भयावह योद्धा माना जाता था।
रावण को पूरा विश्वास था कि यदि किसी दिशा से सबसे बड़ा आक्रमण होगा तो इंद्रजीत उसे रोकने में सक्षम रहेगा। युद्ध के दौरान इंद्रजीत ने अनेक बार अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग किया। उसने नागपाश का उपयोग कर श्रीराम और लक्ष्मण को बांध दिया था। बाद में गरुड़ के आगमन से दोनों मुक्त हुए। इंद्रजीत ने निकुंभिला में विशेष यज्ञ भी किया था, जिसे पूर्ण होने पर उसे और भी अधिक शक्ति प्राप्त होने वाली थी। विभीषण के बताने पर लक्ष्मण ने वहां पहुंचकर उसका यज्ञ भंग किया और अंततः युद्ध में इंद्रजीत का वध किया।
उत्तर द्वार की रक्षा स्वयं रावण ने संभाली थी
लंका के उत्तर द्वार की रक्षा का दायित्व स्वयं रावण ने अपने हाथों में रखा था। यह तथ्य इस बात को दर्शाता है कि वह इस दिशा को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानता था। रावण स्वयं उत्तरी द्वार पर अपनी विशाल सेना के साथ उपस्थित रहता था। उसके साथ अनेक प्रमुख राक्षस योद्धा भी तैनात रहते थे। युद्ध के अंतिम चरण में भगवान श्रीराम और रावण का आमना-सामना इसी दिशा में हुआ। उत्तर द्वार से ही रावण बार-बार युद्धभूमि में प्रवेश करता और अपनी सेना का नेतृत्व करता था। अंततः इसी युद्ध में श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से रावण का वध किया और लंका का युद्ध समाप्त हुआ।
विभीषण ने श्रीराम को बताई थी पूरी सैन्य व्यवस्था
जब विभीषण ने रावण का साथ छोड़कर श्रीराम की शरण ग्रहण की, तब उन्होंने लंका की आंतरिक व्यवस्था से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां दीं। उन्होंने बताया कि किस द्वार पर कौन-सा सेनापति नियुक्त है, किसके पास कितनी सेना है और कौन-सा योद्धा किस प्रकार की युद्ध नीति अपनाता है। विभीषण की इस जानकारी के बाद श्रीराम ने भी अपनी वानर सेना का विभाजन किया। अलग-अलग दिशाओं में प्रमुख वानर योद्धाओं को भेजा गया ताकि प्रत्येक द्वार पर एक साथ आक्रमण किया जा सके और राक्षस सेना को संभलने का अवसर न मिले।
चारों द्वारों पर एक साथ हुआ था आक्रमण
श्रीराम की सेना ने केवल एक दिशा से हमला नहीं किया था। युद्धकाण्ड के वर्णन के अनुसार वानर सेना ने चारों मुख्य द्वारों पर एक साथ धावा बोला। इससे रावण की सेना चारों ओर से युद्ध में उलझ गई। वानर पर्वतों, विशाल वृक्षों और शिलाओं को उठाकर राक्षसों पर प्रहार कर रहे थे। दूसरी ओर राक्षस दिव्य अस्त्रों, तलवारों, गदाओं और बाणों से युद्ध कर रहे थे। चारों द्वारों पर कई दिनों तक लगातार भीषण युद्ध चलता रहा। युद्ध के दौरान एक-एक करके रावण के प्रमुख सेनापति और योद्धा पराजित होते गए। प्रहस्त, कुंभ, निकुंभ, अतिकाय, त्रिशिरा, नरांतक, देवांतक और अंत में इंद्रजीत जैसे महाबली योद्धाओं के वध के बाद रावण की सेना कमजोर पड़ती चली गई।
युद्धकाण्ड में मिलता है चारों द्वारों का उल्लेख
वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में लंका के चारों मुख्य द्वारों और उनकी सुरक्षा व्यवस्था का विस्तार से वर्णन मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार रावण ने पूर्व द्वार की रक्षा प्रहस्त को, दक्षिण द्वार की रक्षा महापार्श्व और महोदर को, पश्चिम द्वार की रक्षा इंद्रजीत को तथा उत्तर द्वार की रक्षा स्वयं अपने हाथों में रखी थी।
इन सभी योद्धाओं को विशाल राक्षस सेना का नेतृत्व सौंपा गया था, ताकि कोई भी शत्रु लंका में प्रवेश न कर सके, लेकिन जब भगवान श्रीराम की सेना ने विभीषण द्वारा बताई गई रणनीतिक जानकारी के आधार पर चारों दिशाओं से एक साथ आक्रमण किया, तब लंका की अभेद्य मानी जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे टूटने लगी। इसके बाद युद्ध अपने अंतिम चरण में पहुंचा और अंततः रावण का वध होने के साथ लंका का महान युद्ध समाप्त हुआ।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)