Ramayana: वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर सरयू नदी के दक्षिणी तट पर पहुंचे, तब उन्होंने दोनों राजकुमारों को स्नान करने और शुद्ध होकर बैठने का निर्देश दिया।
Ramayana Mythological Story: रामायण में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़ी अनेक ऐसी घटनाएं मिलती हैं, जिनमें ऋषियों द्वारा प्रदान किए गए दिव्य ज्ञान और अस्त्र-शस्त्रों का विशेष उल्लेख मिलता है। इन्हीं में से एक है बला और अतिबला विद्या, जिन्हें महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ वनगमन के दौरान प्रदान किया था। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में वर्णित यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी के बाद श्रीराम ने ताड़का, मारीच और सुबाहु जैसे राक्षसों का सामना किया और ऋषियों के यज्ञों की रक्षा की। बला और अतिबला कोई सामान्य विद्याएं नहीं थीं, बल्कि ब्रह्मा से उत्पन्न दिव्य विद्याएं मानी गई हैं, जिनके प्रभाव से साधक को असाधारण सामर्थ्य प्राप्त होती थी।
महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को अपने साथ क्यों ले गए?
अयोध्या के राजा दशरथ के राज्य में जब महर्षि विश्वामित्र पहुंचे, तब उन्होंने राजा से एक विशेष आग्रह किया। उन्होंने बताया कि वे एक महान यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं, लेकिन ताड़का, मारीच और सुबाहु जैसे राक्षस बार-बार यज्ञ में विघ्न डालते हैं। ऋषियों के नियमों के कारण वे स्वयं क्रोध या शस्त्र का प्रयोग नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने राजा दशरथ से श्रीराम को अपने साथ भेजने का अनुरोध किया।
राजा दशरथ पहले तो इस बात से विचलित हुए, क्योंकि श्रीराम उस समय बालक अवस्था में थे, लेकिन कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र के तेज और उद्देश्य को समझाते हुए दशरथ को आश्वस्त किया। इसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ वन की ओर प्रस्थान कर गए।
सरयू तट पर मिला बला और अतिबला विद्या का उपदेश
वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर सरयू नदी के दक्षिणी तट पर पहुंचे, तब उन्होंने दोनों राजकुमारों को स्नान करने और शुद्ध होकर बैठने का निर्देश दिया। इसके बाद महर्षि ने उन्हें बला और अतिबला नाम की दो अत्यंत गूढ़ और दिव्य विद्याओं का उपदेश दिया।
इन विद्याओं को देने से पहले महर्षि ने बताया कि ये साधारण मंत्र नहीं हैं, बल्कि ब्रह्मा की तेजस्वी पुत्रियों के समान दिव्य शक्तियां हैं। इनका ज्ञान केवल योग्य और पात्र शिष्य को ही दिया जाता है। श्रीराम ने पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक इनका ग्रहण किया।
क्या थीं बला और अतिबला विद्या?
बालकांड में वर्णित कथाओं के अनुसार बला और अतिबला दो अलग-अलग दिव्य विद्याएं थीं। इनका उद्देश्य केवल शारीरिक बल बढ़ाना नहीं था, बल्कि साधक की संपूर्ण शक्ति, चेतना और सामर्थ्य को जागृत करना था। बला विद्या के प्रभाव से साधक को थकान का अनुभव नहीं होता था। कठिन यात्रा, युद्ध या लंबे समय तक जागरण के बाद भी उसकी शक्ति बनी रहती थी। शरीर में दुर्बलता नहीं आती थी और मन स्थिर बना रहता था।
अतिबला विद्या इससे भी अधिक प्रभावशाली मानी गई है। इसके प्रभाव से साधक की बुद्धि, स्मरण शक्ति, तेज और मानसिक सामर्थ्य अद्भुत हो जाती थी। वह किसी भी संकट में धैर्य नहीं खोता था और उसकी दिव्य आभा सदैव बनी रहती थी।
इन विद्याओं से श्रीराम को कौन-कौन सी शक्तियां प्राप्त हुईं?
महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को इन विद्याओं का महत्व बताते हुए कहा कि इनके प्रभाव से उन्हें अनेक प्रकार की दिव्य सामर्थ्य प्राप्त होगी। वाल्मीकि रामायण के अनुसार इन विद्याओं के कारण श्रीराम को भूख और प्यास अधिक नहीं सताती थी। अत्यधिक परिश्रम के बाद भी उनका शरीर थकता नहीं था। कथा में यह भी वर्णित है कि निद्रा की अवस्था में भी कोई राक्षस या मायावी शक्ति उन पर आक्रमण कर उन्हें पराजित नहीं कर सकती थी। उनका तेज और पराक्रम निरंतर बना रहता था। महर्षि ने यह भी कहा कि इन विद्याओं के प्रभाव से श्रीराम की कीर्ति, बुद्धि, उत्तर देने की क्षमता और युद्ध कौशल में निरंतर वृद्धि होगी। संसार में कोई भी उनके समान सामर्थ्यवान नहीं हो सकेगा।
ब्रह्मा से जुड़ी मानी जाती हैं ये दिव्य विद्याएं
वाल्मीकि रामायण में महर्षि विश्वामित्र इन दोनों विद्याओं का परिचय देते हुए कहते हैं कि ये ब्रह्मा की तेजस्वी पुत्रियों के समान दिव्य शक्तियां हैं। इन्हें अत्यंत गोपनीय माना गया था और इनका ज्ञान हर किसी को नहीं दिया जाता था। पौराणिक मान्यता के अनुसार इन विद्याओं का संरक्षण महर्षि विश्वामित्र के पास था। कठोर तपस्या और ब्रह्मतेज के कारण वे इनके अधिकारी बने और जब उन्हें लगा कि श्रीराम धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हुए हैं, तब उन्होंने यह दिव्य ज्ञान उन्हें प्रदान किया।
बला और अतिबला विद्या प्राप्त करने के बाद क्या हुआ?
इन विद्याओं को ग्रहण करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ आगे बढ़े। सबसे पहले उनका सामना ताड़का नामक राक्षसी से हुआ। महर्षि के आदेश पर श्रीराम ने ताड़का का वध किया और वन क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्त कराया। इसके बाद वे सिद्धाश्रम पहुंचे, जहां महर्षि विश्वामित्र का यज्ञ प्रारंभ हुआ। यज्ञ के अंतिम दिनों में मारीच और सुबाहु अपने राक्षस दल के साथ यज्ञ को नष्ट करने पहुंचे। तब श्रीराम ने दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया। मारीच को दूर समुद्र की ओर फेंक दिया और सुबाहु का वध कर दिया। इस प्रकार यज्ञ बिना किसी विघ्न के पूर्ण हुआ।
इसके बाद महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को और भी दिव्य अस्त्र प्रदान किए
ताड़का वध और यज्ञ की रक्षा के बाद महर्षि विश्वामित्र श्रीराम के पराक्रम से अत्यंत प्रसन्न हुए। इसके बाद उन्होंने श्रीराम को अनेक दिव्य अस्त्रों और शस्त्रों का ज्ञान भी प्रदान किया। रामायण में वर्णन मिलता है कि महर्षि ने धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, इंद्रचक्र, ब्रह्मास्त्र, ऐषीकास्त्र, वायव्यास्त्र, अग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, पाश, गदा और अनेक दिव्य अस्त्रों का मंत्र एवं प्रयोग श्रीराम को सिखाया। इन अस्त्रों ने आगे चलकर राक्षसों के विरुद्ध होने वाले युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)